Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



जीवन-कला की भाषा में...


-प्रेमलता वर्मा


“प्रवृत्तियों के बदलाव के साथ साहित्य के मानदण्ड भी बदलते हैं, और उसी के आधारपर एक लम्बे युग को कालखण्डों में बाँट कर हम व्याख्यायित करते हैं”(कमलेश्वर)

यूँ साहित्य का इतिहास बताता है कि एक ही काल-खण्ड में अनेक काव्य धारायें समानांतर जारी रहीं एक ही भाषा के भिन्न-भिन्न भी रूपों में और उनकी प्रवृतियां भी अनेकार्थ रहीं| मानव जीवन के विभिन्न पक्षों को अर्थगर्भित रूप से उजागर करने वाली करीब सभी प्रमुख काव्य धाराओं की रचनाये जन मानस को सदियों तक मुग्ध करतीं उनकी सम्वेदना को सहलाती रहीं हैं|

दूसरा तथ्य: हर युग की रचना पहले से भिन्न तो होती ही है बदलती प्रवृतियों के हिसाब से,मगर नये का शोशा अपने पहले युग के साहित्य से ही फूटता है-एकदम से कुछ भी नया नहीं होता| हर रचना की बुनियाद में मानवीय मूल्यों की फुरफुराहट प्रस्तुत रहती है| जीवन की कला सभी श्रेष्ठ रचनाकारों के अपने-अपने समय का केंद्र रही है| ‘कला के लिए कला’ के सिद्धान्त में भाषा को ऐंठा गया,बड़ी तोड़मोड़ की गई| ऐसी सामन्तवादी,ओछी रचना की सफलता केवल कुलीन वर्ग, और नबाबों तक ही सिमित रह सकी उनके ऐश्वय के एक साधन के रूप में, मगर शीघ्र ही यह विचारधारा बुझ गई जन सामान्य तक न पहुंच पाने या उसकी स्वीकृति न पाने के कारण|

यह स्पष्ट कर देना लाजिमी होगा कि भाषा के खिलवाड़ से कोई रचना उत्तम नही बनती| न ही शब्द रचना में तुतला के जब बोले...एक सम्वेदनशील रचनाकार अपने हर शब्द को तोलता है उसके चरित्र को सन्दर्भ को परखता है|

सिद्धांत रचयिता सिर्फ सिद्धांत नापता है विद्वत्ता से , वह कवि नहीं होता|

अच्छी कविता एक सिर्फ अपनी बात नहीं कहती, सुनती भी है...

शब्द में आने से पूर्व, अंतरतम में उसकी रचना प्रक्रिया चल रही होती है...जिए अनुभव की अनुभूति मानस में ध्वनि पैदा करती है; उस ध्वनि से ही कविता के कल्ले फूटने लगते हैं...

यानि अनुभव की एक अपनी लय होती है और जब अनुभव अनुभूति में उतरता है तो वहाँ शब्द नहीं होते सिर्फ अनुभूति की थरथराहट या कम्पन भर होती है...

कितना मुश्किल है इस थरथराहट को सही शब्द में पिरो देना!...ऐसी भाषा दे पाना जो किसी ‘दूसरे (यानी पाठक) के अनुभव में धंस जाय, कुछ जगा के चेतन कर दे... कुछ ऐसा उसे लगे कि रचनाकार ने उसी की बात कह दी है उससे जो वह(पाठक) नही अभिव्यक्त कर सका|

अन्यथा रचना का क्या अर्थ रह जाता है!

रचना प्रक्रिया कोई ऐसी आनन्ददायक प्रक्रिया नहीं होती ; बल्कि अपने साथ जूझने, भोगने और पीड़ा झेलने की प्रक्रिया से गुजरना होता है| फिर चाहे एक कविता ही हो ,वह अपनी असक्षात गति से कवि के अंतरतम में चार माह या उससे भी ज्यादा समय तक रुपरेखा लेने में लगा सकती है. और फिर एक दिन अकस्मात के तर्ज पर प्रस्तुत हो जाती है...

कविता रचना की प्रक्रिया एक प्रागैतिहासिक सुरंग के भीतर चलना है जिसमे क्या है उसका पता पहले से नहीं होता...हो सकता है उसमे पाँव में चुभन पैदा करते शंख और सीपी के टुकड़े भरे हों,झाड-झंखाड़ से झांकता कोई मिथक मौजूद हो... दांत निकाले कंकाल, या काली आर्केडिया के खुले मुख दिखे...फरिश्ते की मुस्कान या शैतान के ठहाके सुनाई दें... या अपने पूर्वजों के संदेश हों किसी ऐसी जबान में जो समझ न आये..फिसलनदार.उबड -खाबड़ पत्थर या चमकता कंचन...या कुछ भी न हो सिवा अपनी सांस के...

बाहर आकर खुली हवा में सांस भर लेने के पश्चात ही पता चलेगा कि क्या हाथ आया! शायद कुछ मूल्यवान या कुछ नहीं...संतोष से भर देनेवाला कुछ या मन धसका देनेवाला ...

*

हर सम्वेदनशील रचनाकार जनता है कि सही भाषा के आभाव में कविता बहरी और गूंगी हो जाती है ...भाषा कविता की देह है और आत्मा की ओर इशारा...भाषा सिर्फ शब्द ही नहीं सन्दर्भ भी है और सन्दर्भ का परिवेश भी.|

मगर भाषा एक ही तर्ज पे, एक ही लय में रचनाकार के मानस में नहीं उतरती,न ही बहुत क्रमबद्ध होकर| उसका नाता भाव सम्वेदना से एक विशेष तरीके से जुडा होता है| विचार चूँकि एक क्रम से हाथ जोड़े पंक्तिबध्य, नहीं आते उसी तरह पहली बार भाषा भी विचार के दूसरे क्षण में, दूसरी सतह पर प्रस्तुत होते वही नहीं होती जो पहली बार, पहले भाव-विचार की सतह पर थी| कविता बनने की प्रक्रिया में अक्सर दोनों में भारी अंतर आ जाता है |खूब अच्छी तरह अनुभूत भाव विचार, अभिव्यक्ति के भीतर काव्य बनने लगता है/सम्भवत: दर्शन का रंग लेकर.या जीवन के विभिन्न पक्षों को तौलते हुए ..दरअसल, दार्शनिक स्तर के भाव ,सम्वेदना से सन्नद्ध हो कर तर्क संगतता तज देते हैं, वे सीधे काव्य की दिशा में मुड़ जाते हैं...स्वप्न सन्नद्ध भाव से इंकार नहीं किया जा सकता; वे भी हमारे यथार्थ के ही रूप होते हैं ,भले समूचे तौर पर यथार्थ न हों| कविता में इतनी आजादी तो होती ही है यानी उसके लिए कोई तर्क नहीं|

(सुनने में यह अजब लग सकता है!)

असली मसला ये है जितना ही वह पाठक की मूल्यगत चेतना तथा सम्वेदना से जुड़ी, विचार उर्जा को (भी)जगा सके,उतनी ही वह सार्थक मानी जा सकती है| कविता किसी आइडीयोलोजिकल शर्त में बंधी न होकर (भी) एक तरह से नैतिक जिम्मेदारी की बात है| इस तरह स्वयम कवि से इमानदारी की अपेक्षा रखती है| वरना भाषा के प्रति गम्भीर न होने पर कविता (मलयज के शब्द में) ‘सपाटबानी’ के सिवा कुछ नहीं रह जाती| ‘सपाटबानी से बचना बेहद जरूरी है|

भाषा को –किसी सैद्धान्तिक ‘वाद’ के कटघरे में रख हथियार की तरह इश्तेमाल करना वाजिब नहीं, बल्कि यह खतरे का एलान है...यहाँ कविता तो अप्रस्तुत है सिर्फ आघात करने की मंशा कार्यरत है...

कविता का परिवेश जब तक सम्वेदना के भीतर जिन्दा या पुनर्जीवित हो ज्योतित न हो उठे कविता की रचना मुश्किल है| विषय चाहे जो हो-वैज्ञानिक,युद्ध सम्बन्धित हो या उषा की पदचाप या राजनीति की जम्हाई ही हो; कला हो या गणित- विषय की कोई सीमा नहीं- विषय कोई छोटा या बड़ा नहीं होता-उसी तरह जैसे “कोई सत्य बड़ा या छोटा नहीं होता”, सिर्फ सत्य होता है- भाषा की लहर पर संतुलन के साथ चढ़ना उसे श्रेय है,उसका प्राप्य है.|

अपने वैविध्य के बावजूद भाषा पर ही कसौटी रखी जाती है क्योंकि भाषा की शिथिलता विषय को अर्थहीन तक बना सकती है...|(जो आलोचक विषय को कसौटी मान लेते हैं,-मेरी समझ से- वे भूल करते हैं) ,विषय की कमी नहीं| विषय की आबादी करीब मानव जाति की आबादी के साथ बढती जाती है...

(लुब्बेलुबाब कवि की तलाश का प्रमुख विन्दु विषय नही, भाषा होता है)

मनुष्य सम्बन्धित कोई भी चुना विषय मानवीय ही होता है रचना के लिए|

फिलहाल इससे यह अंदाजा निकलने से दूर ही रहिये कि अमानवीय हरकतों या अमानवीय सिद्धान्तों को भी जगह देनी चाहिए! जी नहीं हरगिज नही|) अमानवीय सन्दर्भ ,मानवीय विषयों की पुष्टि में आनी चाहिए, जैसे युद्ध का आतंक किस तरह मानव जीवन को असंतुलित कर उसे प्रभावित करता है, जीवनधारा को काट देता है या पंगु बना देता है| इस स्थिति से निजात पाने के लिए युद्ध की अनिमंत्रित क्रूरता की नियत ही जड़ से उखाड देना श्रेय है -मानव और उसके मूल्यों की हिफाजत के लिए| साहित्य रोटी नही देता ,मगर रोटी न देनेवालों को रोटी देने के लिए उसका कान ऐंठता है...

हर हालत में उत्तम साहित्य जीवन सम्बन्धित, जीवन से रस ग्रहण कर जीवन की ही कला पेश करता है|

*

किसी भी विषय के गद्य को भी काव्यमय तरीके से रखना पाठक में सम्प्रेषण को बढ़ा देना होता है | विषय को सुलभ बनाने के लिए यह तरीका हम ‘कार्ल सागन’ का’ Cosmos’ सीरियल में देख सकते हैं जिसमे वह वैज्ञानिक तथ्यों का अन्वेषण कर उसको भोगता है अनुभव के भीतर और उसे दर्शक के आगे सुंदर सुगम काव्यात्मक शैली में बताता जाता है; एक-एक वाक्य को अपनी जबान के भीतर रस लेकर अपने साथ बतियाने में तल्लीन, वह दर्शक के साथ ही सम्वाद में अहरह मौजूद है|इस सीरियल में सागन का वर्णन दर्शक को उसी संसार में ले जा कर रख देता है जिसका वर्णन उस फिल्म में है; उसी भाव संसार में दर्शक तैर जाता है | दर्शक की सहांनुभूति वैज्ञानिक से भी जुड़ के गहरी हो जाती है|वैज्ञानिक कार्ल सागन के साथ दर्शक भी उन समस्त मंजरों को,अपने आगे-पीछे के समयों के साथ वर्तमान में जीता है|

यही नहीं जहाँ तक वैज्ञानिक फैंटेसी का नाता है, वह भी एक तरह से काव्य की ही अनुभूति देता है | देखिये ‘स्टारट्रेक न्यू जनरेशन’ नामक सीरियल -जिसकी कथा स्टीफन हाफकीन्स के सहयोगी एक उच्चतम वैज्ञानिक ने लिखा है- में तमाम ग्रहों की अन्तरिक्ष यात्रा में एक से एक बढ़ के कल्पना का योग कविता की ही अनुभूति से रंगा हुआ है, भले वे घटनाएँ सच न हों| सच वह आनन्द की अनुभूति है जो विलकक्षण अन्तरिक्ष यात्रा में पहुंचा कर,उसका पात्र दर्शक को बना देने से होती है|

दरअसल रचनाकार को अपने एक- एक पात्र में ,एक एक घटना के भीतर अवतरित होना पड़ता है, तभी रचना सम्भव बनती है| कहानी/उपन्यास की रचना में यह तथ्य अधिक उतरता है| उपर उल्लेखित ,ब्रह्मांड के ग्रहों की यात्रा में तमाम फंतासिक घटनायें और विचित्र पात्र आते हैं | वैज्ञानिक लेखक काव्यमय तरीके से उसमे स्वयम को अवतरित करता है| यदि ऐसा न हो तो पाठक के अंदर भी कुछ नहीं घटेगा|

निश्चय ही इसमें भाषा की भूमिका बहुत अहम है|

मै इसी किस्म की भाषा की हमदार हूँ, ठेठ गद्यात्मक भाषा की हैसियत नहीं जानती, न उसमे मेरी दिलचस्पी ही है|पाठक को, फैंटेसी की बुनावट में तैराते हुए न ले जाएँ तो क्या बात बनती है और किस यथार्थ का परिचय उसे रचनाकार दे रहा होता है? किसी का नहीं तो! ठहरे यथार्थ को लेकर क्या करेंगे हम? यथार्थ तो गतिमान होना चाहिए! इसे गतिमान बनाने की चेष्टा ही तो रचनाकार करता है!(चेष्टा ही, ये नही कि वह किसी ठहरे यथार्थ को पूरी तरह गतिमान बना ही देगा) यथार्थ को ज्यूँ का त्यूं सहने की सामर्थ्य तो मनुष्य में है ही नही—हृदय के चारों तरफ यदि झिल्लियाँ न हों तो हृदय की हिफाजत सम्भव ही नहीं!, वह निमिष भर भी न टिकेगा-मर जायेगा| किन्तु प्रकृति ने जिस तरह हृदय को झिल्लियों से ढक के सुरक्षित और गतिमान बना दिया है, उसी तरह मानव के मानस को कल्पना का दान दिया है—माया का आवरण - माया का जादू यथार्थ को मनुष्य के लिए जीने और समझने लायक बनाता है|

इसलिए कविता की अच्छे साहित्य की कला की दरकार हर मसले में,हर विषय में, हर महरले में, हर शामियाने में है|

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें