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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



कोई रास्तों से कह दे, तेरे दर पे लेके आयें


डॉ० अनिल चड्डा


 
कोई रास्तों से कह दे, तेरे दर पे लेके आयें, 
मेरे दिल में जो ख़लिश है, उसे और न बढ़ायें।

दीवानगी की ज़िद थी, उन्हें अपना है बनाना,
जितना वो दूर जायें, हमें पास हैं बुलायें।

बर्बादियों की चाहत, फ़ितरत में ही बसी है,
वगरना हर किसी से हम आँख क्यों लड़ायें।

है जवानी का तक़ाज़ा, नहीं सबर हमें अब आता,
जो दिल बात को माने, वो दिल कहाँ से लायें।

‘अनिल’ को नहीं आता, बात को घुमाके कहना,
हम सीधे से गर बोलें, तो वो बात समझ न पायें।
 
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