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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020

मालवी लघुकथा:
नाना यो कई है

राजेश भंडारी “बाबू”

एक गाव में एक बुडी दादी अपना ओटला बैठी थी साथेज उको छोरो भी उका साथे बैठो थो ,छोरा की उमर होगी याज कोई ३०-३५ साल की | बुडापा का कारण डोकरी कई भी उलटी सीधी बात करती रेती थी | इतरा में वा एक कागलो आई के बैठी गयो तो माँ ने पूछियो बेटा से के नाना यो कई है ? छोरो बोल्यो बई यो कागलो है इके अपन सराद में पुड़ी भज्जा खावाडा हां | थोड़ी देर बाद माँ ने फिर पूछी लियो नाना यो कई है ? छोरा ने फिर की दियो के बई यो कागलो है अभी तो थारे बतायो थो |माँ चुप हुई जावे | फिर थोड़ी देर बाद फिर डोकरी पूछे नाना यो कई है अबे छोरो गरम हुई जावे बई थके कितरी बार की दियो के यो कागलो है अबकी बार छोरो माँ पे गुस्सो थो | माँ चुप हुई जावे ने रस्ता पे टकटकी लगाई के देखती रे | थोड़ी देर बाद फिर माँ पूछे नाना यो कई है ? अबकी बार तो छोरो जोर से चिल्लावे बई थके कितरी बार बतायो के यो कागलो है ने थारे मालम है यो कागलो है फिर घड़ी घड़ी क्यों पूछी ने म्हारो दिमाग ख़राब करे ?अबकी बार माँ हँसते थकी बोली नाना तू जद तीन साल को थो तो तने इनाज ओटला पे म्हारा से चालीस बार पुछ्यो थो के यो कई है ? और म्हने पूरी चालीस बार थारा माथा पे प्यार से हाथ फेरी के और थारा गाल चूमी के जवाब दियो थो के यो कागलो है एक बार भी गुस्सो नि हुई थी और तू तीन बार में ज नाराज हुई गयो |सुनाता ज छोरा की आख से अश्रुधारा फूटी पड़ी और माँ के गले लगाई लियो |


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