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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020

पराया धन

प्रिया देवांगन 'प्रियू'

चांदनी एक छोटी सी लड़की थी।वह बहुत ही

चुलबुली और शरारती थी।पर उसकी ये हरकत चांदनी की दादी को बिल्कुल भी पसन्द नही थी।

वह थोड़ी - थोड़ी बात पर उसको चिल्ला देती थी।

चांदनी के घर मे उसके दादा - दादी , मम्मी - पापा और उसका बड़ा भाई रहता था।चांदनी के मम्मी पापा घर बनवा रहे थे।तो सभी ने तय कर लिया था कि कौन सा कमरा किसका रहेगा।तभी छोटी चांदनी आयी और बोली दादी जी मेरा कमरा कौन सा है?दादी बहुत ग़ुस्से वाली थी वह चिल्ला कर बोली तू तो *पराया धन* है रे छोरी।तेरा कोई कमरा वमरा न है। तभी चांदनी दादी जी से बोली - आप हमेशा मुझे पराया धन क्यों कहती हो , वो क्या होता है।ऐसा बोल कर रोने लगी।ये सब बातें दादा जी पास बैठ कर सुन रहे थे।तभी चांदनी को पास बुला कर बोले पराया धन बेटी को कहा जाता है जब बेटी बड़ी हो जाती है तो उसका ब्याह कर के पराये घर भेज देते है चांदनी फिर दादी से बोली - दादी क्या आप भी पराया धन थे ? आपका भी कोई घर न था।दादी चुपचाप वहाँ से चली गई।दादी के पास कुछ जवाब न था।


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