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वर्ष: 2, अंक 25, नवम्बर(द्वितीय), 2017



मैनेजमेन्ट,मार्केटिंग,मेडिटेशन


लेखक: पद्मश्री डॉ.गुणवंत शाह
अनुवाद: डॉ.रजनीकांत एस.शाह


बुढऊ ने कहा: इक्कीसवीं सदी में तीन शब्द शासन करेंगे:
मैनेजमेन्ट,मार्केटिंग और मेडिटेशन
भारत में `ज्ञानक्रांति’ हुई थी। ऋगवेद के ऋषि ने एक सूत्र दिया: `प्रज्ञानं ब्रह्म।’
ऋषि ने कहा: ज्ञान ही ब्रह्म है। ज्ञान की ऐसी महिमा अन्य किसी संस्कृति में हुई हो ऐसा लगता नहीं है।

फिल्म `बावर्ची’ में राजेश खन्ना का अभिनय लाजवाब था। इस फिल्म में एक विचित्र सा बुढऊ भी था। क्या आपको याद है? सही वक्त पर मौन धारणकर उचित समय पर वह बुढऊ कुछ वाक्यों में बहुत कुछ कह जाता है। उस जईफ का नाम हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय था। समाजवादी विचारधारा में माननेवाली श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय उनकी पत्नी हैं। घर के झूले पर एक बुढऊ अपनी मस्ती में बैठा हुआ था। घर के छोटे बच्चे भी उस बुढऊ के साथ लाड़ वश मजाक कर रहे थे क्योंकि बुढऊ को स्मार्ट फोन का उपयोग करना आता नहीं था और उसका अस्पृश्यता निवारण हुआ नहीं था। कुछ क्षण तक पुरानी पीढ़ी और नयी पीढ़ी के बीच वाकयुद्ध चलता रहा। अंत में बुढऊ ने कहना प्रारंभ किया। छोटे उनकी बात को सुनते रहे।

बुढऊ ने क्या कहा? सुनिए:

+ इक्कीसवीं सदी में विश्व से छोटे कद की एक भी बात जमनेवाली नहीं है। राष्ट्रीयता की दिशा भी पृथ्वीयता(ग्लोबल) की ओर की होगी। सारे स्केलमाप(नाप तौल)ग्लोबल होंगे। सभी सरहदें धरती पर धरी की धरी रह जायेंगी और मानसिक तथा व्यापारिक स्तर पर सब एकाकार और ग्लोबल होगा।

+आनेवाले समय में दुनिया पर तीन शब्दों का शासन होगा: मैनेजमेन्ट,मार्केटिंग एवं मेडिटेशन। ये तीनों बातें आज तो ग्लोबल बन गई हैं। जो लोग केवल मैनेजमेन्ट और मार्केटिंग में ही रसे-बसे रहेंगे, वे सब ब्लडप्रेशर,डायाबिटीज और ब्लडसुगर की समस्याओं के कारण खाट में पड़े पड़े सडते रहेगे।

+ यदि मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा के साथ मेडिटेशन(ध्यान) नहीं जुडा तो करियर चाहे कितना ही आकर्षक क्यों न हो तथापि खटिया का अभिशाप तो पक्का!

+सदियों पूर्व भारत में `ज्ञानक्रांति’ हुई थी। ऋगवेद के ऋषि ने एक सूत्र दिया: `प्रज्ञानं ब्रह्म।’ ऋषि ने कहा:ज्ञान ही ब्रह्म है। ज्ञान की ऐसी महिमा अन्य किसी संस्कृति में हुआ हो ऐसा लगता नहीं है। ऋगवेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है। भारतीय इतिहास के प्रखर विद्वान् श्री इरफान हबीब ने यह बात अपनी पुस्तक के प्रथम वाक्य में की है। वह पुस्तक मैंने खरीदकर पढ़ी है पर आज कल मिल नहीं रही है। घर की लायब्रेरी में अवश्य वह कहीं सुरक्षित है।

+अनेक सदियाँ बीत बीत जाने के बाद एक और `ज्ञानक्रान्ति’ हुई। भगवदगीता में श्री कृष्ण ने ज्ञान की महिमा गाते हुए कहा:``इस लोक में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ नहीं है। (न ही ज्ञानेन सदृशं पवित्रम् ईह विद्यते)। बात ऐसी है कि `ज्ञान मनुष्य को जीने की दृष्टि देता है। जिसके पास ज्ञान नहीं,वह मनुष्य अंधा है।’

+इस्लाम एक बात को लेकर दावा कर सकता है कि वह ज्ञान और फितरत (प्रकृति) का मजहब है। जो ज्ञानपूर्वक काम नहीं लेते हैं,उनके लिए `इर्शाद’ हुआ।:

उनकी छाती में हृदय तो है,
वे ज्ञान की शक्ति से काम नहीं लेते।
उनके पास आँखें तो हैं, परन्तु
वे देखने की कोशिश नहीं करते।
उनके पास कान तो हैं,परन्तु
वे सुनने की कोशिश नहीं करते।
ये लोग चौपाये जानवर जैसे हैं,
बल्कि उनसे भी गये बीते!

बरसों पूर्व हैदराबाद से मेरे प्रिय पाठक जनाब निसारहुसैन एम.मुखी ने बड़े प्रेम पूर्वक मुझे एक पुस्तक `मानव जीवन’ भेजी थी। इसका मुद्रण 1-1-62 के आसपास हुआ था। वैसे तो यह मो.अली नकीसाहब की पुस्तक `जिंदगी का हकीमाना तसव्वुर’ का अनुवाद है। यह टिप्पणी उस पुस्तक से ली है।

+कृष्णयुग के बाद अनेक सदियों के बाद राजा भर्तुहरि ने तीन काव्यग्रन्थ दिये: शृंगारशतक, नीतिशतक और वैराग्यशतक। भर्तुहरि ने कहा:``ज्ञान तो मनुष्य का विशेष रूप है। उपरांत प्रच्छन्न ऐसा गुप्त `धन’ है। मानव-इतिहास में पहली बार भर्तुहरि ने ज्ञान के साथ धन को जोड़ा। ज्ञानवान होना और धनवान होना असंभव नहीं है। ये कोई एक ही म्यान में न रह सके ऐसी तलवारें नहीं हैं। वैज्ञानिक को प्राप्त एक ही फोर्म्युला से मिलियन डॉलर की कमाई हो जाती है।

+भर्तुहरि के बाद लगभग पंद्रह सदियों बाद फ्रांसिस बेकन ने एक सूत्र दिया:``नोलेज इज पावर।’(Knowledge is Power.) जिसके पास ज्ञानसत्ता है,वही ब्राह्मण कहलाता है। पाश्चात्य देशों में ब्राह्मण किसे कहें? जिसके पास`know how’ हो या expertise हो,वह `ब्राह्मण’ कहलायेगा। ब्राह्मणत्व को अब शिखामुक्त और तिलकमुक्त करके समर्थ और सशक्त बनाना है। ज्ञानसत्ता और वित्तसत्ता के बीच ऐसा कोई पुश्तों पुराना बैर नहीं है। ज्ञान मंगलयान का सृजन करता है और Led बल्ब भी बनाता है।

+फ्रांसिस बेकन के बाद पश्चिम के चिन्तक जहोन नेस्बिर ने `मेगाट्रेन्ड्स’ पुस्तक का प्रकाशन किया और लिखा:`Information is Money in circulation।’ आज हम इन्फोर्मेशन युग में जी रहे हैं। वह तो आख़िरकार साइबर क्रान्ति की ही संतान है। इंटरनेट के कारण दुनिया की समग्र सूचनाएँ उंगली के सिरे पर आ गई है। अब किसी एकलव्य को किसी द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा काटकर देना नहीं पड़ेगा। ज्ञान सार्वत्रिक और सुलभ हो ऐसी यह पहली सदी है।

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साइबरकाफे,साइबरक्राईम,साइबरलायब्रेरी,साइबरहाइवे,साइबरटेररिज्म और साइबर-वोर जैसे शब्द हमारे कानों में गूंजने लगे हैं। इस प्रकार ऋगवेद से शुरू हुआ ज्ञानक्रान्ति का भव्य इतिहास दादाजी ने दस-पंद्रह मिनट में नयीपीढ़ी के टाबरों के समक्ष रख दिया। ये छोटे छोटे टाबर उकताकर दूर भाग खड़े हुए थे। कुछ बड़ी संतानें दादू की वाणी बड़े ध्यान से सुन रही थीं। उन सबको एक वाक्य बहुत भा गया था। `नोलेज इज पावर।’ Knowledge is Power।) ।उनको भर्तृहरि की बात भी समझ में आ जाये ऐसी लग रही थी: ``ज्ञान तो गुप्त धन है।’’

आखिरकार, दादाजी ने एक कहानी के द्वारा अपनी बात ख़त्म की।-एक जवान नदी में डूब रहा था। वह जोर से चिल्लाया: बचाओ।।।बचाओ। यह उसकी आखिरी चीख थी। नदी के किनारे पर टहलने के लिए निकला एक अनजान आदमी नदी में कूद गया और उस डूबते हुए युवक को बचा लिया। बचे हुए युवक ने उस अनजान आदमी को `थेंकयू’ कहा।

अनजान आदमी ने उस युवा से पूछा-``थेंक यू किस लिए?’’ जवाब मिला: ``मेरा जीवन बचा लेने के लिए।’’ तब उस आदमी ने उस युवक से नजरें मिलाते हुए कहा, ``बेटा! तुम जब बूढ़े हो तब तक यह सिद्ध का देना कि तुम्हारी जिंदगी बचा लेने योग्य थी।’’ यह बुढऊ कौन है? यह तो पब्लिक है,सब जानती है,यह पब्लिक है!!!

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समझदारी
`हे लोपामुद्रा!
गुलाब की इन पंखुड़ियों को
किस वसंत ने पैदा किया?
किस ऋतुराज ने तुम्हारे यौवन को खिलाया?
तुम्हारी मधुर तृषा पीते पीते
मेरी तृषा भी और प्यासी हुई है
मेरे सामने देखो!’’
टिप्पणी: श्री कनैयालाल मुन्शी के नाटक `लोपामुद्रा;(अंक-4) में मुनि अगस्त्य इन शब्दों में अपना प्रेम व्यक्त करते हैं।
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