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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 83, अप्रैल(द्वितीय), 2020

मॉ-बाबा हम आ गए....!

आशीष श्रीवास्तव

बाबा दरवाजा खोलिए, हम आ गए....! लाठी टेकते कुछ दूर खड़े बूढ़े पिता ने देखा कि विदेश से लौटे बेटा-बहू दरवाजे पर खड़े हैं तो 104 नंबर पर फोन करने लगे।

बेटा अपनापन जताते हुए कहने लगा: ‘‘क्या पापा फोन पर बता दिया था कि आ रहे हैं, फिर भी फाटक पर ताला लगा दिया।’’

पिता: ‘‘हॉ, बेटा! हम बुड्ढा-बुडढी तुम्हारे विदेश से न लौटने पर अकेले ऐसे ही सुरक्षा उपाय करके रहते हैं।’’

बेटा: ‘‘विदेश में तो बहुत बुरी हालत है बाबा! लोग तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। अच्छा हुआ समय रहते हम स्वदेश आ गए। ऐसे समय तो सबके दरवाजे बंद हैं। सब बहुत ही संशय के साथ घूर रहे हैं।’’

पिता: एक वो समय भी था जब विदेश से लौटने पर लोग गर्मजोशी से हाथ मिलाकर स्वागत करते थे। आज हाथ जोड़कर नमस्कार कर रहे हैं या कन्नी काट रहे हैं। सब समय का फेर है।

बेटा: ‘‘दरवाजा खोलिए न, आप कहां फोन लगाये जा रहे हैं?’’

पिता: लॉकडाउन के नियमानुसार स्वास्थ्य विभाग को सूचित कर रहा हूॅ। तुम 12 साल बाद घर लौटे ये तो खुशी की बात है, लेकिन यदि 12 दिन आइसोलेशन या क्वारेंटाइन में भी देश की खातिर रह लो तो क्या हर्ज है?

साथ में आई बहू ने कहा: ‘‘पर एयरपोर्ट पर हमारी जांच हो गई है, तभी यहां तक आ पाए, सब नार्मल है।’’

पिता: फिर भी सुरक्षा के लिहाज से सूचित करना जरूरी है बेटा। तुम तो समझदार हो।

तभी पीछे से बुजुर्ग मॉ भी आ गई। जब तक एम्बुलेंस आती तब तक बातें करते हुए बेटा भावुक हो गया। कहने लगा: ‘‘पिताजी हमें माफ कर दीजिए, इतने दिन आपसे बात भी नहीं हो सकी। आपका जब कुछ दिन के लिए आना हुआ था तब भी हम आपको समय नहीं दे पाए और आपको निराश लौटना पड़ा।’’

पिता ने बेटे-बहू की पश्चाताप से भरी भावपूर्ण बातें सुनी तो कहने लगे: ‘‘कोई बात नहीं बेटा। इसी बहाने सही, तुमको हमारी याद तो आई। तुम्हारी मॉ की तबियत ठीक नहीं रहती, अब शायद उन्हें कुछ चैन मिले।’’

दोनों की बातें सुन रही मॉ ने इतने वर्षों बाद बेटा-बहू को देखा तो आंखें डबडबा आईं कहने लगीं ‘‘सच, जैसे भगवान ने उनकी सुन ली। किसी ने सही कहा है कोई नहीं पहलवान, समय है सबसे बलवान।’’


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