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वर्ष: 2, अंक 25, नवम्बर(द्वितीय), 2017



कविता- छंद से छंदमुक्त तक


बृजेश नीरज


प्राचीन आर्य-परम्परा के अनुसार गद्य भी छंदयुक्त माना जाता है। दुर्गाचार्य ने निरुक्ति की वृत्ति में लिखा है- ‘नाच्छ्न्दसि वागुच्चरति’ अर्थात छंद के बिना वाणी उच्चरित नहीं होती। भरत मुनि ने भी छंद से रहित शब्द को स्वीकार नहीं किया है- ‘छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति न छन्द׃ शब्दवर्जितम’। कात्यायन मुनि ने भी स्वीकार है कि वेद का ऐसा कोई मन्त्र नहीं है, जो छंदों के माध्यम से न कहा गया हो। यजुर्वेद के गद्यात्मक मन्त्र भी छंदों से रहित नहीं हैं। नरेश सक्सेना कहते हैं कि ‘अगर हमने कविता में लय, चित्रात्मकता और संगीत को पीछे छोड़ा है तो निश्चित तौर पर इसलिए क्योंकि हमें उसके जरिए कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण बातें बतानी थीं।’ यह महत्वपूर्ण बातें प्रतीकों-बिम्बों के सहारे कलात्मक ढंग से कही जाती हैं। कविता की यही विशेषता है कि आज के समय और मानवीय संवेदना ने उसमें अपनी अभिव्यक्ति पायी है। अपने तमाम विधागत रूपों में उसने अपने समयानुरूप अस्तित्व को जिया है, अपने अर्थों को तलाशा है।

सृष्टि का मूलभूत सिद्धांत है- सकारात्मकता और परिवर्तनशीलता। समय के साथ चीज़ें बदलती हैं, व्यक्ति बदलता है। प्रकृति और समय बदलाव के पक्षधर हैं। कविता भी समय के साथ बदलती है, भाषा भी बदलती है। विधाओं में जब सड़ांध होने का खतरा पैदा हो जाता है, जब समय का बदलाव उस समय की प्रचलित विधा में अभिव्यक्ति नहीं पाता तब कलम नयी विधा की खोज करती है। नयी विधाओं का, नए तरह के कहन का, नए प्रयोगों का सदा स्वागत किया जाना चाहिए और समालोचना भी। साहित्य के विकास के लिए यह आवश्यक है।

समय की आवश्यकता के अनुसार कविता को नएपन की खोज हमेशा रहती है। छंद से छंदमुक्त तक का कविता का सफ़र इसी कहानी को कहता है। छन्दों से लेकर नई कविता तक तमाम रूपों की अपनी विशिष्टताएँ हैं तो अपनी सीमाएँ और जटिलताएँ भी हैं इसलिए आज के समय और आज की भाषा के साथ उन शिल्पों में बाँधकर अपनी बात को कहना बहुत आसान नहीं है। यह व्यक्तिगत मजबूरियाँ और पूर्वाग्रह ही होते हैं, जो हमें नयी विधाओं को दुत्कारने पर मजबूर करते हैं। हिन्दी साहित्य में यह प्रवृत्ति बहुत शिद्दत से मौजूद है। किसी विधा विशेष में पारंगत वरिष्ठों ने दूसरी विधाओं में लिखने वालों को सदा हतोत्साहित किया है। विधाओं के संघर्ष ने साहित्यिक विधाओं का आपसी द्वन्द और खींचतान साहित्य को नुकसान ही पहुँचाता है, अच्छी रचनाओं को पाठकों से दूर करता है। इलियट ने कहा है कि ‘जब-जब आलोचना की वृद्धि होती है तब-तब रचना का ह्रास होने लगता है।’ यह बात हिंदी साहित्य में पूर्णतया चरितार्थ होती दिखती है। किसी विधा का विरोध उस विधा के सकारात्मक पहलू से आँख मूँद लेने पर विवश करता है। हर विधा अपने गुण और वैशिष्ट्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है। एक विधा को नकारकर किसी विधा की स्थापना नहीं की जा सकती है।

जनपक्षधर साहित्य के प्रसार और प्रचार के साथ ही साहित्य के विधागत विभेदों का विरोध किया जाना चाहिए। यदि गीत, गजल आदि जनवादी हैं तो वो किसी भी कविता से कमतर नहीं होते हैं। हिन्दी के बुर्जुवा लेखकों ने इन दोनों विधाओं को साहित्य की मूलधारा से बहिष्कृत करने का षडयन्त्र किया है। लयबद्ध काव्य भी जनता को आकर्षित करता है। इस काव्य को साहित्य की मूलधारा में समझकर ही कविता को व्यापकता प्रदान की जा सकती है। गोरख पांडेय, कैलाश गौतम, ओंकार सिंह ओंकार, महेश्वर तिवारी, महेन्द्र भटनागर, जगदीश पंकज, कृष्ण मुरारी पहरिया जैसे कवियों का लेखन किसी भी बड़े कवि से कमतर नहीं है। साहित्य के हर उस प्रसंग की परिचर्चा आवश्यक है जिसको बुर्जुवा और बाजारवादी समीक्षकों ने अप्रासांगिक कहकर मूल्यहीन करने का दुस्साहस किया है।

विधागत द्वन्द के अलावा भाषा और संस्कृति के स्तर पर भी संघर्ष है। आज पूरा हिंदी साहित्य संकट के दौर से गुज़र रहा है और इसका प्रमुख कारण हिंदी का भाषाई संकट है। क्षेत्रीय भाषाओँ के आपसी संघर्ष और अंग्रेजी की सरकारी और अभिजात्य वर्गीय मान्यता ने इस संकट को गहरा किया है। अंग्रेज़ी के अभिजातीय ठसके के नीचे कसमसाती भारतीय भाषाएँ अपने अस्तित्व को बचाए रखने, सिर उठाने के लिए लगातार रास्ते खोजती रहती हैं। लेकिन क्या उनके लिए नज़रें उठाने तक की भी गुंजाइश हो पाएगी? यह एक बड़ा प्रश्न है। प्रशासनिक सेवाओं में अंग्रेजी के प्रभुत्व के खिलाफ आवाज़ उठाने वाला आन्दोलन अभी तक उपेक्षा और दमन का ही शिकार हुआ है। देश के बुद्धिजीवी वर्ग और साहित्य जगत से इस आन्दोलन को जो समर्थन मिलना चाहिए था, वह भी नदारद है। सत्ता और इलीट-दरबारों की तरफ हसरत भरी निगाहों से देखने वाले विवेकशील लोग मौन साधे हैं। भारतीय भाषाओं के समर्थन में देश के किसी भी कोने में अभी तक एक भी मोमबत्ती नहीं जली। बुद्धिजीवियों का सत्ता के प्रति चाटुकारिता का रवैया, रोजी-रोटी के संकट से जूझती जनता की इन विषयों के प्रति उदासीनता तथा भारतीय भाषाओँ के एक-दूसरे और विशेषकर हिंदी के प्रति पूर्वाग्रह, बल्कि दुराग्रह कहना चाहिए, इस आन्दोलन को किसी सार्थक परिणति तक जाने देंगे, इसकी सम्भावना कम ही है। जरूरत है कि देश में शासन-प्रशासन तक पहुँच के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता को ख़त्म किया जाए और भारतीय भाषाओँ में देश का राजकाज चलने की तरफ सार्थक पहल की जाए। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और राष्ट्र की भाषा के रूप में इसकी स्थापना के प्रयासों में सबका सहयोग जरूरी है।

तमाम मतभेदों और विवादों के बावजूद कविता अपनी लय में अभिव्यक्ति के प्रवाह के साथ उपस्थित है। संघर्ष, विषमताओं और विकृतियों से उपजी आज की कविता खुद में कथ्य की गहनता और सान्द्रता को समेटे हुए, बिम्बों और प्रतीकों के सहारे वह अपनी बात पूरे प्रवाह से कहती जाती है। आज की कविता अपनी अभिव्यक्ति में सशक्त हुई है तो साथ ही, शिल्प के स्तर पर विविधता भी लिए हुए है। कविता का कोई निर्धारित शिल्प न होना ही इसे दुरूह बनाता है और इस विधा पर कलम चलाते समय सजगता तथा वैचारिक पक्षधरता व प्रतिबद्धता की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

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