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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



निश्चय


शशांक मिश्र भारती


मां ! ओ मां!! मुझे बताओ आखिर हम लोग वहां से क्यों चले आये?

नहीं बेटा, जिद नहीं करते। भूल जाओ हमारे साथ जो कुछ हुआ। मन्जू अपने दिनेश को समझाते हुए बोली।

नहीं मां, आज शान्त नहीं होऊँगा, ये तो रोज का चक्कर है। आखिर हम लोगों में क्या कमी है। क्या हम लोग जानवर हैं। चोर, डकैत, शराबी भी नहीं.......। आवेश में दिनेश न जाने क्या-क्या कह गया।

नहीं मानते हो तो सुनो-

हम नीची जाति के हैं। उनके बराबर के नहीं; इसलिए हमारी कोई इज्जत नहीं।‘‘

हम सब इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं। फिर इतना भेदभाव कैसा? आखिर कब तक सहोगी।

बेटा, तुम कब समझोगे। यह सदी, परिवर्तन हमारे समाज तक नहीं पहुंचे हैं। हमारा समाज तो वहीं आज भी है। जहां वर्षों पहले था।

अपनी मां की बात सुनकर दिनेश ने मन ही मन निश्चय कर लिया। कुछ भी हो वह अपना जीवन समाज से भेदभाव मिटाने में लगा देगा।

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