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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



दीपिका


शशांक मिश्र भारती


बड़े साहब के घर वर्षों से काम करती दीपिका को महीने के तीन हजार रुपये बहुत कम पड़ते। उसे जब अपने शराबी पति की लापरवाही से हुए छः छः बच्चों को पालना पड़ता।

उधर मेमसाब अपने कुप्रे पर महीने में तीस-पैंतीस हजार लुटा देतीं। परन्तु दीपिका को एक पैसा अधिक नहीं ? घण्टों रिरियाकर दुःखड़ा सुना-सुनाकर थक चुकी थी।

जब दीपिका कुत्ते को देखती तो यही सोचती, कि -

‘‘भगवान अगले जनम मोहि कुत्ता बनइयो और साहब के घर ही भेजियो।

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