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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



हवाओं में दीपक


धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


  
इरादों को तुम आज़माया करो !
हवाओं में दीपक जलाया करो !!
 
बहारों पे मत कुछ भरोसा करो!
खिज़ाओं से गुलशन सजाया करो !!
 
किसी का कभी भी न कोई हुआ !
हकीक़त ये मन में बसाया करो !!
 
खुशी के' दिलों में जलाकर दिए !
ग़मों का अँधेरा मिटाया करो !!
 
गिराना किसी को जहानत नहीँ !
मुहब्बत से' सबको उठाया करो !!
 
तराने सुहाने ही' गाओ यहाँ !
न ग़मगीन नगमें सुनाया करो !!
 
डगर नेकियों की बड़ी चीज़ है !
दुआओं में रब को मनाया करो !!
 
मुसाफ़िर करे है गुज़ारिश यही !
न दिल को किसी के दुखाया करो !!
 
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