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वर्ष: 2, अंक 24, नवम्बर(प्रथम), 2017



काणा नहीं, सेण !


लेखक एवं अनुवादक दिनेश चन्द्र पुरोहित


              

[१]

मंच के ऊपर रोशनी फैलती है, डिपो का मेन गेट-गेट दिखायी देता है ! गेट के पास चौकीदार के बैठने का स्थान मुकर्रर है ! जहां छोटा सा केबिन बना है, जिसकी दीवाल पर एक घड़ी टंगी है ! इस वक़्त दिन के ढाई बजे हैं ! गोदाम से निकलकर, सावंतजी और रशीद भाई आते दिखाई देते हैं ! उन दोनों के कंधों पर लटकता बैग, और हाथ में टिफन यह दर्शा रहा है, के “वे दोनों अब जोधपुर जाने के लिए, काम से फ़ारिग होकर आ रहे हैं ! और अब वे, स्टेशन की तरफ़ जाना चाहते हैं !” उनको आते देखकर, वहां बैठे चौकीदार साबीर मियां उन दोनों को सलाम करते हैं !]

साबीर मियां – [सलाम ठोकते हुए कहते हैं] – सलाम ! [रशीद भाई की तरफ़ देखते हुए] आ गए, चाचा ! आ जाइये, आपके लिए गाडी रोक रखी है ! [पास खड़ी ट्रक की और इशारा करते हुए] तशरीफ़ रखिये, हुज़ूर ! गाड़ी में, बैठ जाइए !

[ट्रक के पायदान पर पांव रखकर रशीद भाई चढ़ जाते हैं ट्रक में, फिर वे सावंतजी से कहते हैं !]

रशीद भाई – [सावंतजी से कहते हैं] – बड़े भाई तशरीफ़ रखिये, आ जाइये अन्दर ! क्यों धूप में खड़े, अपना बदन जला रहे हैं ?

[मगर सावंतजी ठहरे, नखराले..! उनको गाड़ी में बैठाना है, तो दस दफ़े उनकी गर्ज़ करते हुए कहिये के ‘भाईजान, तशरीफ़ रखिये..!” तब भाईजान उन पर अहसान जतलाकर, उनके साथ चलते हैं ! इस कारण, अब इस वक़्त सावंतजी कुछ नहीं बोलकर चुप-चाप खड़े रहते हैं ! मगर उनकी बदक़िस्मत, रशीद भाई गर्ज़ करते हुए दिखायी नहीं दे रहे हैं ! तब लाचार होकर, बेचारे सावंतजी साबीर मियां का मुंह ताकने लगे..शायद रशीद भाई का यह मुंहबोला भतीजा साबीर मियां उनको ट्रक में बैठने के लिए उनसे निवेदन कर दें..? तो फिर, वे उस भतीजे के ऊपर अहसान जतलाते हुए वे ज़रूर बैठ जायेंगे ट्रक में ! मगर सावंतजी को इस तरह ताकते पाकर, साबीर मियां का बोलने का ढंग कुछ अलग ही रहता है, वे कहते हैं...]

साबीर मियां – [सावंतजी से] – जनाब चाचा क्या कह रहे हैं, चढ़ जाइये आप !

[रशीद भाई का अहसान, सावंतजी को कहाँ पसंद..? सबीर मियां को ट्रक में सावंतजी बैठाना होता, तो उन्होंने क्यों बीच में चाचा का नाम लिया ? कह देते साफ़-साफ़, के ‘सावंतजी, जाइये, बैठ जाइए ट्रक में !’ मगर, साबीर मियां ने ऐसा किया नहीं ! आख़िर, गुस्से में सावंतजी कहने लगे..]

सावंतजी – [गुस्से में ] – तू और तेरा चाचा, दोनों जाओ तेल लेने ! ऊपर वाले मालिक ने पांव दिए है, मुझे ! चला जाऊँगा, पैदल-पैदल ! पैदल चलने से मेरे पांव, घिस नहीं जाते !

साबीर मियां – अरे साहब, मत कीजिये शर्म ! करोगे शर्म, तो फूटेंगे करम ! गाड़ी आने का वक़्त हो गया है, इसे पकड़ नहीं पाये तो शाम के छ: बजे तक बैठे रहेंगे आप प्लेटफोर्म पर..गाड़ी का इंतज़ार करते-करते !

सावंतजी – [खीजे हुए बोलते हैं] – बैठा रहूं, तो मैं बैठा रहूंगा ! तूझे क्या फर्क पड़ता है ? आ गया चाचा का भतीजा, बीच में बोलने ?

रशीद भाई – [सर पकड़कर, कहते हैं] – ख़ुदा रहम, ऐसा क्या कह दिया साबीर मियां ने ? जो सावंतजी, इस बेचारे की इज़्ज़त का पलीता कर रहे हैं ? [पेशानी से टपकते पसीने के एक-एक कतरे को साफ़ करते हुए] आ जाइये भाई साहब, आपके नखरे उठाने वाला यहां कोई नहीं है ! अंतिम बार कह रहा हूं, आपको !

सावंतजी – तुझे किसने रोका है ? तू जा, मुसाफ़िर अपनी ज़ोखिम पर सफ़र करता है ! [बड़बड़ाते हैं] ऐसे बोल रहा है, मानो तू दानवीर कर्ण है ? परायी गाड़ी में बैठाकर जतला रहा है, अहसान ! साबीरिया तू भला आया, चाचा का भतीजा बनकर ? काहे कर रहा है, चाचा की वकालत..? तूझे तो कुत्तिया के ताऊ, बाद में देख लूँगा !

[अब बेचारे साबीर मियां करे, क्या ? आख़िर ट्रक को रवाना करते हैं, कुछ ही पलों बाद ट्रक सरपट दौड़ती हुई नज़र आती है ! उसके पीछे से उठ रहे धूल के गुब्बार से उठी उसकी खंक सावंतजी के नासा-छिद्रों में चली जाती है, और सावंतजी खांसते जाते हैं ! ट्रक के जाने के बाद, सावंतजी वक़्त काटने के लिये इधर-उधर निग़ाहें दौड़ाते हैं ! छप्परे के नीचे साबीर मियां ने टेबल पर दूध से भरा ग्लास रखा है, और उसके पास ही साबीर मियां के बैठने की कुर्सी रखी है ! सावंतजी न तो कुर्सी पर बैठ रहे हैं, और ना वे रवाना हो रहे हैं ? उन्हें इस तरह वक़्त जाया करते देखकर, साबीर मियां उनसे निवेदन करते हैं]

साबीर मियां – साहब आपको कहीं नहीं जाना हो तो, खुदा के लिए इस कुर्सी पर तशरीफ़ आवरी हो जाइये ! इस टेबल पर रखे दूध के ग्लास का ध्यान रखिये, तब-तक मैं गोदाम जाकर वापस आ जाऊं ?

सावंतजी – मैं तेरे वालिद का नौकर नहीं हूं, और ना तेरा वालिद मुझे तनख्वाह देता है ? बड़ा आया, मुझे हुक्म देने वाला ? मैं तो जा रहा हूं स्टेशन, अब तू जाने और तेरा काम जाने !

[इतना कहकर सावंतजी अब रुकने वाले नहीं, और झट निकल जाते हैं मेन गेट के बाहर ! बाहर आते ही, उन्हें सामने से लूणकरणजी आते हुए दिखायी देते हैं ! वे उन्हें रुकने का इशारा करते हैं ! फिर, उनसे कहते हैं]]

लूणकरणजी – बड़े भाई साहब, पैदल कैसे रवाना हो रहे हैं आप ? रुको दो मिनट, अभी अपना स्कूटर लेकर आता हूं ! ऐसे आपको, कैसे पैदल जाने दूं ?

सावंतजी – रहने दे, लूणकरण ! पैदल ही चला जाऊँगा ! तेरे काम आ नहीं सका, भय्या ! मेरी लायी हुई सब्जियों से, तूझे करणी दान के घर बनायी सब्जियां बहुत अच्छी लगती है ! हम ग़रीबों को पैदल चलने की आदत है, तू क्यों अपना वक़्त ख़राब करता है ?

लूणकरणजी – [जबरदस्ती अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं] – माफ़ कीजिये, मोटा भईसा ! मुझे छोटा भाई समझकर, आप अपनी नाराज़गी को दूर कीजिये !

सावंतजी – क्या करें, लूणकरण ? यह बढ़ती हुई मंहगाई, इसने तो गरीबों के स्वाद को ख़त्म कर डाला ! तेरी भाभी को पूछता हूं, क्या सब्जी लाऊं ? तब लूणकरण, क्या जवाब मिलता है ? के ‘मिर्चे छाती को जलाती है, भिन्डियां लिपलिपी और लौकी मीठी गट !’

लूणकरणजी – और, दूसरी सब्जियां ?

सावंतजी – बीच में मत बोल, लूणकरण ? बोलने की लय टूटती है, भाई ! ले सुन, आगे ! गवार फली जानो चारा हो, टिंडीयां और लिंडीयां, दाळ छाती बाळ ! आखिर उनसे पूछता हूं, आपको कौनसी सब्जी पसंद है ? तब कहती है “भोड़ा मीठे आलू, और लूण-मिर्च की पुड़ियाँ !” और क्या..

लूणकरणजी – मगर, आपकी लायी हुई सब्जी खाए कैसे ? जनाब सब्जी होती है कम, और ख़ाली झोल ही झोल होता है !

सावंतजी – झोल को रबडी समझकर खा ले, लूणकरण ! कार करेगी यार, अब देरी हो रही है ! अब, तू घड़ी देख !

लूणकरणजी – मुझे मालुम है, आप यहीं खड़े रहना ! स्टेशन पर मेरा भी काम है, आपको छोड़ दूंगा वहां ! जनाब डरिये मत, मैं आप पर कोई अहसान नहीं लाद रहा हूं ! आप यही रहना, मैं स्कूटर और थैली लेकर वापस यहीं आ रहा हूं !

[लूणकरणजी गेट पार करके, डिपो में दाख़िल होते हैं ! अब सावंतजी का मुंह, कमल के फूल की तरह खिल उठता है ! आख़िर इस खिलक़त में कोई ऐसा आदमी तो दिखाई दिया, जो श्रीमान १०४ के नखरे उठाने के लिए तैयार हुआ ! अब उनके दिल में, संतोष की लहरें उठती दिखायी देती है ! मंच पर, अंधेरा फ़ैल जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच पर रोशनी फैलती है ! रेलवे क्रोसिंग का फाटक दिखायी देता है ! लूणकरणजी क्रोसिंग की फाटक बंद होने के कारण, स्कूटर वहीँ रोक देते हैं ! फिर सावंतजी को थैली थमाते हुए, वे उनसे कहते हैं]

लूणकरणजी – [थैली थमाते हुए कहते हैं] – मोटा भईसा, वह वह..

सावंतजी – अरे यार लूणकरण, ‘वह वह’ क्या बोल रहा है ? आगे तो, बोल ! कहीं तेरी लालकी [जीभ] चिपक गयी क्या ?

लूणकरणजी – बोलता हूं, हजूर ! ज़रा, जीभ तालू से चिपक गयी !

सावंतजी – तेरे तालू से चिपक गयी हो तो तू जाने, मगर तू मेरे मत चिपक जाना ! यार तेरी चिपकने की आदत है, बहुत ख़राब !

[इतना प्रभावशाली डायलोग बोलकर, जनाब उतरते हैं स्कूटर से ! फिर जनाब सोचते हैं, के “बिना स्वार्थ कोई आदमी काम करता नहीं, फिर इस लूणकरण जैसे स्वार्थी आदमी से निस्वार्थ सेवा करने की कभी आशा भी नहीं रखनी चाहिए ! इसमें में भी राज़ है, इसने मुझे क्यों स्कूटर पर लिफ्ट दी ? और इसने, यह थैली क्यों थमायी ? इसमें भी कोई इसका स्वार्थ झलकना चाहिए, कहीं यह कामचोर मुझे थैली थमाकर कोई काम तो नहीं सौंप रहा है मुझे ? स्कूटर से उतरकर, अब सावंतजी उन्हें खारे-खारे देखते हैं !]

लूणकरणसा – मैं यह कहा रहा था, जनाब ! कलेक्टर ऑफिस के वे..वे है ना.. दुबले-पतले, क्या नाम है उनका ? अरे जनाब, वही टाटिया..

सावंतजी – सर मत खा, मेरा ! नाम बोल, देवालिया ! इतना बोल गया, अब केवल तुझसे नाम नहीं बोला जा रहा है ?

लूणकरणसा – अरे जनाब, याद आ गया ! ये जनाबे आली वही है जो आपके साथ गाड़ी में रोज़ का आना-जाना करते हैं ! इनका नाम है, गौतमसा ! उनको थैली में पड़े सारे कार्ड सम्भलाकर देने है, कार्ड देकर उनसे कहना के “हजारी लाल बाबूसा के बच्चे की शादी है, आपके स्टाफ के सभी सरदारों को शादी के सामारोह में पधारना है !

[इतना कहते ही, लूणकरणसा झट किक मारकर स्कूटर स्टार्ट करके वहां से चले जाते हैं ! उनके दिल में यही भय रहा “कहीं यह चिड़ोकला सावंतजी, उन्हें वापस थैली न थमा दे ?” उनके जाते ही, उदघोषक की आवाज़ सावंतजी के कानों को सुनायी देती है]

उदघोषक – [उदघोषणा करते हुए] – जोधपुर जाने वाले यात्री प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंचे ! पटरियां पार न करते हुए, उतरीय पुल का उपयोग करें ! पटरियां पार करना, कानूनी अपराध है !

सावंतजी – [होंठों में ही] – यह तो अच्छा हुआ, यहीं मालुम हो गया के ’गाड़ी किस प्लेटफार्म पर आ रही है ?’ नहीं तो ये खोड़ीले रेलवे वाले, पुल चढ़वा देते ? अब करना, क्या? यह चारदीवारी फांदी और ये आये प्लेटफार्म नंबर दो पर !

फिर क्या ? बायें हाथ वाली गली में दाख़िल होकर सावंतजी दस क़दम चलते हैं, फिर प्लेटफार्म नंबर वाली चारदीवारी फांदकर झट पहुँच जाते हैं प्लेटफार्म नंबर दो पर ! इस प्लेटफार्म पर ग्रेनाईट की बने तख़्त पर रशीद भाई बैठे दिखायी देते हैं, उनके पास और भी यात्री बैठे हैं ! सावंतजी को देखकर रशीद भाई अपने लबों पर मुस्कान छोड़ देते हैं, फिर वे उनसे कहते हैं]

रशीद भाई – [लबों पर मुस्कान छोड़ते हुए, कहते हैं] – आपको कहा था ना, ‘बड़े भाई साहब, ट्रक में बैठ जाइए !’ मगर आप बैठे नहीं, और अब आप आये हैं खुरिया रगड़ते हुए ! अच्छा हुआ, गाड़ी लेट है !

सावंतजी – क्या तेरे वालिद ने ट्रक को ख़रीद रखा है, जो आया तू मुफ़्त में बैठाने वाला ? मियां, तुझसे ही लोग सीखेंगे, के “लोगों की गाड़ी में बैठकर, खैरात कैसे बांटी जाती है ?

रशीद भाई – हुज़ूर, यह ख़िलक़त, ख़ुदा के हुक्म से चलता है ! और हम सभी, उसके बन्दे हो ! ये सभी गाड़ियां, उस ख़ुदा के हुक्म से चलती है ! यह ट्रक भी, उस ख़ुदा की है ! अगर इस ट्रक में उस ख़ुदा के बन्दे बैठ जाते हो, तो कौनसा गुनाह हो गया जनाब ? इंसान इंसान के काम में आता है, ख़ुदा ने नूर बाँटते वक़्त क्या कहा था, याद है आपको ?

सावंतजी – अब तू ही बता दे, पूछता क्यों है ?

रशीद भाई – यह कहा, जनाब ! के, ‘तू भला कर ! अगर धन से नहीं कर सकता, तो कर तन से..मन से ! बस जनाब मैं यही खिदमत, करता आ रहा हूं ख़ुदा के बन्दों की !

सावंतजी – देख रशीद, तू बोल तो गया अलफ़ाज़ ‘नूर’, मगर तू जानता है इसका मफ़हूम क्या है ? तकरीर देने के लिए ख़ुदा जाने, कहाँ से आ गया बड़ा तीसमारखां बनकर ? बन्दर क्या जाने, अदरक का स्वाद ?

रशीद भाई – सब जानता हूं, यह मामला मेरी मोहब्बत का है !

सावंतजी – तब सुन, तेरे अन्दर नूर, मेरे अन्दर नूर और सभी जीव-जन्तुओ में नूर..फिर लड़ाई किस बात की ? बता, अब !

रशीद भाई – [भोला मुंह बनाकर कहते हैं] - मैं क्या जानू, जनाब ? मैं बेचारा एक भोला आदमी हूं, वह क्या जाने किसी से नहीं लड़ना ? ख़ुदा के हुक्म से, मैं ज़रूरतमंद लोगों की ख़िदमत करता आ रहा हूं !

सावंतजी – ए ख़िदमतगार की औलाद ! सुन, मेरी बात ! अपुन सब लालच और स्वार्थ के कारण, आपस में लड़ते हैं ! अगर यह नूर या मोहब्बत होता अपने दिल में, तब हम कभी नहीं लड़ते ! न यह करणी दान उस अबोल बकरे की बलि देने के लिए, तलवार उठाता ! तूने कभी अल्लानूर के लालच का किस्सा सुना, या नहीं ?

रशीद भाई – बड़े भाई ये जनाब अल्लानूर मियां है, कौन ? [याद करने के लिए, वे अपने सर पर हाथ रखते हैं] याद आ गया, जनाब ! यह जनाब तो वही है, तबेले वाले ! बेचारे भले आदमी संजीदगी से इस्तीफ़ा देकर, हमें छोड़कर चले गए !

सावंतजी – संजीदगी नहीं रे, अपने फ़ायदे के लिए वोलूंटरी रिटायरमेंट ले लिया ! उस वक़्त सरकार की नीति ही कुछ ऐसी ही थी, बिना स्वार्थ कोई ऐसे क़दम नहीं उठाया करते !

रशीद भाई – बड़े भाई, आपने सही फ़रमाया ! रिटायरमेंट लेकर उन्होंने इतने सारे रुपये उठाये, उतने रुपये तो हम लोगों को अपने वास्तविक रिटायरमेंट पर नहीं मिलेंगे ! जनाब, आप अभी उनके लालच के बारे में बता रहे थे..मेहरबानी करके, किस्सा बयान कीजिये ना !

सावंतजी – [रोब गांठते हुए कहते हैं] – डोफ़ा ! पूरी बात खड़े-खड़े सुनाऊं, क्या ? साले बैठने का नहीं कहेगा, क्या ? चल, उधर खिसक !

[रशीद भाई एक और खिसकते हैं, और सावंतजी को अपने पहलू में बैठाते हैं ! फिर वे अपने बैग से निकालते हैं, पानी की बोतल ! उसे सावंतजी को थमाते हैं, वे पानी के दो घूंट पीकर बोतल वापस रशीद भाई को थमा देते हैं ! इन दोनों की बातें कुछ दिलचस्प लगती है, आस-पास खड़े यात्रियों को ! वे इनके नज़दीक खड़े होकर, इनकी गुफ़्तगू सुनने में अपनी दिलचस्पी दिखलाते हैं ! अब सावंतजी किस्सा बयान करते हुए, दिखायी देते हैं !

सावंतजी – [किस्सा बयान करते हुए] – लीजिये सुनिए, भैंसवाड़ा ठाकुर साहब सार्दुल सिंहजी के तबेले में एक आले दर्ज़ा का भैंसा था ! मैं तो जनाब यही कहूंगा, के वह ज़रूर जंगली भैंसे के क्रोस से पैदा हुआ होगा ! यह जिक्र जब अल्लानूर साहब के सामने आया, तब वे....

पास खड़ा यात्री – अल्लानूर साहब का उस भैंसे से क्या लेना-देना ?

सावंतजी – तू पहले सुना कर, फिर तेरी लालकी को बाहर निकालकर बोला कर ! मैं कह रहा था, एक तरह से वे उस भैंसे के पीछे पागल हो गए ! वे कहने लगे, मैं मेरी विलायती भैंस का क्रोस कराऊँगा तो इसी आले नस्ल वाले भैंसे से ही करवाऊंगा ! क्रोस करवाने के बाद आला नस्ल की संताने पैदा होगी, उनको बेचकर मैं ख़ूब मुनाफ़ा कमाऊँगा ! इस तरह जनाब, वे बन गए पूरे शेखचिल्ली ! मैंने कहा..

रशीद भाई – क्या कहा, जनाब ?

सावंतजी – मैंने कहा, भाई ख्याली पुलाव मत पका ! ठाकुरों की बातें, कुछ अलग ही होती है ! उनसे ताल्लुकात रखना, अच्छा नहीं ! मगर वे माने नहीं, लालच के आगे उनकी अक्ल घास चरने चली गयी !

रूचि दिखाता हुआ दूसरा यात्री – फिर क्या हुआ, जनाब ?

सावंतजी – होना क्या ? ढाक के पत्ते वही तीन, और क्या ? जनाब को चढ़ गयी धुन ! फिर क्या ? ठाकुर साहब को खुश करने के लिए, रोज़ नयी-नयी विलायती शराब पेश करने लगे ! इस तरह, इनकी दोस्ती रंग लाने लगी ! एक दिन शराब के मद में ठाकुर साहब खुश होकर, कहने लगे..

रशीद भाई – क्या बोले, हुज़ूर ?

सावंतजी – उन्होंने कहा के “शेख साहब, आपने हमारी बहुत ख़िदमत की है, हम खुश हैं..कहिये आप हमसे क्या चाहते हैं ? मांगिये !” मगर बेचारे अल्लानूर साहब से बोला नहीं गया, बस वे इतना ही बोल पाए ‘हुज़ूर !’..” हुज़ूर शब्द सुनने के बाद, ठाकुर साहब उनकी पीठ पर एक धोल जमाते हुए कहने लगे “क्या हू हू करते जा रहे हो, शेख साहब ! आप जो मांगोगे वही मिलेगा, आप डरिये मत !”

पहला यात्री – [थोड़ा नज़दीक खिसककर, कहता है[ - बड़े भाई साहब, उन्होंने ज़रूर अपनी मांग, ठाकुर साहब के सामने रखी होगी ?

सावंतजी – [जेब से, ज़र्दे की पेसी निकालते हुए कहते हैं] – डोफ़ा, अब हर बात मुंह से नहीं बोलूंगा ! अब सारी बातें इशारे से कहूंगा..थोडा दिमाग़ लगाकर, समझ लेना..के, मैं क्या कह रहा हूं ?

[अब सावंतजी पेसी से ज़र्दा निकालकर, उसे अपने होंठों के नीचे दबाते हैं ! फिर घूंगे-बहरों की भाषा के संकेतों द्वारा, समझाने की कोशिश करते हैं ! वे एक हाथ की अंगुलियों के पोर, अंगूठे से मिलाकर मध्य में खड्डे की शक्ल बनाते हैं ! फिर उस खड्डे में दूसरे हाथ की मध्यमा अंगुली का पोर डालकर, सावंतजी कहते हैं..]

सावंतजी – अल्लानूर साहब ने यह इशारा करके, ठाकुर साहब को अपनी मंशा दर्शायी ! फिर, उन्होंने ठाकुर साहब से कहा “जनाब, मैं यह चाहता हूं !”

दूसरा यात्री – फिर क्या हुआ, जनाब ?

सावंतजी – फिर क्या ? ठाकुर साहब ठहाका लगाकर ज़ोर से हंसे, फिर एक बार और उनकी पीठ पर एक धोल जमा दिया ! फिर कहने लगे “वाह शेख साहब, आप भी हमारी तरह रसिक निकले ? अब कहिये, किस जाति की मालिश करने वाली औरत आपके रंगमहल में हाज़िर करूं ?” इनकी बात सुनते ही अल्लानूर साहब ऐसे घबराये, के कहीं..

रशीद भाई – कहीं उनको, दिल का दौरा तो न पड़ा ?

सावंतजी – [नाराज़गी के साथ, कहते हैं] – चुप-चाप तुझसे बैठा नहीं जाता, मियें ? कमबख्त, तूने मेरे बोलने की लय तोड़ डाली ! पहले तू सुना कर, फिर बोला कर ! अब सुन, अल्लानूर साहब डरते हुए केवल इतने शब्द ही बोल पाए के “हुज़ूर, आपके भैंसे से...” बस इसके आगे वे एक शब्द बोल नहीं पाए ! ऐसा लगता था, उनकी जबान पर ताला जड़ गया..?

रशीद भाई – [लबों पर हाथ रखकर, हंसी दबाते हुए] – फिर ?

सावंतजी – सुनते ही ठाकुर साहब खुलकर हंसे, फिर पेट दबाकर इतना ही बोल पाए के “भैंसे से ? शेख साहब, क्या इंसान मर गए क्या ?”

रशीद भाई – फिर आगे क्या हुआ, भाईजान ?

सावंतजी – ठाकुर साहब के आंतक से, अब तो अल्लानूर साहब के मुंह से, आवाज़ बाहर आनी बंद हो गयी !

[सन्नाटा छा जाता है, सावंतजी ज़मीन पर पीक थूकते हैं ! फिर, वे आगे कहते हैं..]

सावंतजी – ठाकुर साहब ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाते जा रहे थे, अल्लानूर साहब को ऐसा लगा मानो “उनके सामने, वे ठाकुर साहब न होकर साक्षात रावण है, और वे अट्टहास करते जा रहे हैं ? और उधर उनके ख्यालों में, ऐसा मंज़र दिखाई देता है..मानो सींग उठाये वो भैंसा, तबेले से निकलकर सीधा उनके सामने आ गया है ? और जैसे ही भयभीत अल्लानूर साहब दौड़ने के लिए पीछे मुड़ते हैं..तभी उनके पिछवाड़े में सींग लगाकर, वह भैंसा उन्हें ऊपर उठा लेता है ..?”

पहला यात्री – रामसा पीर, यह क्या कर डाला..बेचारे अल्लानूर साहब के साथ ?

सावंतजी – चुप रह, कुत्तिया के ताऊ ! सारा मज़ा किरकिरा कर दिया, बीच में बोलकर ? ले अब सुन, अल्लानूर साहब ने साकी को अपने नज़दीक बुलाकर उसके कान में सारी बात समझा दी..जो बात वे, ठाकुर साहब को नहीं कह सके ! इसके बाद उस साकी ने ठाकुर साहब के लिए नया जाम तैयार किया, और उस जाम को ठाकुर साहब के हाथ में थमाकर उनके कान में अल्लानूर साहब की कही बात कह डाली !

[पेसी से ज़र्दा निकालकर, सावंतजी उसे अपने होंठों के नीचे दबाते हैं ! फिर आगे का किस्सा बयान करते हैं !]

सावंतजी – फिर क्या ? हक़ीकत सामने आते ही, ठाकुर साहब बहुत पछताए ! फिर, उन्होंनें अल्लानूरसाहब से माफ़ी मांगते हुए कहा “शेख साहब, माफ़ कीजिये..मैंने आपके बारे में ग़लत ख्याल बना लिया !”

रशीद भाई – फिर, आगे क्या हुआ ?

सावंतजी – फिर डर के मारे धूजते अल्लानूर साहब से कहा, “भाई शेख साहब, इस भैंसे को आप ऐसा-वैसा समझने की ग़लती करना मत, आखिर यह है ठाकुरों का भैंसा ! हम ठाकुर लोग कैसे है, यह आप भली-भांति जानते ही हैं !” मगर खां साहब को बहुत उतावली, बिना सोचे-समझे कह दिया “हुज़ूर, आप मिलाप होने दीजिये ! आप फ़िक्र मत कीजिये, नफ़ा-नुक्सान सब मेरा !”

[इतना कहकर, सावंतजी विश्राम करने लगे ! लम्बी सांस लेने के बाद, ज़मीन पर ज़र्दे की पीक थूकते हैं ! अब उनको वापस ज़र्दे की तलब होने लगी, झट पेसी खोलकर निकालते हैं ज़र्दा ! मगर पास खड़े इस पहले यात्री की जिज्ञासा, ख़त्म होने का नाम नहीं..? आख़िर उससे बिना बोले, रहा नहीं जाता..वह झट बोल पड़ता है]

पहला यात्री – बड़े भाई साहब, कहियेगा..आगे क्या हुआ ?

सावंतजी – [क्रोधित होकर कहते हैं] – अरे कुचमादिये के ठीकरे ! यहां तो हमारी भैंस की हो रही है, ऐसी की तैसी ! और तुम लोगों को आ रहा है, मज़ा ? कमबख्त, हास्य-परिहास करते..

पहला यात्री – [घबराकर कहता है] – नहीं, बड़े भाई साहब ! मैं सुनना नहीं चाहता था, मगर यह निखेत गुपालिया ठहरा अलामों का चच्चा ! बार-बार मुझसे कह रहा है, “इनसे पूछ..इनसे पूछ आगे क्या हुआ ?”

गुपालिया – [उसकी पीठ पर, घुद्दा मारता हुआ कहता है] – ऐ रे सांवरिया, मैंने कब कहा तूझे ? मेरा नाम, क्यों झूठा लगा रहा है ?

सावंतजी – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – सावंरिया और गुपालिया, तुम दोनों सुन लेना कान खोलकर..तुम दोनों की निक्कमाई के लिए मेरे पास वक़्त नहीं है ! या तो निक्कमें बैठे रहते हैं नवचौकिये में, या फिर बज़ाज़ी की पोल में ! कुचामादिये के ठीकरे, यह न तो है नवचौकिया और न है यह बज़ाज़ी की पोल ! यह है पाली स्टेशन का प्लेटफोर्म, न जाने ऐसे नमूने कहाँ से आ गए यहां ?

गुपालिया – हम लोग आये हैं जोधपुर से, व भी प्राइवेट बस में बैठकर ! [सांवरिया को टिल्ला देकर, कहता है] क्यों रे सांवरिया, तू भी कुछ बोल रे..!

सांवरिया – हां रे, गुपालिया ! बात ऐसे हुई बस स्टेंड पर हम बैठे थे, और हमारे पास आया प्राइवेट बस का कंडक्टर..उसने बहुत मनुआर के साथ ले जाकर बैठा दिया बस में ! अब यहाँ हम सोच रहे हैं, के ‘रेलगाड़ी का टी.टी.ई. हमारे पास आकर मनुआर करता हुआ यह कहेगा के “चलिए श्रीमान, चलकर बैठ जाइएगा रेलगाड़ी में !” बस, फिर क्या ? हम बैठ जायेंगे रेलगाड़ी में, आख़िर हम ठहरे मनुआर के कच्चे !’

गुपालिया – तूने तो शत प्रतिशत सच्च कहा रे, सांवरिया ! [सावंतजी से कहता है] बड़े भाई साहब सुना दीजिये ना, आगे का किस्सा ! रामा पीर, आपका भला करेगा !

सावंतजी – [खुश होकर कहते हैं] – सुनो आगे, अब तुम दोनों अपने जीवन में उतार लेना..के ‘कभी लालच नहीं करना, जो मिले उसी में संतुष्ट रहना !’

रशीद भाई – सीख बाद में देते रहना, भाईजान आगे कहिये क्या हुआ ?

सावंतजी – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं] – सुनिए, मेरी सलाह न मानकर आख़िर अल्लानूर साहब ने अपनी विलायती भैंस भेज ही दी..ठाकुर साहब के तबेले में ! कुछ वक़्त गुज़र जाने के बाद, अल्लानूर साहब के पास ठाकुर साहब का फ़ोन आया !

रशीद भाई – ठाकुर साहब ने, कुछ कहा होगा ? कहिये, क्या कहा उन्होंने ?

सावंतजी - वे कह रहे थे ‘शेख साहब आख़िर वही हुआ, जो हमने कहा था ! ठाकुरों का भैंसा तगड़ा रहा, अब आप टेक्टर लेकर आ जाइए ! ले जाइए, अपनी भैंस को ! उसकी टांग टूट गयी है, मगर आपका काम बन गया है ! वह गर्भवती है ! रशीद भाई – सारी करामत अल्लाह की है, चलिए अच्छा हुआ आख़िर अल्लानूर साहब का काम बन गया ! बस जनाब, थोडा गम और थोड़ी खुशी ! इसमें, मालिक की ऐसी ही इच्छा रही होगी !

सावंतजी – हाँ रे रशीद भाई, मगर इस अल्लानूर में कहां है अक्ल ? साला पूरा निकला, लालबुझक्कड़ !

रशीद भाई – मैंने सुना है जनाब, अल्लानूर साहब को हकीमगिरी का तुजुर्बा है ! मुझे विशवास है, उन्होंने उस भैंस की टांग ठीक कर दी होगी !

सावंतजी – ख़ाक जाने, हकीमगिरी ? लालच में आकर उसने भैंस के बाटे में अश्वगंधा, हल्दी, शिलाजीत, सूंठ जैसी गरम चीजें डालकर उसे खिला दी ! अरे राम रे, राम..

गुपालिया – मैं सोचता हूं, बड़े भाई साहब ! इतनी सारी दवाइयां खाकर, वह भैंस दौड़ने लगी होगी ? और, आला किस्म का बच्चा पैदा हुआ होगा ?

सावंतजी – डोफ़ा ! दिमाग़ में गर्मी चढ़ गयी, इसके लालच के कारण आला किस्म की पाडी जन्म लेते ही मर गयी और साथ में भैंस भी मर गयी !

[यह सुनते ही, गुपालिया और सावंरिया गम में डूब गए ! वे दोनों अपने सर पर हाथ रखकर ऐसे बैठ गए, मानो उनका कोई रिश्तेदार मर गया हो ? अब सिगनल हो चुका है, थोड़ी देर में गाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनायी देती है ! अब इन दोनों को इस तरह ग़मगीन अवस्था में पाकर सावंतजी को दुःख होता है, फिर क्या ? वे इन दोनों लंगूरों को, फटकारते हुए कहते हैं]

सावंतजी – कुत्तिया के ताऊ, क्या तुम दोनों के माईत मर गए क्या ? भंगार के खुरपों, गाड़ी आ गयी है !

गुपालिया – गाड़ी आ गयी है, तब हम क्या करें ?

सावंरिया – गाड़ी के टी.टी. बाबूजी हमारे पास आयेंगे, और मनुआर करते हुए कहेंगे के “भाई, यहां क्यों बैठे हो ? झट चलकर, बैठ जाइएगा गाड़ी में..

गुपालिया – तब हम फटा-फट जाकर, गाड़ी में बैठ जायेंगे ! आख़िर हम ठहरे, मनुआर के कच्चे !

रशीद भाई – टी.टी. बाबूजी को क्या गरज, तुम लोगों को ले जाने की ? यह ज़रूर हो सकता है, तुम-दोनों को यहाँ निठल्ला बैठे देखकर...ये रेलवे पुलिस वाले, तुम दोनों को पकड़कर हवालात में ज़रूर बैठा देगी ! तब तुम-दोनों, बैठे-बैठे सरकारी ससुराल की हवा खाते रहना !

[सावंतजी और रशीद भाई अपने बैग उठाकर खड़े हो जाते हैं, तभी गाड़ी धम-धम की आवाज़ करती हुई..प्लेटफोर्म पर आकर, रुक जाती है ! प्लेटफोर्म पर खड़े यात्री उतावली करते हुए डब्बों में घुसते हैं, जिससे पाली उतरने वाले यात्री परेशान हो जाते हैं..बेचारे सामान उठाये, एक क़दम आगे चल नहीं पाते ! लोगों को आने-जाने के ठौड़ भी दिखायी नहीं देती, रास्ता अवरुद्ध हो गया है ! तभी रशीद भाई को, डब्बे में चढ़ने वाले यात्रियों में अल्लानूर साहब के भतीज बहादुर जनाब रूपबहादुर शाह के दीदार होते हैं ! भतीज बहादुर को अल्लाह मियां ने बहुत ख़ूबसूरती दी है, मगर बेचारे रहे बदनसीब..बेचारे रूप बहादुरशाह की एक आंख किसी हादसे में चली गयी, तब से बेचारे “एक आंख वाले” यानि काणे हो गए ! इस कमी को छुपाने के लिए, वे हर वक़्त अपनी आंखों पर काले ग्लास वाला ऐनक चढ़ाए रखते हैं ! ऐनक नहीं लगाते तो ख़ुदा कसम कोई इन पर रहम खा लेता, मगर आली ज़नाब झूठे अभिमान के कारण काणे दिखाई देना नहीं चाहते ! इस करण, अब जब कभी एक तरफ़ नज़र नहीं आने से जनाब किसी से टकरा जाते हैं या किसी का पांव कुचल देते हैं..तब इन्हें अगले इंसान द्वारा प्रस्तुत किये गए गालियों के गुलदस्तें, मज़बूरन ग्रहण करने पड़ते ! अगर आली जनाब ऐनक ना लगाते तो शायद कोई इनको काणा इंसान मानकर इन पर रहम खा लेता, और कोई हादसा हो जाने पर अगला आदमी सहानूभूति भी ज़रूर दर्शाता ! मगर ऐसा हो नहीं रहा है, ये कभी सहानूभूति के पात्र नहीं बन पाते ! अब जनाब के दीदार पाकर, रशीद भाई इनको आवाज़ देते हैं ! मगर यहाँ उतरने-चढ़ने की मची हुड़दंग के कारण, रशीद भाई की आवाज़ इन्हें सुनायी नहीं देती ! ये बेचारे, क्या सुनते ? उसके पहले, गाड़ी से उतरने वाला कोई यात्री इनका कोमल पांव बेरहमी से कुचल देता है ! और साथ में, वह यात्री इन्हें धक्का देकर गाड़ी से नीचे उतर जाता है ! इस धक्के के कारण, बेचारे अपना संतुलन खो देते हैं ! एक तरफ़ जिधर इनको दिखायी नहीं देता, उधर खड़े नखराले सावंतजी के पांव ऊपर अपना पांव रख देते हैं ! इनके भारी-भरकम बदन का वज़न, बेचारे सावंतजी के कोमल पांव पर रखा जाना..उन्हें चिढ़ाने के लिए, पर्याप्त है ? बस, फिर क्या ? उनके मुख से, चीख निकल उठती है ! अपने ऊपर गिरे हुए रूप बहादुर को सीधा खड़ा करके, वे उन्हें गालियों का गुलदस्ता भेंट करते हैं !]

सावंतजी – [गालियां बकते हुए कहते हैं] – ए काणिया ! दिखायी नहीं देता, हरामखोर ! गधे की तरह लोगों के ऊपर चढ़ जाता है, नामाकूल ! कमबख्त, मेरा पांव कुचल डाला..हरामखोर ?

रूप बहादुर – [संभलकर कड़वी जबान से कहते हैं] – काणा ? काण्या..क्या कहा जनाब ? आपको बोलने की तहज़ीब नहीं है ? आप बुजुर्ग हैं, इसलिए आपको छोड़ रहा हूं ! नहीं तो हमारी रेशमी जूत्तियां आप पर सवार हो जाती, जनाब !

सावंतजी – [गुस्से में कहते हैं] – ए..ए, लखनऊ के नवाब की औलाद ! उर्दु झाड़ता है, नामाकूल ? बोल, तू क्या कर लेगा मेरा ? पीटना तो है, पीटकर दिखला मुझे ! ले..ले, मार !

[सावंतजी तो इतना कहकर, अपने कमीज़ की बायें चढ़ाने लगे ! मगर, आस-पास खड़े यात्री उन दोनों को समझा-बुझाकर आगे रवाना करते हैं !]

उतरने वाला यात्री – [सावंतजी से] – बड़े भाईसाहब ! आप तो समझदार आदमी लगते हैं, फिर क्यों बच्चों को मुंह लगा रहे हैं ? आप जानते नहीं, आज के बच्चे कैसे हैं ? उनको प्यार से समझाना चाहिए, आपको अभी यह कहना चाहिए था “भाई तू काणा नहीं, सेण है !”

[इतना कहकर, वह यात्री गाड़ी से नीचे उतर जाता है ! उसके उतरने से, रशीद भाई को आगे बढ़ने की जगह मिल जाती है ! वे आगे बढ़कर, सावंतजी के निकट पहुंचते हैं ! उनका हाथ थामकर, वे कहते हैं !]

रशीद भाई – [सावंतजी का हाथ पकड़कर, कहते हैं] – भाईजान, क्यों राह चलते यात्रियों से झगड़े करते जा रहे हैं ? जानते हैं आप, ये साहबजादे कौन हैं ?

सावंतजी – [चिढ़ते हुए कहते हैं] – अब मेरा समय इतना ख़राब आ गया है, के मैं राह-चलते लोगों के गले पड़कर उनसे पूछता रहूं के “भाई, तुम कौन हो ?

रशीद भाई – नाराज़ मत हो, भाईजान ! ये आली जनाब अल्लानूर साहब के भतीजे हैं ! [आश्चर्य करते हुए] और जनाब आप, इनसे से झगड़ा कर रहे थे ?

सावंतजी – [नाराज़गी के साथ] – तब करूं, क्या ? इस साहबज़ादे को खुश करने के लिए, क्या मैं अपने पाँवों में घुंघरू डालकर नाचूं ? पीछे खड़ा यात्री – [लबों पर मुस्कान बिखेरता हुआ कहता है] – यदि नाचने का इतना चाव है तो, जनाब नाच लीजिये ! अच्छे लगोगे जनाब, हिज़ड़ों की हवेली की मुखिया कमला बाई की तरह ! अभी तो आप रास्ता छोड़िये, हमें आगे आने दीजिये !

सावंतजी – [एक तरफ़ होकर, कहते हैं] – पधारो मालिक, कहो तो आपकी कदमबोसी के लिए मखमली कालीन बिछा दूं ?

यात्री – [आगे बढ़ता हुआ] – मेरे लिए, कोई तकलीफ़ करने की कोई ज़रूरत नहीं ! मगर आपके लिए, मखमली कालीन मैं बिछा देता हूं..ताकि आपके टूटे हुए पांवों को, तकलीफ़ कम हो !

[इतना कहकर, वह यात्री जोर-जोर से हंसता हुआ आगे बढ़ जाता है ! अब रशीद भाई और सावंतजी उस केबीन में पहुंच जाते हैं, जहां उनके आगे-आगे ही रूप बहादुरशाह इस केबीन में तशरीफ़ लाये हैं ! और अब वे, खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गए हैं ! रशीद भाई को देखकर, रूप बहादुरशाह अपने लबों पर मुस्कान बिखेरते हैं ! फिर, वे रशीद भाई से कहते हैं]

रूप बहादुर – [मुस्कराते हुए कहते है] – तशरीफ़ रखें, हुज़ूर ! जनाब, आप तो हम बिरादर निकले ! [सावंतजी की तरफ अंगुली का इशारा करते हुए] शायद, ये आपके रफ़ीक होंगे..हमसे ख़ता हो गयी हुज़ूर, इनसे ज़रा कहा-सुनी हो गयी ! [सावंतजी की तरफ़, देखते हुए कहते हैं] भाईजान, गुस्ताख़ी माफ़ करें !

रशीद भाई – साहबजादे, हम बिरादर तो बाद में कहना ! आप हैं, हमारे अज़ीज़ अल्लानूर साहब के भतीज ! इस रिश्ते से आप, हमारे भी भतीजे हुए ! गाड़ी में चढ़ते वक़्त, मियां तुमको कई दफे आवाज़ दी..मगर बूढ़े चच्चा की तरफ देखना तो दूर, जनाब आने-जाने वाले पथिकों से लड़ाई करने में मशगूल हो गये ? आज के लौंडों को, क्या कहें ? जल्द, जवानी के खून में उबाल ला देते हैं !

रूप बहादुर – [सर थामकर कहते हैं] – हाय अल्लाह ! हमने, यह क्या कर डाला ? आप तो हमारे मुअज़्ज़म हैं, हुज़ूर ! आइन्दा ऐसी रज़ील ख़ता, हमसे ना होगी ! [सावंतजी से कहते हुए] चच्चा अब आप हमें कुछ भी कह दीजिये, काणा, काण्या कुछ भी ! हम बुरा न मानेंगे ! इस गुस्ताख़ी ने, हमको मगमूम कर डाला ! खुदा की कसम हमारे इस खब्ती खास्सा ने, मानों हमें ख़ज़ालत में डाल दिया !

[इतना कहने के बाद, रूप बहादुरशाह की आंखों से पछतावे की गंगा-यमुना बहने लगी ! जेब से रुमाल बाहर निकालकर, वे अपने आंसू रुपी मोतियों को रुमाल से साफ़ करने लगे ! फिर, रोनी आवाज़ में कहने लगे]

रूप बहादुरशाह – [रोनी आवाज़ में कहते हैं] – बचपन में शौक रहा, अतिशबाजी का ! हमारे घर पर कोई मुकर्रम अब्बू या चच्चाजान से मिलने आते, हम उनके रुख्सत होने के वक़्त उनके पीछे..कभी अनार चला देते, तो कभी सूतली बम ! बेचारे आवाज़ सुनकर घबरा जाते ! उधर हम, उनकी हालत देखकर तालियां पीटकर हंस पड़ते !

सावंतजी – बेशर्म, कुचमादिया के ठीकरे ! तू तो पूरी ज़िन्दगी बड़े-बूढों के साथ छोर-छिंदी करता आया है ! आगे बोल, तेरे परवरदिगार ने कभी तूझे इसकी सज़ा दी है या नहीं ?

रूप बहादुरशाह – आगे क्या कहूं, हुज़ूर ? वह खौफ़नाक मंज़र रहा, मेरी ज़िंदगी का ! उसे याद करते, मेरा कलेजा हलक़ में आ जाता है ! एक दिन हमने पुराना अनार चला दिया, मगर वह छूटा नहीं, पता लगाने के लिए हम उसके नज़दीक गए ! हाय अल्लाह, वह नामाकूल ऐसा छूटा हुज़ूर..उसके शोले भड़ककर हमारी एक आंख में चले गए, और हमारी यह एक आंख हमेशा..

रशीद भाई – क्या..?

रूप बहादुरशाह – [रोते हुए] – हमेशा के लिए चली गयी, और हम काणे हो गए ! अब इस ज़िंदगी में बचा ही क्या है, चच्चा ?

[अब रूप बहादुरशाह ग़मगीन हो गए हैं, इधर गाड़ी सीटी देती है ! उधर रशीद भाई और सावंतजी, अपनी सीटों पर आराम से बैठ चुके हैं ! थोड़ी देर बाद, वे दोनों अपने बैग को सिर के नीचे दबाकर लेट जाते हैं ! गाड़ी पटरियों के ऊपर, तेज़ रफ़्तार से चल रही है ! थोड़ी देर बाद, मंच पर अंधेरा छा जाता है !]

[२]

[मंच रोशन होता है, केबीन का मंज़र सामने आता है ! सावंतजी, रशीद भाई और रूप बहादुरशाह अपने-अपने स्थानों पर बैठे दिखायी दे रहे हैं ! रूप बहादुरशाह को हर वक़्त काला ऐनक लगाये देखकर, सावंतजी को दिमाग़ में कुबद आती है ! अब वे घूंगे-बहरे लोगों की साकेंतिक भाषा में, रशीद भाई से कहते हैं]

सावंतजी – [अंगुलियां नचाते हुए] – देख रे, रशीद ! अब तू अपनी आंखों से देख ले, के ‘काणे को काणा नहीं कहना चाहिए..उसको सेण कहिये, तब वह अपने-आप बता देगा कैसे फूटा नैण ?’

रशीद भाई – [इशारों की भाषा में, इशारा करते हुए] – वजा फ़रमाया, हुज़ूर !

[अब ये दोनों, क्या करते जा रहे हैं..? रूप बहादुरशाह के पल्ले कुछ नहीं पड़ता, के “ये दोनों मुअज्जम क्या करते जा रहे है ?” आख़िर अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए, रूप बहादुरशाह इन दोनों से सवाल कर बैठते हैं]

रूप बहादुरशाह – इन हाथों को क्या हो गया, चच्चा ? इन अंगुलियों को क्यों नचा रहे हैं, जनाब ?

रशीद भाई – बरखुदार, आपके काम की बात नहीं है ! जो आप इन इशारों को समझ सको ! बस आपको जो समझ में आये, वही समझ लीजिये ! बाकी कोई ऐसी बात नहीं, जो आपके काम की हो ?

रूप बहादुरशाह – सब समझता हूं, जनाब ! आप दोनों नाच-गायन का अभिनय करते जा रहे हैं, ठीक कहा ना चच्चा ? हम भी झट भांप लेते हैं, आख़िर हम भी है रंगमंच के कलाकार !

[सावंतजी उनकी बात सुनकर, ठहाके लगाकर हंस पड़ते हैं ! उनको हंसते देखकर, रूप बहादुरशाह अपनी डींग हांकने लग जाते हैं !]

रूप बहादुरशाह – हंसिये मत, जनाब ! चाहे हमें रंगमंच पर किसी हीरो का रोल नहीं मिला है, तो क्या हो गया हुज़ूर ? मगर, हम चरित्र अभिनेता रोल बेहिचक निभा दिया करते हैं ! अब आपसे क्या कहें, हुज़ूर ?

रशीद भाई – कहिये बरखुदार, आपको कहाँ है..ज़रूरत, इज़ाज़त लेने की ? [रूप बहादुरशाह का चेहरा पढ़ते हुए] यों क्यों शर्मा रहे हो, साहबजादे ? आज़कल की औरतें भी, इस तरह नहीं शर्माती !

रूप बहादुरशाह – [शर्माते हुए कहते हैं] – बस जनाब, यों ही हमें काली ऐनक लगाकर काम करना पड़ता है ! फिर जनाब...

सावंतजी – कभी फैंसी ड्रेस प्रतियोगिताओं में भाग लिया, या कभी किसी जलसे की झांकी में भाग लिया या नहीं ?

रूप बहादुरशाह – चच्चा क्या बेतुकी बातें करते जा रहे हैं, आप ? मैं ठहरा कलाकार रंग मंच का, फिर कैसे मैं झांकियों में भाग लूंगा ?

सावंतजी – बरखुदार, अभिनय की पहला स्टेप है..ये जलसे की झाँकियां ! हजूरे आलिया, कोई मेरी बात आपके आले दिमाग़ में चढ़ी या नहीं ? मेरा मफ़हूम है, के “आपने कभी रामलीला, महाभारत आदि के जलसे की झांकियों में काम किया या नहीं ?

रूप बहादुरशाह – [दोनों हाथ से अपना सिर थामते हुए, कहते हैं] – हुज़ूर यह नाचीज़ अब रंगमंच से निकलकर छोटे पर्दे की तरफ़ बढ़ रहा है, दो-चार ओफ़र भी मिल चुके हैं इस नाचीज़ को..टी.वी. सीरियल में काम करने के ! अब मुझ बेचारे को क्यों घसीट रहे हैं, रामलीला कराने ?

सावंतजी – कहां से आयेंगे, ओफ़र ? जो आदमी जलसे की झांकी या रामलीला के मंच को हरकारी नज़र से देखता है, और वह उस मंच पर काम करना चाहता नहीं..वह कैसे टी.वी. सीरियल में, काम करने का दम भरता है ?

रूप बहादुरशाह – [झुंझलाते हुए कहते हैं] – क्या कह रहे हैं, चच्चा ?

सावंतजी – हक़ीक़त बयान कर रहा हूं, जो बात तेरे कानों में जा रही है ! धुंधाड़ा की ढाणी को तो बरखुदार जानते नहीं, और भाईजान एक सौ चार चले दिल्ली की बातें करने ? भाई तेरा तो वही हाल होगा, जो गुड़-खांड वाले मिर्चू मल का हुआ !

[अब साहबज़ादे के वश में, सावंतजी आते दिखायी नहीं दे रहे हैं ! तब रूप बहादुरशाह रोब गांठने के लक्ष्य से जेब से गोल्डन फ्रेम वाला ऐनक निकालकर, उसे पहन लेते हैं ! मन में यही सोचते जा रहे हैं, शायद थोड़ा-बहुत रोब पड़ जाय सावंतजी पर ? फिर, भाई रूप बहादुर रोब गांठते हुए कहते हैं]

रूप बहादुरशाह – जनाब, ये मिर्चू मल नाम के कलाकार है कौन ? कलाकारों की फ़ेहरिस्त में तो इनका नाम, कभी हमने देखा नहीं ! हुज़ूर यदि आप इन्हें जानते हैं तो, सिलसिलेवार बयान कीजिये ना ! यह रागिब, यह जानने के लिए तरस रहा है ! आपके मेहर से हम, जनाब मिर्चू मल नाम के कलाकार के बारे में सुनकर ख़ुशअख्तर बन जायेंगे !

[इतनी बकवास करने के बाद, सावंतजी का लिया हुए ज़र्दे का नशा छू-मंतर हो जाता है ! अब उनको, पुन: ज़र्दे की तलब पैदा होती है ! जेब से मिराज़ ज़र्दे की पुड़िया निकालकर, अपनी हथेली पर फैलाते हैं ! फिर पेसी से चूना लेकर, उसमें मिलाते हैं ! मिलाकर, अब वे दोनों को अच्छे तरह से अपने अंगुठे से मसलते हैं ! अच्छी तरह से मसलने के बाद, दूसरे हाथ से उस पर लगाते हैं ज़ोर का फटकारा ! इससे, ज़र्दे की खंक फ़ैल जाती है ! जैसे ही यह खंक, रूप बहादुरशाह के नासा-छिद्रों में चली जाते है..रूप बहादुरशाह तिलमिला जाते हैं ! कारण यह रहा, खंक पहुंचते ही वे तड़ा-तड़ छींकों की झड़ी लगा देते हैं ! इधर सावंतजी रशीद भाई के सामने, हथेली आगे करते हैं ! रशीद भाई हथेली से ज़र्दा उठाकर, उसे अपने होंठों के नीचे दबाते हैं ! फिर हथेली में पड़ा, बचा हुआ ज़र्दा रूप बहादुरशाह के सामने लाते हैं ! हथेली सामने आते ही, रूप बहादुरशाह झट अपनी ढाई किलो की घांटकी ना देने के लिए हिला देते हैं ! उनके मना करते ही, सावंतजी बचे हुए ज़र्दे को उठाकर अपने होंठों के नीचे दबा लेते हैं ! अब नशा भी उगता है, ज़ोर से ! और अब सावंतजी को आता है, ज़ोर का ज़ोश !]

सावंतजी – [होंठों के नीचे ज़र्दा रखते हुए, कहते हैं] – बहुत बढ़िया, आपकी अम्मा ने ऐसा नमूना गढ़ा ? आप ऐसे कैसे कलाकार है, ज़न्नत-ए-तहज़ीब को तो आप भूल गए..? चलिए एक शेर पेश करता हूं, ध्यान से सुनना ! “ज़र्दा खाए जगत में, और कुंची खाय के पीक ! बैकुंठ में जाना है बेटा, तो ज़र्दा खाना सीख!” समझे बरखुदार ? [पीक थूकते हैं, फिर कहते हैं] कलाकार को शर्म नहीं आनी चाहिए, चाहे उसे रोल मिले भिखारी का ! सुना, मैंने क्या कहा ?

रूप बहादुरशाह – फ़रमाइये हुज़ूर, हमने कुछ सुना नहीं !

सावंतजी – सुनिए, यह कह रहा हूं डोफ़े ! अगर कभी तुमने भीख नहीं मांगी है तो, ज़र्दा खाना सीख !

रशीद भाई – माशाअल्लाह ! क्या काम की बात कही, हुज़ूर ने ? ज़र्दा तो ऐसी कुत्ती चीज़ है, बड़े-बड़े अफ़सरों और मुस्साहिबों को ज़र्दा माँगते शर्म नहीं आती !

रूप बहादुरशाह – [खिन्न होकर कहते हैं] – चच्चा अब यही काम बाकी रह गया, भीख मांगने का ? तकल्लुफ़ क्यों करते हैं ? हमसे मंगवा लीजिये, भीख ! और अब रहा क्या, बाकी ? मगर पहले आप, आली जनाब मिर्चू मल का किस्सा बयान कीजिये ना ! न तो आप फिर भूल जायेंगे, किस्सा बयान करना !

सावंतजी – मैं यह कह रहा हूं, साहबज़ादे ! “हर चीज़ का ज्ञान किताबों में नहीं मिलता !” कुछ आंखों के सामने गुज़रते वाकये को देखकर, सीखना पड़ता है ! कभी घर से बाहर निकला करते हो, या नहीं ? नहीं निकलते, तब क्या जान पाओगे जोधपुर शहर का नज़ारा कैसा है ? कहां क्या है, कहां कौन रहता है ? ये सारी बातें, किताबों में नहीं मिलती है ! अब सुनो, सेठ मिर्चू मल है गिरदी कोट बाज़ार का मोटा होल-सेल गुड-खांड का व्यापारी !

रशीद भाई – सच्च कहा, जनाब ने ! इनका नाम बहुत इज्ज़त से लिया जाता है, सिंधियों की जमात में !

सावंतजी – चलिए, अब मैं पूरा किस्सा ही बयान कर डालता हूं ! सुनिए..

[सावंतजी किस्सा बयान करते दिखाई देते हैं ! रूप बहादुरशाह और रशीद भाई, तन्मयता से किस्सा सुनते नज़र आते हैं ! उनकी आंखों के आगे, चल-चित्र की तरह वाकया छाने लगा ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है ! रातानाडा सिंधियों की धर्मशाला का मंज़र, सामने आता है ! मंच के पीछे, सूत्रधार की आवाज़ गूंज़ती है..]

सूत्रधार – देश की आज़ादी के बाद, देश में भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते रहे ! पाकिस्तान से बड़ी संख्या में सिन्धी भागकर, जोधपुर आ गए ! यह सिंधियों की कौम व्यापार करने में बहुत चतुर निकली ! यहाँ आकर ये लोग निठल्ला बनकर बैठे नहीं, के “सरकार बांटेगी खैरात तब उठा लेंगे, मगर काम नहीं करेंगे ?” मगर, इन लोगों ने अकर्मण्यता की विचारधारा को निर्मूल साबित कर डाला ! कुछ वक़्त बाद ही इन्होंने व्यापार के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर डाला ! फिर क्या ? देश के किसी बाज़ार का मुआइना किया जाय, हर जगह ये सिन्धी माणू कुकुरमुत्तों की तरह दिखाई देने लगे ! धीरे-धीरे इनकी मेहनत रंग लाई, इन लोगों ने ख़ूब धन-माल और ज़मीन-जायदाद एकत्रित कर ली ! चाहे इन्होंने व्यापार के क्षेत्र में नाम कमा लिया हो, मगर कला के क्षेत्र में ये कोरे ही रहे ! अब इस क्षेत्र में नाम कमाने के मुद्दे पर, एक आवश्यक बैठक आज सिन्धी धर्मशाला में आयोजित की गयी है ! सिन्धी धर्मशाला के बड़े होल में सिंधियों की जमात इस विषय पर बहस कर रही है, तकरीरों का बाज़ार गर्म होता जा रहा है ! सभी सिन्धी लोग इस बात को जोर-शोर से बोलते जा रहे हैं, के “हमने हर क्षेत्र में धन-माल, जायदाद आदि ख़ूब कमाकर इज्ज़त हासिल की है, मगर अभी तक हमने कला के क्षेत्र में नाम क्यों नहीं कमाया ?” अब हाल में बैठे सभी सिन्धी-माणू, जोर-जोर से चिल्लाकर कहते जा रहे हैं “हम लोगों में पैसा और नाम कमाने की क़ाबिलियत है, फिर कला के क्षेत्र में हम क्यों पिछड़ रहे हैं ?”

[इतना सुनते ही, होल में चारों तरफ आवाज़ें गूंज़ने लगी ! हंगामा बढ़ जाता है ! अचानक एक मौज़िज़ आदमी के मंच पर आने से, शान्ति छा जाती है ! सभी सिन्धी माणू मंच की तरफ़ देखते हुए, उस पांच जमात पढ़े हुए उस मौज़िज़ आदमी की बात ध्यान से सुनते दिखाई देते हैं ! अब वह पांच पोथी पढ़ा हुआ सिन्धी माणू, माइक थामकर जोर से कहता जा रहा है]

पांच पोथी पढ़ा हुआ सिन्धी माणू – [माइक थामकर कहता है] – अजी, ऐसा क्यों नहीं करते..कोई नाटक-वाटक रख लें ! जनता ज़रूर देख लेगी, हमारी काबिलियत अभिनय-वभिनय में ! फिर क्या ? हम लोगों को भी, इन पढ़े-लिखे कलाकार लोगों की जमात मान लेगी ! फिर..

[सभा में बैठे लोगों को, इस माणू का नज़रिया बहुत पसंद आया ! फिर क्या ? सभी सिन्धी-माणू, एक मत से प्रस्ताव को मंजूर कर लेते हैं ! प्रस्ताव मंजूर होते ही, तालियों की गड़गड़ाहट, और आभा-वेदी नारे होल में चारों-तरफ़ गूंज़ उठते हैं !]

एक माणू – [नारा लगाता हुआ] – नाटक करके नाम कमाओ !

सभी बैठे सिन्धी माणू – [एक साथ जोर से कहते हैं] – ज़रूर कमाओ, ज़रूर कमाओ !

[सभा में बैठे ये माणू क्या जाने, नाटक-वाटक होता क्या है ? ये बेचारे केवल यही जानते हैं, के “किस भाव से माल लेना और किस भाव से माल बेचना ? और ग्राहकों को कैसे पटाना ?” इसके अलावा, बेचारे जानते क्या ? बस, अब मुफ़्त की बहस करने लगे ! जिसका, कोई मफ़हूम नहीं !]

एक माणू – नाटक-वाटक ज़रूर होगा, मगर कौनसा नाटक खेला जाय ?

दूसरा माणू – [जोर से चिल्लाकर कहता है] – हीर रांझा..हीर रांझा !

तीसरा माणू – [हाथ ऊंचा करके, जोर से बोलता है] – नहीं रे, डोफ़ा! सोवनी महिवाल !

पांच पोथी पढ़ा हुआ माणू – [ज़ोर से चिल्लाता हुआ, कहता है] – अरे मूर्खों ! ज़रा देखो, इन किरदारों को यहाँ जानता कौन ? जोधपुर की पब्लिक है, धर्म-करम वाली ! मैं तो यही कहूंगा, मंच पर खेल लो राम-लीला !

[चारों तरफ़ तालियों की गड़गड़ाहट, और आभा-वेदी नारे गूंज़ने लगे “ठीक है..ठीक है ! मंजूर है..मंजूर है !” सभी लोगों की राय जानकर पांच पोथी पढ़ा हुआ माणू खुश हो जाता है, फिर वह माइक थामकर ज़ोर-ज़ोर से कहता है !]

पांच पोथी पढ़ा हुआ माणू – [माइक थामकर, ज़ोर से बोलता है] – भाइयों मंजूर है..अब किरदार चुन लो ! कौन, क्या बनेगा ? सुन लो, रावण वही होगा जिसके घणी-घणी मूंछ्यां हो ! बोलो, बोलो कौन बनेगा रावण ?

[अब सभा में खलबली मचमच जाती है, ऐसा रोबदार पर्सनलटी वाला कहां से ढूंढें ? इतने में एक परचूनिया, खड़ा होकर ज़ोर से कहता है]

परचूनिया – [खड़ा होकर, ज़ोर से कहता है] – मैं बताऊं, मैं बताऊं..अपना सांई मिर्चू मल है, ना ? मुछड़ मिर्चू मल सांई !

दूसरा माणू – [खुश होकर बोलता है] – मिर्च बेचने वाला है, क्या ?

परचूनिया – अरे नहीं रे, क्या तू इसे पहचानता नहीं है रे ? गिरदी कोट बाज़ार का गुड़-खांड वाला सेठ मिर्चू मल है, सांई ! मूंछ्यां वाला होलसेल व्यापारी, सांई मिर्चू मल है रे !

दूसरा माणू – [हाथ ऊंचा करके कहता है] – ओ सांई सच्च है, तेरे मुंह में घी-शक्कर !

परचूनिया – घी-शक्कर को छोड़, सांई ! मैं बैगर पैसे लिए बेचता नहीं, घी-शक्कर ! आना मत मेरे दुकान पे ! मुझे दुकान ते न आचजां ! जा जा, दूसरी जगह ! बड़ा आया मेरे मुंह में, घी-शक्कर डालने वाला ? मुफ़्त का माल समझ रखा है ? वन्य हली बी दुकां ते !

[इतना सुनते ही, सभी बैठे सिन्धी माणू ठहाका लगाकर जोर से हंसने लगे ! उनके ठहाके सुनकर, वह परचूनिया संभल जाता है के “ये सारे बैठे सिन्धी माणू, उस पर हंसते जा रहे है ! अब वह तुनकमिजाजी दिखलाता हुआ, ज़ोर से बोलता है !]

परचूनिया – [चिढ़ता हुआ, कहता है] – सुन ले रे, फिर हंसते रहियो हिज़ड़े की तरह ! मैं कह रिया था, वह सेठ मिर्चू मल घणी-घणी मूंछ्यां वाला रोबदार आदमी है..ख़ूब जचेगा, रावण बनकर ! सुना, सांई ?

[फिर क्या ? सर्व सम्मति से, रावण के किरदार को मंजूर कर लिया गया ! बाकी के किरदारों को चुनने में, कोई तकलीफ़ आयी नहीं ! इस तरह धीरे-धीरे, सभी किरदारों का चयन कर लिया गया ! अब राम-लीला के श्री गणेश करने के लिए, अगला कार्यक्रम तैयार कर लिया गया ! थोड़ी देर बाद, मंच पर अँधेरा छा जाता है ! कुछ समय बाद, मंच वापस रोशन होता है ! सावंतजी किस्सा बयान करते दिखायी देते हैं ! रशीद भाई और रूप बहादुरशाह दताचित होकर, किस्से को सुनते नज़र आ रहे हैं !]

सावंतजी – मगर, एक दिन..

रूप बहादुरशाह – क्या, मंच टूट गया ?

सावंतजी – [लम्बी सांस लेकर आगे कहते हैं] - कुछ दिन बाद, मंच पर अशोक वाटिका का मंज़र दिखायी दे रहा था ! हनुमान का रोल कर रहा था, वो दुबला-पतला सिन्धी-माणू..जिसकी बाटा कंपनी की जूत्तों की दुकान, सोजती-गेट के अन्दर है ! अब वो सिंधी माणू हाथ में गदा लिए, पेड़ों को नीचे गिराने का मंतव्य बना रहा था ! वह जिस तरफ़ गदा घूमाने की कोशिश करता, गदा के वज़न के कारण उसका शरीर स्वत: उसी तरफ़ झुक जाया करता !

रशीद भाई – आगे क्या हुआ, भाईजान ?

सावंतजी – सुनो ! ऐसा लगता था, वह गदा घूमा नहीं रहा था..बल्कि, गदा उसे घूमाती जा रही थी ! इस गदा के वज़न के कारण वह हनुमान बना सिन्धी माणू कभी इधर गिरता, तो कभी वह दूसरी तरफ़ गिरता नज़र आता ! पेड़ों को गिराने की कोशिश, वह क्या करता ? वह बेचारा कई बार, उन पेड़ों के नीचे ज़रूर दब जाता !

रूप बहादुरशाह – ख़ुदा रहम, कहीं बेचारे चिड़ीमार हनुमान का कचमूर तो नहीं निकाल डाला..इस डायरेक्टर के बच्चे ने ?

सावंतजी - उस बेचारे की ऐसी करुण दशा देखकर, सभी दर्शक ज़ोर-ज़ोर से हंसते जा रहे थे ! किसी तरह से वह, अशोक वाटिका वाले मंज़र को पूरा करता है ! अब पर्दा गिरता है, रावण के दरबार का मंज़र सामने आता है ! दरबार में हनुमान को, सैनिक पकड़कर लाये हैं ! एक बात आपको याद दिला देता हूं, सेठ मिर्चू मल की पत्नि का नाम भी सीता ही था !

[सावंतजी किस्सा बयान करते जा रहे हैं, रशीद भाई और रूप बहादुरशाह की आंखों के सामने रावण के दरबार का मंज़र छा जाता है ! मंच पर अंधेरा छा जाता है ! थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है ! रावण के दरबार का मंज़र सामने आता है ! रावण के सैनिक हनुमान को पकड़कर, दरबार में लाये हैं ! अब हनुमान रावण को जय रामजी की करता है !]

हनुमान – [अभिवादन करता हुआ कहता है] – ओ रावण सांई, राम, राम !

रावण – थैली में रख तेरा राम, अब बोल क्या लेने आया है सांई ? कित्ता बोरी गुड़..?

हनुमान – बोरी लूंगा, बाद में ! पहले दे दो, सीता माई !

रावण – [गुस्से में कहता है] – क्या बोलिया रे, चिड़ीमार ? शर्म नहीं आती, आ गया कमबख्त मेरी लुगाई को मांगने ? भीखमंगे कहीं के..

हनुमान – [बात काटता हुआ कहता है] – सांच बोलिया रे, सीता माई को ले जाऊंगा रे..

रावण – [ज़ोर की गर्ज़ना करता हुआ] – क्या कहा, बन्दर के बच्चे..?

[इस रावण बने मिर्चूमल की कड़कती आवाज़ सुनकर, हनुमान बना माणू सहम जाता है, और भूल जाता है सही डायलोग बोलना ! बस बेचारा त्रिलोक वाली के स्थान पर बोल देता है तीन लोग वाली !]

हनुमान – [डर के मारे, बोल देता है] - वो..वो, तीन लोग वाली सीता माई फटके से लाकर दे दे ! नहीं तो..

[तभी दर्शक गण ताली पीटते हैं, इससे उस हनुमान का जोश बढ़ जाता है ! अब वह भारी-भरकम गदा को घुमाने की कोशिश करता हुआ, फिर कहता है]

हनुमान – [गदा घुमाने की कोशिश करता हुआ, कहता है] – नहीं लाया तो इस गदा से तेरा सिर फोड़ दूंगा रे..!

[यह जुमला सुनते ही, रावण बने मिर्चूमल को बहुत गुस्सा आता है ! उसके दिल में उस चिड़ीमार हनुमान के प्रति खार पैदा होता है, वह गुस्से में बेक़ाबू होकर सोचने लगा..]

रावण – [होंठों में ही] - “इस साले जूत्ते बेचने वाले चिड़ीमार हनुमान में कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी, जो भरी सभा में बेहिचक होकर मेरी पत्नि सीता को माँगता जा रहा है ? और यहां भरी सभा में आकर बोल रहा है, मेरी लुगाई है तीन लोग वाली यानि तीन मर्दों वाली ? यह कोई द्रोपदी है..? मेरी सीता को तू द्रोपदी बनाने वाला, तू है कौन ?”

[इस चिड़ीमार का बदन तो हिल रहा है, जैसे हवा के एक झोंके से पीपल का पान फड़फड़ाता हुआ हिल रहा हो ? फिर क्या ? गुस्से के जालो-ज़ाल में फंसकर वह रावण बना मिर्चू मल, ज़ोर-ज़ोर से गंदी-गंदी गालियां बकता है !]

रावण – [गुस्से में बकता है] – तेरी भेण की..[अश्लील गालियां बकता हुआ, तलवार घूमाकर कहता है] कमबख्त, तू क्या बक रहा है ? तेरी लुगाई होगी दस जनों की, दस क्या ? बीस लोगों की होगी, साला लुगाई का दलाल ! मर इधर, तेरा खून पी जाऊँगा !

[फिर क्या ? साज़ बजाने वालों ने, तबले पर जून्झारु थाप देने लगे ! और इधर मंच के पास बैठने वाले दर्शकों ने, हनुमान का ज़ोश बढ़ाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से जयनाद करने लगे !]

मंच के पास बैठा माणू – [खड़ा होकर जयनाद करता है] – बोलो रे बोलो, हनुमान लल्ला की !

सभी दर्शक – [ज़ोर से चिल्लाते हैं] – जय हो..जय हो !

मंच के पास बैठने वाला माणू - [ज़ोर से, कूदता हुआ बोलता है] – जय श्री राम !

सभी दर्शक – [ज़ोर से चिल्लाते हुए] - जय श्री राम !

[राम-लीला देख रहे बच्चों के बदन में, ज़ोश उछाले खाने लगा ! वे झट मंच के ऊपर चढ़कर बैठ जाते हैं, और ज़ोर-ज़ोर से जयनाद करते जा रहे हैं ! इन बच्चों का सपोर्ट पाकर हनुमान बने सिन्धी माणू को, आ जाता है ज़ोश ! वैसे भी हनुमान ठहरा, रामजी का भक्त ! इस कारण उसके ज़ोश की कोई सीमा नहीं, इस ज़ोश के मारे वह अपना आपा खो देता है ! और वह रावण को अंट-शंट बकना शुरू कर देता है ! अब वह गदा से रावण को धमकाने की कोशिश करता है, मगर यह क्या ? वह ठहरा सींकिया पहलवान, वह गदा क्या उठा पाता ? वह जिस तरफ़ गदा को घूमाना चाहता है, बस उसी तरफ़ उसका पूरा बदन झुक जाता है ! वह बेचारा डोलर हिंडे की तरह कभी इधर तो कभी उधर डोलता..और लोगों को, हंसाता जा रहा है ? वह बेचारा दुबला-पतला आदमी, कैसे गदा को संभाल पाता ? वह गदा को क्या पटकता ? देखा जाय तो, वास्तव में गदा उसे घूमा रही है ! आख़िर गदा को न संभाल पाने से, वह बेहताशा नीचे गिर पड़ता है ! और वो गदा उसके पांव पर आकर गिरती है, बेचारा हनुमान बना सिन्धी माणू दर्द के मारे चिल्ला उठता है ! और चिल्लाता हुआ, ज़ोर-ज़ोर से कहता है..]

हनुमान – [चिल्लाता हुआ, जोर से कहता है] – अरे मेरी मां, इस रामड़े ने मुझे यहां भेजकर मेरा पांव तुड़वा डाला..साला गधा मुझे यहां भेजकर, अब ख़ुश हुआ होगा ? कहता था, जा मेरी लुगाई का पत्ता लगा ! [पांव दबाता हुआ] अब यहां आकर क्या देखता हूं, यह सीता आखिर है किसकी लुगाई ? मार डाला, मुझे इस झगड़े में फंसाकर ?

[अब यह खिलका देखकर, दर्शक ठहाका लगाकर हंसते जा रहे हैं ! उनकी हंसी सुनकर, वह रावण बना मिर्चू मल अपनी मूंछों पर ताव देने लगा ! और साथ में, वह ज़ोर का अट्टहास कर बैठा ! पर्दे के पीछे खड़ा पांच पोथी पढ़ा हुआ माणू, हनुमान बने माणू को समझाने लगा के झट डायलॉग सुधार ! वह चिड़ीमार हनुमान झट उठकर, खड़ा हो जाता है ! और संभलकर डायलॉग में सुधार लाने की भरसक कोशिश करता है, मगर फिर भी उसे ‘त्रिलोक वाली’ शब्द याद आता नहीं और वह फिर बोल देता है ‘तीन लोग वाली !’ उधर पांच पोथी पढ़े माणू का गुस्सेल चेहरा उसकी आँखों के आगे छा जाता है, इस तरह अब वह उसे ख़ुश करने के लिए रावण को अपशब्द कहने लगता है !]

हनुमान – [अपशब्द कहता है] – अरे ओ गुड़-खांड वाले, तेरी ऐसी की तैसी ! मैं रामजी का सेवक तेरा सर फोड़कर ले जाऊंगा, ले जाऊंगा..लेकर जाऊंगा सीता माई को रामजी के पास ! तेरी नहीं है रे, सीता माई ! हमारी है सीता माई, रामजी की लुगाई ! रामजी के हुक्म से ले जायेंगे, तीन लोग वाली को..तुझे जो कुछ करना है, वो कर..ओ गुड़ खांड वाले मुछड़ !

[अब तो बात बहुत बढ़ गयी, रावण बना हुआ मिर्चू मल कैसे करें सहन ? के “उसकी लुगाई को, कोई सरे आम उठाने की कोई आकर बात करे ?” क्रोध में अँधा होकर, वह तलवार लिए सिहासन से कूद पड़ता है..और वार करता है, उस दुबले-पतले हनुमान पर ! इधर मच जाती है ज़ोर की जंग, तबलची तबले पर देते हैं थाप ! नीचे बैठे दर्शक दोनों वीरों का ज़ोश बढ़ाने के लिए, बजाते हैं तालियाँ !]

रावण – [तलवार का वार करता हुआ, गर्ज़ना करता है] – ले खा, मेरी शमशीर का वार ! अब तूझे और तेरे रामजी को भेजता हूँ, तेल लेने !

[यह चिड़ीमार हनुमान ठहरा, फुर्तीला ! वह झट वार बचाकर, रावण के पीछे आकर खड़ा हो जाता है ! फिर गदा हिलाता हुआ बोलता जाता है ! मिर्चू मल ठहरा भारी शरीर वाला, वह इधर मुड़े, तो यह सींकिया हनुमान उसके पीछे छिप जाता है और वह उधर देखता है ! तब वह शैतान का ताऊ उसके पीछे आकर, उसके पिछवाड़े पर चिमटी काट जाता है ! इस तरह यह माता का दीना, अब हाथ आता नहीं ! ऊपर से इस हनुमान के बोले गए शब्द, रावण को उकसाते जा रहे हैं !]

हनुमान – ओय रावण का बच्चा, फटके से दे दे मुझे तीन लोग वाली सीता माई !

[अब सरे-आम अपनी इज़्ज़त की बखिया उधडती देखकर, मिर्चू मल का गुस्सा पहुँच जाता है सातवे आसमान पर ! अब क्रोध के मारे मिर्चू मल स्टेज पर बैठे बच्चों को उठा-उठाकर, उस सींकिये पहलवान के ऊपर पटकना लगा ! गिरते ही, बेचारे बच्चे दर्द के मारे चिल्लाने लगे ! तब उधर इन बच्चों के माता-पिता, उनका चिल्लाना सुनकर शोर मचाने लगे ! मगर, तबलची और सटोरियों को मज़ा आने लगा ! इधर ये तबलची तबले पर देते हैं, थाप ! तो उधर सटोरियों की बोली ऊंची होती जा रही है ! सटोरिये ज़ोर-ज़ोर से बोलते जा रहे हैं “हनुमान पर लगाओ, भय्या ! एक के सौ, एक के सौ !” चारों तरफ़, तालियों की गड़गड़ाहट बढ़ती जा रही थी ! कई खोजबलिये दर्शक ठहरे, फितूरिये ! वे लोग सड़े-अंडे, टमाटर और फटे जूत्ते इन दोनों शूर वीरों पर, फेंकने का आनन्द उठाने लगे ! यह मंज़र देखकर, पांच पोथी पढ़ा हुआ माणू अपना सिर पीट लेता है ! फिर स्थिति नाक़ाबिले बर्दाश्त होने पर, वह वापस आकर माइक थाम लेता है ! फिर, ज़ोर-ज़ोर से कूकता हुआ कहता है..]

पांच पोथी पढ़ा हुआ माणू – [माइक थामकर कहता है] – अरे, ओ भंगार के खुरपों ! तुम्हें आता कहां है, नाटक खेलना ? ग़लती की मैंने, तुम जैसे गंवारो को मैंने नाटक खेलने का सुझाव दिया ! [पर्दा गिराने वालों को कहता है] अरे, ओ लंगूरों ! अब शर्म कर लो, नालायकों ! अब तो पर्दा गिरा दो, बहुत नाम कमा लिया तुम लोगों ने ?

[पर्दा गिराने वाले कार्यकर्ता, पर्दा गिराते हैं ! फिर कहीं जाकर, हंगामा ख़त्म होता दिखायी देता है ! मंच पर अंधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद गाड़ी का मंज़र वापस सामने आता है ! सावंतजी अपने होंठों के नीचे ज़र्दा दबाते हुए दिखायी देते हैं ! इन दोनों को आँखे फाड़े देखकर, सावंतजी गुस्से में कहते हैं..]

सावंतजी – क्या आंखें फाड़कर देख रहे हो, लंगूरों की औलादों ? अब तुम्हारे पास, कोई काम-धंधा नहीं है क्या ?

रूप बहादुरशाह – हुज़ूर, आगे क्या हुआ ? बयान कीजिये ना, प्लीज़..हमारी दिल-ए-तमन्ना को पूरी कीजिये ना !

सावंतजी – क्या बयान करें रे, लंगूर ? बस उस दिन से से इन सिन्धी लोगों ने नाटक नहीं खेला, इन लोगों ने कसम खा ली के “अब हम, कभी नाटक नहीं खेलेंगे ! बस केवल व्यापार ही करेंगे, बस उसी में नाम कमाना ठीक है !”

रशीद भाई – शत-प्रतिशत सच्च कहा, भाईजान ! जिसका जो काम है, उसे वही काम करना चाहिए ! यह सच्च है, हर कोई कलाकार नहीं बन सकता !

सावंतजी – [रूप बहादुरशाह से कहते हैं] – अब समझ गए, साहबज़ादे ? यह बात हलक से नीचे उतार लीजिये, के “मंच पर चढ़ने के बाद आप अपने-आपको भूल जाइए, के आप वास्तव में क्या हैं ? उस वक़्त बस आपको केवल किरदार के अन्दर घुसना है, के जिस किरदार का रोल आपको दिया है..बस आप वही हैं, इसके अलावा आप कुछ नहीं है ! आपको तो उस किरदार में खो जाना है !

रशीद भाई – और यह समझ लीजिये, साहबज़ादे ! के “आप वही किरदार हैं, जिसका रोल आपको दिया गया है !” उस वक़्त आप यह भूल जाओगे, के “आप रूप बहादुरशाह है !”

रूप बहादुरशाह – [आश्चर्य करते हुए] – क्या कहा जनाब, क्या मैं रूप बहादुरशाह नहीं हूं ?

सावंतजी – वज़ा फरमाया है, रशीद भाई ने....स्टेज पर चढ़ने के बाद, आपको बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि “आपको पूरा दिखायी नहीं देता है, या आप काणे है ? भूलना होगा आपको, के कोई नामाकूल देख तो नहीं रहा है आपकी काणी आँख को ! खुदा रहम, कहीं रोल करते हुए आपकी बुलंद निग़ाह किसी ख़ूबसूरत हसीना पर गिर गयी..हाय खुदा, तब आगे क्या होगा ? ये बातें आपको नहीं सोचनी है, बस !”

रशीद भाई – [रूप बहादुरशाह का पक्ष लेते हुए] – भाईजान, क्यों बच्चे को परेशान करते जा रहे हैं ? बस बात इतनी सी है, आप किसी जलसे की झांकी में इनको देखना चाहते हैं ! बस, फिर वही बात कीजिये न ! दूसरी माथापच्ची, करने की क्या ज़रूरत ? [रूप बहादुरशाह से कहते हुए] बोलिए साहबज़ादे, तैयार है ना आप..कलाकार होने का सबूत पेश करने के लिए ? दे दीजिये सबूत, जलसे की झांकी में भाग लेकर !

रूप बहादुरशाह – [ज़ोश में आकर कहते हैं] – अल्लाह कसम ! कर लूंगा रोल, जनाब जब चाहे आप बुला लेना हमें ! आपका हुक्म तामिल होगा, आप जिस झांकी का रोल देंगे कर लूंगा ! याद रखना हुज़ूर, यह बन्दा अपने सभी काम छोड़कर आपकी ख़िदमत में हाज़िर हो जाएगा !

[ स्टेशन ‘भगत की कोठी’ पीछे रह गया है, अब गाड़ी सीटी बजाती हुई आगे बढ़ती जा रही है ! अब जोधपुर स्टेशन का सिंगनल दिखायी दे रहा है ! अपने बैग को कंधे पर रखते हुए, रूप बहादुरशाह रुख्सत होने के लिए खड़े हो गए हैं ! खड़े होकर, वे दोनों मुख्तसरों को सलाम करते हैं ! गाड़ी की रफ़्तार, कम होती जा रही है !]

रूप बहादुरशाह – [सलाम करते हुए, कहते हैं] – हुज़ूर, आदाब ! हुज़ूर, रुख्सत दीजिये !

[इतना कहकर, रूप बहादुरशाह चले आते हैं...डब्बे के दरवाज़े के पास ! और अपने दिल में, यही बात सोचते जा रहे हैं..]

रूप बहादुर – [सोचते हुए] – गनीमत है, जोधपुर स्टेशन आ गया और जान छूटी इन बूढ़े ख़बती नामाकूलों से ! यह स्टेशन नहीं आता तो ये ख़बती लोग, न जाने मेरा क्या हाल करते ? वह तो, अल्लाह मियां ही जाने !

[मगर इन मुख्तसरों के ऊपर, क्या असर होने वाला ? उनके जाते ही, रशीद भाई ज़ोर से हंस पड़ते हैं ठहाका लगाकर ! फिर वे, सावंतजी से सवाल कर बैठते हैं..]

रशीद भाई – [ठहाका लगाकर कहते हैं] – भाईजान, साहबज़ादे को किस झांकी में बैठा रहे हैं, और किस किरदार का रोल दे रहे हैं आप ?

सावंतजी – [लबों पर मुस्कान बिखेरते हुए, कहते हैं] – ऐसा करते हैं, महाभारत की झांकी रख लेते हैं और साहबज़ादे को मामा शुकुनी का रोल दे देते हैं..फिर, कैसा रहेगा रशीद भाई ? बन्दे को एक आंख बंद करने की कोई ज़रूरत नहीं ! क्योंकि साहबज़ादे एक आंख वाले, यानि पहले से ही काणे है !

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] - नहीं भाईजान, ऐसा मत कहिये ! जनाब, आप ऐसे कहिये..काणा नहीं, सेण...!

[अचानक गाड़ी रुक जाती है, सावंतजी खिड़की से बाहर झांकते हैं ! मालुम पड़ता है, जोधपुर स्टेशन के प्लेटफोर्म नंबर एक पर गाड़ी आकर रुक गयी है ! प्लेटफोर्म पर ठेले खींच रहे वेंडरों और कुलियों का शोर बढ़ गया है, अत: अब इस शोरगुल के आगे रशीद भाई की आवाज़ दब जाती है ! गाड़ी के अन्य यात्रियों के साथ, अपना बैग उठाये ये दोनों महानुभव भी....गाड़ी से उतरकर, प्लेटफोर्म पर क़दमबोसी करते नज़र आते हैं ! मंच पर, अंधेरा छा जाता है !]

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