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वर्ष: 2, अंक 23, अक्टूबर(द्वितीय), 2017



चुन्नू का कबूतर


डॉ० अनिल चड्डा


चुन्नू ने  कबूतर था पाया,
मुन्नी के भी मन को  भाया,
डर कर लेकिन नहीं उड़ा वो,
जहाँ मिला था वहीं पड़ा वो,
मन में शंका उन्हे  थी आई,
गहरी चोट क्या उसने खाई,
यूं ही ग़र वो पड़ा रहेगा,
बिल्ली का वो ग्रास बनेगा,
मन में उनके दया थी आई,
मम्मी जी भी दौड़ी आईं,
प्यार से हाथ में उसे उठाया,
ममतावश था घर को लाया,
ला कर उसको घर में बिठाया,
पानी पिलाया, दाना खिलाया,
पंख थे छितरे, गर्दन थी टेढ़ी,
चलने की थी चाल भी टेढ़ी,
उड़ने से मजबूर बेचारा,
चाह रहा था खुला नजारा,
चोट से पर बेहाल कबूतर,
उड़ नहीं सकता था दोबारा,
चुन्नू ने पर हार ना मानी,
उसे उड़ाने की थी ठानी,
शाम-सवेरे करके सेवा,
उसको दे-दे कर मेवा,
चुन्नू ने उसको तगड़ा बनाया,
एक दिन जब वो स्कूल से आया,
कबूतर को चलता हुआ पाया,
ठुमक-ठुमक कर चला कबूतर,
बिस्तर के नीचे, बिस्तर के ऊपर,
चुन्नू ने सोचा उड़ेगा कैसे,
बाल्कनी में उसे बिठाया,
चुन्नू को फिर गच्चा दे कर,
उड़ा कबूतर, आकाश पे छाया,
चुन्नू पर नहीं हुआ उदास,
दौड़ा आया माँ के पास,
खुश हो कर खुशखबरी सुनाई,
देखो माँ मैंने एक जान बचाई । 		 
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