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वर्ष: 2, अंक 25, नवम्बर(द्वितीय), 2017



पप्पा-पप्पा चंदा ला दो


डॉ० अनिल चड्डा


 
पप्पा-पप्पा चंदा ला दो,
मुझको उसके संग खिला दो,
तारों संग वो रोज खेलता,
टुकर-टुकर मैं इधर देखता,
उसको पता मेरा बता दो,
मुझको उसके संग खिला दो ।

पप्पा मुझको ये बतला दो,
चंदा रात में ही क्यों आता,
दिन में कहाँ है वो छुप जाता,
क्या सूरज की गर्मी से डर,
या फिर वो घर में सो जाता,
मुझको उसका घर दिखला दो,
मुझको उसके संग खिला दो ।

चंदा को मामा सब कहते,
फिर क्यों इतनी दूर वो रहते,
बच्चों की नहीं क्यों हैं सुनते,
चौड़ा सा मैदान है उनका,
फिर भी हमसे नहीं खेलते, 
मेरे लिये चंदा को मना लो,
मुझको उसके संग खिला दो ।		 
 
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