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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



मेरा हाथी


डॉ० अनिल चड्डा


हाथी इतना बड़ा क्यों बोलो
पूँछ है छोटी सी
छोटी – छोटी आँखें इसकी
सूँड है मोटी सी
बड़े – बड़े से दाँत नुकीले
टाँग है मोटी सी
झप-झप से वो कान झुलाये
मक्खियों को उनसे वो भगाये
धप-धप चाल चले मस्तानी
लगे किसी राजा की निशानी
खाना बहुत है खाता
पर है भारी काम कराता
गुस्से से जब वो चिंघाड़े
शेर भी जंगल छोड़ के भागे
पर जो प्यार से उसे बुलाता
सेवक उसका वो बन जाता
सूँड़ से अपनी पीठ बिठाता
तुम भी सूँड उसकी सहलाओ
झट से बैठ पीठ पर जाओ
घूम-घूम कर मौज मनाओ
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