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वर्ष: 2, अंक 21, अक्टूबर(प्रथम), 2017



न तुमने निभाया, न हमने निभाया


डॉ० अनिल चड्डा


 
न तुमने निभाया, न हमने निभाया,
तेरा ख्याल हमको न जाने क्यूँ आया।

जवाँ हसरतें थीं, जवाँ थीं उम्मीदें,
मेरा प्यार तुमको न क्यों रास आया।

सभी रास्ते तेरे दर से गुज़रते,
तेरा घर न हमको नज़र में क्यों आया।

अभी भी मेरी धडकनें बोल जाती,
ज़हर क्यों हमीं को उसने था पिलाया।

मुलाक़ात होनी दोबारा नहीं थी,
न तुमने बुलाया, न हमने बुलाया।
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