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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



अंतरजाल पर हिंदी साहित्य


सुशील शर्मा


                   
हिंदी के साहित्य का
इंटरनेट पर राज।
कई हज़ार ब्लॉगर बने
होता हिंदी में काज।

अभिव्यक्ति अनुभूति
से शुरू हुई थी बात।
वेबपेज है अनगिनत
करते सबको मात।

वेबदुनिया और हिंदी कुंज
 साहित्य की लहरी हैं।
शब्दों का उजाला और
वसुधा हिंदी के प्रहरी है।

स्वर्गविभा प्रतिलिपि
बनी हिंदी की आवाज़।
रचनाकार साहित्य सुधा
 हैं हिंदी के परवाज।


साहित्य शिल्पी और
नेस्ट में हिंदी है लिपि बद्ध।
सहित्यकुंज और हाइकु
मंजूषा है हिंदी के लब्ध।

अंतरजाल पर बिछ गया
 हिंदी का साम्राज्य।
हिंदी की हिमायत करें
भारत के सब राज्य।

फेसबुक व्हाट्स एप्प से
हुआ हिंदी साहित्य का प्रसार।
अंतरजाल ने दिया नए
 लेखकों को प्रचार।

हिंदी लेखन से जुड़ा
नया मीडिया तंत्र।
विश्व की भाषा बन सके
यही है मूल में मंत्र।
 
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