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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



प्रकृति के सौंदर्य का मानव मस्तिष्क पर प्रभाव


सुशील शर्मा


भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १/१९॥
      -महर्षि पतंजलि

प्रकृति हमें पुरुषार्थ सिखाती है।मनुष्य की मूलसत्ता सहयोग परायण और सृजनात्मक है यही दो मूल प्रवृतियां मनुष्य को प्रकृति से प्राप्त हुईं है जिन्हें हम मनुष्य की प्रगति का आधार भूत कारण कह सकते हैं। अन्यथा शारीरिक दृष्टि से अन्य कितने ही प्राणियों की तुलना में उसका पिछड़ापन स्पष्ट है। आधुनिक काल में मनुष्य की जिंदगी में भाग-म-भाग बढ़ने व अधिक काम के बोझ के तले और व्यर्थ की बातो को दिमाग में सदैव रखने से वह मनोवैज्ञानिक रूप से तनाव ग्रस्त जीवनयापन कर रहा है | हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां लोग घर के भीतर और ऑनलाइन समय अधिक से अधिक बिताते हैं -विशेष रूप से बच्चों पर इसका विशेष प्रभाव होता है। स्वस्थ, खुश और अधिक रचनात्मक जीवन का नेतृत्व करने के लिए प्रकृति में अधिक समय बिताने बहुत जरुरी है।प्रकृति हमेशा हमारी भलाई का सोचती है,परिणाम दिखाते हैं कि जो लोग जंगलों में अपना समय बिताते हैं , उनमें हृदय की निम्नतम और उच्चतर गति में परिवर्तन काफी कम था और शहरी जीवन में चलने वाले लोगों की तुलना में उनमें बेहतर मूड और कम चिंता पायी गई।शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति में कुछ ऐसा है जो तनाव में कमी,बेहतर खुशी और सुखमय जीवन के लिए प्रेरित करता है।प्राणी प्रकृति के नियमों में रहते हुये ही अपना जीवन क्रम चलाते है किन्तु मनुष्य प्रकृति के अनुशासन में रहे तो उससे लाभ भी उठा सकता है और उल्लंघन करता है तो उसे हानि भी उठानी पड़ती है। वह लाभ उठाये अथवा दण्ड सहे, यह उसकी अपनी इच्छा की बात है। यह छूट उसे अपनी चेतना का स्वतः विकास करने के लिये मिली है।यदि मनुष्य इस दिशा में कुछ साधनात्मक कदम उठाता है तो वह अपने प्रभाव से प्रकृति को अपने नियम बदलने के लिये बाध्य भी कर सकता है।

स्ट्रेयर की अवधारणा यह है कि प्रकृति के सानिध्य में prefrontal cortex,मस्तिष्क के कमांड सेंटर को आदेशित कर आराम करने की अनुमति प्रदान करताहै, जिससे ज्यादा काम करने वाली पेशियों को आराम मिलता है और ईईजी (EEG)प्रदर्शित करता है की "मिडलाइन फॉर्टल थीटा तरंगों" से आने वाली ऊर्जाका कम क्षरण हो रहा है जो वैचारिक सोच और निरंतर ध्यान के लिए एक आवश्यकऊर्जा केंद्र है।

मोटापा ,अवसाद ,आत्मबल की क्षीणता ये सारी बीमारियां अधिकांशतः उन्हें ही होती हैं जो प्रकृति से दूर होते हैं। वैज्ञानिकों का मत है कि एक समय जो चीजे हमें देवीय और रहस्मयी लगती थीं जैसे ह्रदय की धड़कने ,हार्मोन के परिवर्तन ,मस्तिष्क की तरंगे ये सभी प्रकृति से प्रेरित हैं और इन सब सवालों के उत्तर प्रकृति में छुपे हुए हैं। 2009 में डच के शोधकर्ताओं कीएक टीम ने एक सर्वे किया जिसमें उन्होंने सिद्ध किया कि ग्रीन बेल्ट से आधा मील की दूरी पर रहने वाले लोगों में अवसाद, चिंता, हृदय रोग, मधुमेह,अस्थमा और माइग्रेन कुल 15 रोगों की घटनाएं शहर में रहनेवाले लोगों से कम पाई गईं। और 2015 में एक अंतरराष्ट्रीय टीम 31,000 से अधिक टोरंटो निवासियों से स्वास्थ्य प्रश्नावली कर उनकी प्रतिक्रियाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति के सानिध्य में रहने वाले का ह्रदय और मेटाबोलिक क्रियाएं शहर के कांक्रीट में रहने वाले लोगों की अपेक्षा ज्यादा सुचारु और अधिक ऊर्जा स्तर से काम करते हैं। ऐसे लोगों में ग्रीन स्पेस में रहने के कारण कम मृत्यु दर और हार्मोन में कम तनाव रहता है जिससे व्यक्ति खुश और प्रसन्न दिखता है। प्रकृति में थकान को कम करने की क्षमता के कारण हमारे अंदर रचनात्मकता बढ़ जाती है।

आज, हम लगातार हमारे ध्यान खींचने वाली सर्वव्यापी तकनीक के साथ रहते हैं। लेकिन कई वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारा मस्तिष्क इस तरह की जानकारी के लिए नहीं बना है जिसमे हर समय सूचनाओं की बमबारी होती रहे इससे हमारे अंदर मानसिक थकान, अवसाद और न जाने कौन कौन सी बीमारियां घर कर जाती हैं और हमें मृत्यु की ओर धकेल देती हैं। ऐसे में सामान्य, स्वस्थ स्थिति में वापस आने के लिए "ध्यान की बहाली" आवश्यक होती है जो सिर्फ प्रकृति के सानिध्य से ही प्राप्त हो सकती है। प्रकृति हमें दयालु और उदार बनाती है।जब कभी भी मैं प्रकृति के सानिध्य से लौटता हूँ तो अपने परिवार के प्रति खुद को ज्यादा समर्पित पाता हूँ।

अनेक विद्वानों ने शोधों में यह पाया है कि प्रकृति के सानिध्य में सकारात्मक ऊर्जा हमारे अंदर प्रवाहित होने लगती है जिससे हमारे व्यवहार में उदारता ,विश्वास और दूसरों की सहायता के भाव प्रवाहित होने लगते हैं।अपने खोजों के दौरान वैज्ञानिकों और मानवशास्त्रियों ने यह सिद्ध किया है कि जो व्यक्ति सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों के समीप रहते हैं वो हमेशा सकारात्मक भावों से भरे होते हैं।मनुष्य का अपना देवत्व ही अच्छी प्रवृत्तियां विकसित कर लेता और उनके सत्परिणामों से लाभान्वित होता है किन्तु जब वह प्रकृति से दूर चला जाता है तब उसका अन्तः पिशाच ही दुष्प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट हो उठता और न केवल उसे अपितु दूसरों का भी सर्वनाश करके छोड़ता है। प्रकृति का सानिध्य मनुष्य में देवत्व की शक्ति भर देता है और प्रकृति का आभाव असुरता का प्रतीक है। जीवन यात्रा में उत्पन्न होने वाली विकृतियों के लिए भी प्रकृति ने मनुष्य देह में समुचित प्रबन्ध कर रखा है। मनुष्य जो कुछ खाता-पीता है उससे जीवनी शक्ति को उसकी सहायता के लिये कार्बोहाइड्रेट, (कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) चर्बी, प्रोटीन, विटामिन्स और खनिज द्रव्य मिलते हैं। भोजन में से यह आवश्यक तत्व ग्रहण करने के लिये गले की नली से लेकर आमाशय की छोटी आंतों तक ही पूरी मशीन दिन-रात काम करती रहती है। प्रकृति हमारे मन मस्तिष्क और शरीर सब का पोषण करने में सक्षम है।

प्रकृति का प्रभाव इतना अधिक होता है कि वर्ष में परिवर्तित होने वाले मौसम में भी मनुष्य के मन-मस्तिष्क को प्रभावित एवं परिवर्तित करते हैं।शोध से ज्ञात होता है कि वे लोग जो मानसिक समस्याओं में घिरे हुए हैं, वे प्रकृति के सानिध्य में बेहतर महसूस करते हैं।प्रकृति में रंगों की विविधता भी मानव के व्यवहार और उसके मनोबल को प्रभावित करती है। नीला आसमान, हरी-भरी धरती, रंग-बिरंगे फूल और सुन्दर कलियां यह सब मनुष्य के शरीर और उसकी आत्मा पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।इस बारे में ईरान के मनोविशेषज्ञ डा. इब्राहीमी मुकद्दम का कहना है कि जिस तरह प्रकृति में हमारे इर्द गिर्द हरा, नीला, लाल और पीलेरंग बहुतायत में दिखाई देते हैं और हमारी आत्मा तथा शरीर पर इन रंगों का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है। आकाश का नीला रंग शांति, सहमति, स्वभाव में नर्मी तथा प्रेम का आभास कराता है। हरा रंग, संबंध की भावना तथा आत्मसम्मान की भावना को ऊंचा रखता है।लाल रंग कामना, उत्साह तथा आशा, विशेष प्रकार के आंतरिक झुकाव को उभारता है। सूर्य का पीले रंग का प्रकाश और कलियों का चटखना भविष्य के बारे में सकारात्मक सोच तथा कुछ कर गुजरनेे की भावना उत्पन्न करती है। मनुष्य जीवन की एक विस्तृत प्रक्रिया का नाम समाज है। हम जिस गांव में, मुहल्ले या नगर में रहते हैं—समाज वहीं तक सीमित नहीं। हमारा प्रान्त, हमारा देश, पड़ौसी देश और सारा विश्व एक समाज है। समाज की सीमायें विशाल हैं। अपने आप तक सीमित सुधार की प्रक्रियायें सरल हो सकती हैं किन्तु हम इस व्यापक समाज से इतने प्रभावित और बंधे हुए हैं कि उसकी हर छोटी-बड़ी बुराई से हमारा टकराव हर घड़ी होता रहता है। हमारी सज्जनता, हमारी शुद्धता, हमारा सौष्ठव तभी स्थिर रह सकता है जब सारा विश्व-समाज ही शुद्ध, सज्जन और सौम्य हो। इस जटिल समस्या को हल करना तभी सम्भव है जब विश्व-संस्कृति की सभी भलाई वाली शक्तियां निरन्तर क्रियाशील रहें और बुराइयों पर उसी प्रकार दबाव डालती रहें, जिस तरह शरीर में उत्पन्न होने वाले रोग, शोक और बीमारियों का संहार औषधियों से करते रहते हैं।और यह बिना प्रकृति के सानिध्य में संभव नहीं है प्रकृति ही हमें उन समस्यों के हल दे सकती है जो आज हमें असंभाव्य दिख रहीं हैं।प्रकृति आपको पुरुषार्थी बनाने के लिए कृत-संकल्प है और प्रकृति हमें इस जीवन-संग्राम को जिताने की हर संभव कोशिश करती है।

यह मस्तिष्क प्रकृति के अनुभव की पूर्ण व्याख्या कभी नहीं कर सकता क्योंकि प्रकृति अनंत है। कुछ बातें हमेशा रहस्यमय हमेशा रहेंगीं शायद ऐसा होना भी चाहिए।हम जब प्रकृति की गोद में जाते हैं तो इसलिए नहीं कि हमसे विज्ञान ऐसा करने को कहता है बल्कि इसलिए क्योंकि हमारे अंदर के जीन इसी प्रकृति की देन है हम सभी इसी प्रकृति की संतान हैं और माँ की गोद से सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक कोई दूसरी जगह नहीं हो सकती।

प्रकृति गोद अनुपम अचल
सदा स्वास्थ्य सुख धाम।
प्रकृति के सानिध्य में
मन पाए आराम।
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