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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



कुछ पाना था, कुछ खोना था


डॉ० अनिल चड्डा


सब ऐसे ही तो होना था,
कुछ पाना था, कुछ खोना था।

हैं वक्त से बन जाती बातें,  
फिर क्यों कर तेरा रोना था।

कोई याद रखे,या न रखे,
क्यों ग़म का बोझा ढोना था।

आँखें जब बोझिल हो जायें,
रोते-रोते भी सोना था।

दिल कुछ कहता, हम कुछ कहते,
दोनों को एक ना होना था।

तेरी बातें काँटों जैसी,
दिल था या कोई खिलौना था।  
 
जो बीत गया, सो बीत गया,
आँखों को नम क्यों होना था।  
 
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