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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020

मेहमान बने वरदान

आशीष श्रीवास्तव

जनता कर्फ्यू के बाद 21 दिन का लॉकडाउन और घर में मेहमान। सड़क परिवहन और रेल यातायात भी बंद। सीमा कुछ बैचेन हो उठी। क्योंकि अगले ही दिन अस्पताल भी जाना, इमरजेंसी ड्यूटी जो लगी थी।

कामवाली को भी नहीं आना था। मुश्किल ये कि पूरा रूटीन चैंज करना पड़ता। खैर! हालात से भी कुशलतापूर्वक निपटना ही था। सुबह-सुबह सबको चाय-पोहा तैयार कर, खिलाकर सीमा अस्पताल आ गई। जहां कोरोना वायरस से बचाव की जानकारी देने मरीजों को सोशल डिस्टेंसिंग के बारे में बताया-समझाया।

लौटते में देखा बाज़ार बंद। मेडिकल और इक्का-दुक्का किराने की दुकान खुली हैं। मुंह पर मास्क लगाए, दो हाथ की दूरी पर लाइन लगाकर किराना लिया और मन को मजबूत करते हुए घर लौटी कि सबको भोजन-पानी का प्रबंध करना है, लेकिन सैनीटाइज करके सीमा जैसे ही घर के अंदर आई तो देखा घर के सभी सदस्य ताली बजाकर सीमा का सम्मान कर रहे हैं।

मौसी और ननद ने गर्मागर्म भोजन खिलाया तो मन सुखद अनुभूति से महक उठा। किचिन में देखा, बरामदें में देखा सभी जगह साफ-सुथरी। कहीं झूठे बर्तन भी नहीं। सबने मिलकर घर का काम ऐसे संभाला कि फिर सीमा अस्पताल में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता का दायित्व निश्चिंत होकर निभाने लग गई।

एक सप्ताह ही बीता होगा कि सीमा ने सभी के प्रति आभार प्रकट किया। जिन अतिथियों को लेकर सीमा का मन बोझिल हो रहा था, वही अतिथि लॉकडाउन में वरदान के रूप में सामने आए। अब तो घर की चिंता छोड़कर सीमा ने समर्पण भाव से न केवल अस्पताल में मरीजों की जांच में सहयोग किया बल्कि घर के एक कमरे में स्वयं को बाकी समय क्वारेंटाइन भी किया। इससे संक्रमण के खतरे से भी निश्चिंत हो गए।


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