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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



प्रकाश पर्व


केशव मिश्रा


प्रकाश पर्व का अभिनन्दन,
सबका ज्योतिर्मय हो अंतर्मन।
हमसब मिलकर दीप जलाएं,
इस धरा से अंधेरा दूर भगाएं।
शुद्ध करें निज मन मन्दिर को,
छोड़ें व्याप्त क्रोध-अनल को,
त्यागें मन से लालच-विष को।
विश्वात्म बनें!आत्म मिटाकर,
परमात्म बनें!मैं,को त्यागकर।
ज्योतिपर्व की इस बेला में,
मन का आंगन आलोकित हो।
दीपक जले हरेक दिल में,
सबका तन-मन प्रफुल्लित हो।
पग पग स्नेह का दीप जले,
लौ से सबका अंधियारा मिटे।
मन का अंधेरा चलें मिटाने को,
फैलाकर अपनी बंधी सीमाओं को।
अपनेपन का सबको अहसास दिलाएँ,
मन के बैर भाव को जड़ से मिटाएँ।
क्योंकि!
अंधकार में जब डूबा हो पड़ोसी,
तो हम अपना घर कैसे सजाएँ।
इसलिये!
भेदभाव,ऊँच-नीच की दीवार ढहाकर,
हमसब मिलजुल कर पग बढ़ाएँ।
सबको समर्पित ये दीपमालिका,
और श्रृंगारित ज्योतिर्मय तन मन।
नवल ज्योति से नव प्रकाश हो,
चहुँदिशि यश,वैभव,सुख बरसे।
केशव की ये प्रार्थना,उपजे ज्ञान प्रकाश।
प्रकाश के इस पर्व में,हो सबमे उल्लास।। 
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