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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



लोक मनीषा की उपज प्रेमाख्यान -
"मैनासतवंती"

अध्येता :डॉ.रजनीकान्त एस.शाह.


मैनासतवंती डॉ.सुनीता शर्मा द्वारा लिप्यन्तरित दक्खिनी के मशहूर कविवर गवासी जी की प्रसिद्ध रचना है.यह रचना कथा-काव्य केरूप में सामाजिक आदर्श की प्रतिष्ठा करती है.इस रचना का प्रमुख प्रतिपाद्य नारी के सतीत्व को प्रतिष्टित करता है.वर्णनात्मक शैली में लिखित यह काव्य लोकतत्व की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है.हिंदी प्रेमाख्यानक परंपरा की इस रचना में सतीत्व रक्षा का भाव पाठक के मन को गहरे से छू लेता है.सामाजिक कूटनियाँ या बलात्कारियों से नारी किस विध अपने सतीत्व की रक्षा करे, यह सम्वेदना इस कथा-काव्य में प्रणित लोककथा का आधार है.यह रचना वर्तमान जीवन को हितकारी संकेत देती है.यह रचना नारी जागरण का प्रेरक सन्देश देती है.प्रस्तुत रचना दक्खिनी हिंदी में प्रणित हुई है,दक्खिनी हिंदी का प्रमुख क्षेत्र दक्षिण के बीजापुर,गोलकुंडा,अहमदनगर और हैदराबाद,बीदर,गुलबर्गा आदि रहे हैं.

मैनासतवंती के रचनाकार मुल्ला गवासी गोलकुंडा के कुतुबशाही वंश के वंशज मुहम्मद कुतुबशाह तथा अब्दुल्ला कुतुबशाह के प्रिय कवि थे.अब्दुल्ला कुतुबशाह ने गवासी को राजकवि बनाते हुए विविध उपाधियों से अलंकृत किया था.वे अब्दुल्ला कुतुबशाह के “फ़साहत आसार” की पदवी से अलंकृत राजकवि थे.गवासी ने “कुल्लियात गवासी” में कृतज्ञतापूर्वक “फ़साहत आसार” की पदवी दान को इस प्रकार याद किया है –“”हजार शुक्र जू खुदा होके यू शह आरिफ, ख़िताब मुज को दिया है फ़साहत आसार.””

दखिनी भाषा के विद्वानों का यह मानना है कि गवासी ने सन १०३५ हिजरी से पूर्व फारसी से “चंदा और लोरक“ की कथा का दक्खिनी हिंदी में अनुवाद किया होगा.मैनासतवंती की कथा चंदा और लोरक की कथा से काफी मिलती-जुलती है.चंदा और लोरक के प्रसंग में मैनासतवंती की कथा का संकेत मिलता है.जिसके तहत राजा मैना की सुन्दरता पर मोहित है.वह उसे येनकेन प्रकारेण अपने अंत:पुर में लाना चाहता था.वह मैना के सतीत्व के आगे विवश होकर पराजय मान लेता है.इस दृष्टिकोण से इस लोककथा द्वारा नारी के सतीत्व की श्रेष्ठता की प्रतिष्ठा हुई है.

आख्यान काव्य का आधार प्रचलित ऐतिहासिक,पौराणिक या लोकाश्रित कथा होती है.इसे काव्य रूप दे दिया जाता है.लोक केलिए लोकभाषा में रचना करना गवासी की खासियत रही है.

ऐसे प्रतिभासंपन्न कवि गवासी की रचना मैनासतवंती किसी फारसी रचना का अनुवाद है.इस कथा को डॉ.परमेश्वरीलाल गुप्त ने हमीदी के `इस्यमनामा’’’ से प्रभावित माना है.जब कि सुख्यात विद्वान् गोपीचंद नारंग जी ने माना है कि “यह रचना इस्यमनामा के अतिरिक्त किसी अन्य एतद् कथा सम्बन्धी रचना से प्रभावित हो सकती है क्योंकि ‘इस्यमनामा की चंदा की अंत में मृत्यु हो जाती है,जबकि मैनासतवंती में उसे जीवित बताया गया है.साथ ही इस्यमनामा सूफी रूप में अपने पात्रों की आध्यात्मिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है.गवासी के पात्र लोकजीवन के पात्र हैं.उनकी आध्यात्मिक व्याख्या कही नहीं गई.मैनासतवंती की कथा दौलत काजी, सधना,खेमदास,जान आदि की रचनाओं से अलग एक नए रूप में प्रस्तुत हुई है.गवासी ने साधारण बोलचाल की भाषा में कथा नायिका मैना के चरित्र पर विशेष बल दिया है.इस काव्य में वह आदर्श नारी के मूर्तिमान प्रतीक केरूप में उपस्थित हुई है.पतिपरायण नारी के रूप में पति के विरह में व्यथित होकर भी वह अपने सतीत्व की राह पर से तनिक भी विचलित नहीं होती.वह मानती है कि-“खुदा ने किया हम को औरत मरद, तो होना हमें उसके पग की गरद.”

गवासी ने मैनासतवंती को सतपथ से विचलित करनेवाली कुटनी की दुर्दशा भी करवाई है.- “किया अपनी बेटी कूं उन संग सार,मुंडा सीस दूती कूं भाया बहार. गधे पर उसे सार कर शहर में फिराया हरेक ठार बाजार में.”

इसी प्रकार गवासी की कथा नायिका मैना माँ-बाप को बच्चों केलिए अच्छी धाय द्वारा स्वस्थ ढंग से पालन,धार्मिक संस्कार तथा सभ्यता सिखाने के साथ साथ अच्छी सौबत करने-कराने का सन्देश भी देती है.लोकतात्विक दृष्टि से यह आख्यान काव्य अधिक महत्वपूर्ण है.
गवासी अपने समकालीन कवियों में भी बुद्धिमता की दृष्टि से प्रशस्य रहे हैं.उनकी भाषा और शैली सरल और सरस है.उन्होंने अपने काव्य में प्रेम के मार्ग पर अडिग रहने का सन्देश दिया है.बीजापुर के मुहम्मद आदिलशाह ने गवासी को एक हाथी और अनेक घोड़े उपहार केरूप में दिए थे.गवासी की निम्न लिखित पंक्तियाँ भले ही गर्वोक्ति लगती हों पर अस्वाभाविक नहीं लगती.

मेरे ग्यान अजब शकरिस्तान है,जो उस थे मिठा सब हिन्दुस्तान है.
जिते हैं जे तूती हिंदुस्तान के भिकारी हैं मुझ शकरीस्तान के.””

(शकरिस्तान=मिठास से युक्त,तूती=तोता-मैना आदि.)


मैनासतवंती कथा में विरहिणी नारी की मनोदशा का सुन्दर चित्र है.गवासी द्वारा रचित मैनासतवंती की कथा दो भागों में विभक्त है.कथा का नायक लोरक नामक चरवाहा है.उसका विवाह मैना के साथ हुआ है.पहले भाग में शाहजादी चन्दा कथा के नायक लोरक के रूप और यौवन पर मोहित होकर अपना प्रेम व्यक्त करती है और लोरक को अपने साथ रहने केलिए कहती है.लोरक पत्नी के पतिव्रत और सुन्दरता की बात करते हुए पत्नी मैना को छोड़कर अन्यत्र जाना नहीं चाहता है.साथ ही राजकुमारी के वैभव के साथ अपनी दरिद्रता का संकेत देकर वह यह भी खुलासा कर देता है कि वह उसके लिए अयोग्य है.राजकुमारी ने लोरक को समझाया कि वह उसकी दीनता को अपनी धन-संपत्ति से भर देगी.तू साथ चल.अंतत:

“”किये दोनों मिल अस्तमारी यूँ घर,लिए माल होरक से निकले ऊपर
ले चंदा कू लोरक जो बहुत हुआ,सो सू गुलगुला जग में जाहिर हुआ.””

(अस्तमारी-,माल-धन,हकीकत,होरक-सूर्य,गुलगुला-कोलाहल,हर्ष ध्वनि.)



जब राजा को खबर हुई तो वह बहुत हर्षित हुआ क्योंकि वह मैना के रूप पर आसक्त था.वह सोचता है – “”चाहे हाथ मेरे जो ओ मास्तान, न नर कू गरुब होए ओ आफतान.””


मैना को हासिल करने केलिए वह एक चतुर कुटनी को बुलाकर मैना को रिझाकर पास ले आने केलिए कहता है.कुटनी ने बड़ाई हांकते हुए कहा कि वह उसका यह काम शीघ्र ही कर देगी.इस प्रसंग में राजा और कुटनी केबीच लम्बी बातचित हुई.राजा कुटनी को समझाते हुए कहता है, कि इस कार्य में अनेक कठिनाइयाँ आएँगी पर तुम्हें यह कार्य करना ही है.कुटनी राजा को अपनी कुटिल चालों केबारे में अच्छी तरह समझाकर मैना केपास जा पहुंची.

कुटनी खुद को मैना के समक्ष उसकी धाय बताती है.यह सुनकर मैना उसे बहुत इज्जत देती है.वह अपनी पीड़ा भी सुनाती है.कि उसका पति उसे छोडकर चला गया है.यहाँ उसका कोई सगा-सम्बन्धी नहीं है.अत: वह अकेली रह गई है.इस प्रकार कुटनी अपनी चाल शुरू कर देती है.कुटनी द्वारा लोरक को कोसना मैना केलिए असह्य है.भले ही कुटनी धन का लालच दिखाए पर उसके लिए तो धन का नहीं,धनी–पति का महत्त्व है.मैना इस बात को अच्छी तरह से कुटनी को समझा देती है.मैना यहाँ तीन मित्रों की कहानी सुनाती है.इन मित्रों को जंगल में से सोने की ईंटें मिली.वे इसकी भागबंटाई केलिए जंगल में ही रहे.एक मित्र गाँव में खाना लाने केलिए गया.शेष दो जंगल में रहे..तीनों के मन में बेईमानी बस गई थी.खाना लानेवाले ने दोनों को जहर मिला खाना खिला दिया तो दोनों मित्रों ने उसको मौत के घाट उतर दिया.इस प्रकार धन के लालचवश तीनों की मौत हो गई.कुटनी मैना को अपना यौवन और सौन्दर्य गरीब पति केपीछे बरबाद न करने केलिए समझाती है पर मैना अपने सत की रक्षा को अहमियत देती है और बताती है कि पतिव्रता नारी को शयतान भी डिगा नहीं सकता.कुटनी उसे आगे समझाया कि जब उसका पति चंदा केसाथ आयेगा तो सौत के आगे उसका क्या महत्त्व रह जायेगा.?वह इसी सन्दर्भ में एक सिपाही और उसकी दो पत्नियों की कथा सुनाती है.सिपाही की एक पत्नी नीचे तो दूसरी ऊपर रहती थी.एकबार एक चोर उसके घर आया तो ये दोनों नारियां चोर को अपना पति मानकर खींचातानी करती हैं.इस खींचातानी में चोर सिपाही पति के हाथ लग गया.उसने बादशाह के समक्ष अपनी आपबीती सुनाई कि कैसे इन दो औरतों ने उसका हाल-बेहाल कर दिया है.इस प्रकार वह कुटनी की बुराई सिद्ध करती है.मैना कुटनी से कहती है कि तू मुझे सौत का भय न दिखा. इस प्रकार कुटनी को संकेत दे देती है कि तू मेरे मन के आदर्श संस्कारों की जड़ को हिला नहीं सकती. मैना कुटनी से कहती है कि तुम तो एक बादशाह की बात कर रही हो पर मैं तो लोरक पर ऐसे हजार बादशाह कुर्बान कर दूँ. इस प्रकार यहाँ मैना का लोरक केलिए एकनिष्ठ प्रेम व्यक्त हुआ है.वह कुटनी द्वारा सुनाये गए दरवेश के किस्से को अपने प्रेम के आगे स्वीकार नहीं करती.वह कुटनी को मक्कार कहकर अपने से दूर होने केलिए कह देती है.कुटनी के राजा केपास वापस लौटने पर राजा ने मैना को पुन: तंग करने केलिए कुटनी को तैयार किया.राजा इस बार उसके साथ गया और छूप-छुपकर उनकी बातें सुनने लगा.कुटनी केद्वारा अनेक प्रलोभन दिए जाने के बावजूद मैना अपनी बात पर अटल रही.अंतत: राजा मैना का मुरीद होकर मैना के सतीत्व की प्रशंसा करने लगा.

“”दोनों हाथ से शह तस्लीम कर,क्या तू मेरी माँ तेरा है पिदर,
किया एक सकी मैं हूँ फर्बंद तेरा,बख्श तू जो कुछ है तू तनकी सिर मेरा.”


राजा स्वयं लोरक को बुलवा भेजता है.चंदा और लोरक का विवाह करवा देता है.ये तीनों प्रसन्नता पूर्वक रहते हैं.बालाकुंवर पश्चाताप के कारण बच जाता है.कथा के अंत में मैना कुटनी को दण्ड देती है.-

“”मुंडा सिर दूती कू पाप वाहार,गधे पर उसे सर कर शहर में
फिराया घर एक तार बाजार में,अजब खेल है ऐसे करतार के.””


गवासी ने सत की प्रशस्ति करते हुए कहा :--

“”देखता सत दिया होर जेहमत दिया, मशक्कत दिया हारे राहत दिया.


गवासी के उपरांत अन्य कवियों ने भी मैनासत से सम्बंधित प्रेमाख्यान लिखे हैं.भारतीय प्रेमाख्यानों की परंपरा संस्कृति और साहित्यिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है.इस परंपरा ने सूफी कवियों को प्रभावित अवश्य किया है परन्तु प्रेमाख्यानक धारा इससे सर्वथा स्वतन्त्र रही है.हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों ही वर्गों के कवियों ने इस परंपरा को विकसीत और सुदृढ़ किया है.इस तरफ भारतीय प्रेमाख्यानों में हिन्दू कवियों ने परंपरागत पौराणिक आख्यानों को आधार बनाकर प्रेमाख्यानों की रचना की तो उस तरफ इस्लामी आक्रमणकारियों केसाथ आये सूफी कवियों ने भारतीय परंपरा से प्रभाव ग्रहण करते हुए अपनी मसनवी शैली में प्रेमाख्यानों का प्रणयन किया.सूफी कवियों ने पौराणिक आधार के स्थान पर लोकजीवन में प्रचलित भारतीय प्रेमाख्यानों को अपनी रचना का आधार बनाया.

इस कथा के आधार पर सोलहवीं शताब्दी के आसपास साधन नामक कवि की मैनासत नामक रचना भी उल्लेखनीय है.साथ ही जहाँगीर के समकालीन सूफी कवि हमीदी द्वारा यह कथा `इस्यमनामा’ के नाम से प्रस्तुत की गई है. `इस्यमनामा’ में मैना लोरक की ब्याहता है.उसे छोड़कर लोरक ने चाँद नामक युवती को लेकर अन्यत्र चला गया.सातन ने दूती द्वारा मैना को फुसलाने की कोशिश की.मैना अपने सतीधर्म का पालन दृढ़तापूर्वक करते हुए अपने संकल्प में अडिग रही.संयोगवश चन्दा की मृत्यु हो गई और लोरक वापस लौटकर माना केसाथ सुखपूर्वक जीने लगा.हमीदी की इस रचना में अन्योक्ति का सफल प्रयोग हुआ है. `इस्यमनामा’ का लोरक ईश्वर का प्रतीक है,मैना आत्मा का प्रतीक है.सातन शयतान और कुटनी वासना का प्रतीक है.ईश्वरोंन्मुखी आत्मा को शयतान वासना के जरिये ईश्वरविमुख करने का प्रयत्न करता है.

मैनासत परंपरा में खेमदास की `मैना को `सत’ तथा दक्खिनी हिंदी के मुल्ला गवासी कृत `मैना सतवन्ती’ नामक रचना प्राप्त होती है.साधन का `मैनासत’ प्रमुख है .यह रचना गोहारी भाषा में दोहा और चौपाई छंदों में प्रणित हुई है.इसी प्रकार अलग अलग राज्यों में`मैनासत’ प्रेमाख्यान के रूप में उपलब्ध होते हैं.इनमें कोई खास अंतर नहीं है.नामों के विषय में कुछ फर्क दिखाई पड़ता है अवश्य पर उनका कोई विशेष महत्त्व नहीं.वैसे लोरिक का नाम सभी रचनाओं में लगभग एक सा है.चंदा का नाम भी सर्वत्र समान ही है.मैना कहीं मयनावती ,कहीं पर मंझारिया और भोजपुरी की लोकभाषा में कहीं बदी मंजरी भी है.इस मैना अथवा मंजरी केलिए सब से बडी बात यह है कि वह सती या सतवन्ती कहलाती है.चंदा ज्यादातर प्रेयसी ही है.कई काव्यों में मैना की मात्र सगाई ही हुई बताई गई है और विवाह बाद में होता दिखाया गया है.

`मैनासत’ की कथा का आरम्भ सामान्य रूप से समान ही हुआ है.यह समानता इस संभावना को पुष्ट करती है कि मूलत: यह कथा लोककंठ की है.मैनासत में प्रारंभ में स्तुति है पर अंत में फलश्रुति आदि नहीं है.कथा में सर्गबद्धता भी नहीं है.डॉ.रामपूजन तिवारी के अनुसार ``इन कवियों ने प्रेमाख्यानों की रचना की है,पर वे मात्र कहानी कहकर मनोरंजन करना नहीं चाहते थे,बल्कि पाठकों के समक्ष अपने विचारों को प्रस्तुत करना चाहते थे.कुछ तो सती का महात्म्य दिखाना चाहते थे या किसी व्रत तथा धार्मिक अनुष्ठान की महत्ता दिखाना चाहते थे.एकाध प्रेमाख्यान ऐसा भी मिलता है,जिसमें प्रेमाख्यान के माध्यम से भक्त कवियों ने अपनी भक्ति को रूपायित किया है.’’

`मैनासत’ में सांगरूपक को देखते हुए उसे सूफी प्रेमाख्यानों की श्रेणी में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है.उन्हें पूर्ण रूपेण भारतीय काव्यों से ही सूफी कवियों को प्रेरणा मिली है.मैनासत में संग अथवा निरंग रूपक का कोई आभास नहीं मिलता.इनका विषय भी सात्विक प्रेम है.मैना और लालन का मिलन वियुक्त युगल का मिलन है.इन दोनों का विवाह परंपरागत सामाजिक विधि द्वारा समर्थित है.सियाराम तिवारी के मतानुसार,``मैनासत गार्हस्थ्य जीवन का प्रेममूलक काव्य है.यह खंडकाव्य लोक मनीषा की देंन है.इस में गार्हस्थ्य अथवा स्वकीय के प्रेम का चरम रूप मिलता है.इसमें जो गार्हस्थ्य प्रेम की एक तल्लीनता और निष्ठा है.वह अन्य प्रकार के हिंदी प्रेमकाव्य में दुर्लभ है.’’

कवि ने ``मैनासत’’प्रेमाख्यान काव्य के संकुचित धरातल पर तत्कालीन सामाजिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों,विश्वास तथा रीति-रिवाजों आदि का मूल्यांकन किया है.साथ ही नारी के सतीत्व के उच्च आदर्श की प्रतिष्ठा भी की है.प्रेम में अपार शक्ति है,उसका आधार सतीत्व है.उससे प्रेम की दृढ़ता,पवित्रता,नि:स्वार्थ भावना तथा शक्ति प्राप्त होती है.यह शक्ति जीवन में उठनेवाले भयावह आंधी-तूफानों से टक्कर लेने की ताकत देती है.ऐसा कुछ भी शेष नहीं बचता जो सतीत्व से विचलित कर सके.प्रेम विशेष रूप से सहानुभूतिमय और सत्य है.वह स्थायी और अधिक व्यापक है.इसमें स्वार्थ का अभाव,सम्पूर्ण आत्मत्याग और तन्मयता की चरमसीमा है.

संक्षेप में, यह प्रेमाख्यान किसी कवि विशेष की प्रतिष्ठा का परिणाम नहीं पर लोक मनिषा की उपज है.जो अज्ञात काल तक लोककंठ में अवस्थित और बाद में लिखित रूप में आकार लेती है.लोकोदभुत होने के कारण उसमें सहज मानवीय अभिव्यक्ति का उज्ज्वल रूप है.यह पूर्ण रूप से लोककथा है.प्राय: लोककथाओं में नायिका प्रकृति तथा पशु-पक्षियों को अपनी व्यथाकथा कहती है.प्रकृति शांत रहती है परन्तु पशुपंखी मुखर होते है.मैनामत में ऐसे वर्णनों का अभाव है.साहजिक वर्णनात्मकता के कारण वह लोकसाहित्य में स्थान पा लेती है.इसमें चमत्कारों का अभाव पाया जाता है.उसका कलेवर वर्णनात्मक है.इस में प्रकरण वक्रता का भी अभाव है.

मैनासत के प्रसंग को लेकर हिंदी के उपरांत पंजाबी,बंगला तथा फारसी आदि में भी काव्य रचनाएँ हुईं हैं.इन कवियों ने प्रेम और सतीत्व की दृढ़ता के उच्च मूल्यों की अभिव्यक्ति केलिए इस लोककथा की सहायता ली है.

कवि ने यह भी स्पष्ट किया है कि सत की रक्षा करनेवाले की रक्षा करतार करता है.इस कथा प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि प्रिय के वियोग की दशा में भी अपने सत की रक्षा करनेवाली नायिका सही अर्थों में सतवन्ती है.इस रचना के द्वारा कवि ने यह सन्देश दिया है कि सत से ही जीवन में अपने भाव को पूर्णतया प्राप्त किया जा सकता है.समाज की क्रूरता और वासना की कटुता इस सत को मलिन नहीं कर सकती.

मैनासत विषयक प्रेमाख्यानों का हिंदी में ही नहीं बल्कि इसका प्रयोग अन्य भाषा के कवियों ने भी अपनी काव्य रचना का विषय बनाया है.इस प्रकार मैनासत प्रेमाख्यानक काव्य का प्रचलन भारत के किसी एक क्षेत्र विशेष में ही नहीं अपितु समग्र क्षेत्र में प्रचलित है.साहित्य के इतिहास के मध्यकाल की इस कथा का हर युग में अपना अलग महत्त्व रहा है.इस काव्य में नारी के पति के प्रति अटूट प्रेम और पातिव्रत्य पर अडिग-अटल रहने के मूल्य की प्रतिष्ठा की गई है.

इस प्रकार मैनासत विषयक कथा पंजाब,बंगाल,अवध और गोलकुंडा आदि क्षेत्रों में अत्यंत प्रचलित रही.काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से ये रचनाएँ भले ही अधिक विवेचित न रही हो पर तत्कालीन युग जीवन में यह प्रसंग अधिक प्रचलित था.हिंदी के साथ अन्य भाषाओ में निर्मित काव्यों से यह बात तो सिद्ध हो जाती है कि नारी के सतीत्व के सदाचार प्रसंग को मैना और लोरक की कथा के माध्यम से कहना अधिक प्रासंगिक रहा है .यह प्रसंग स्वस्थ जीवनमूल्यों का पक्षधर है.

डॉ.सुनीता शर्मा जी ने पूर्वी उत्तरप्रदेश,बिहार,बंगाल और छत्तीसगढ़ के प्रदेशों में मशहूर गवासी की रचना मैनासतवंती को देवनागरी में उपलब्ध कराकर यशस्वी कार्य किया है.यह गाथा राजस्थान और हैदराबाद के लोकजीवन में भी बहुत लोकप्रिय है.सुनीता जी के इस प्रयास के फलस्वरूप हिंदी के अध्येताओं को दक्खिनी हिंदी की अरबी-फारसी लिपि में प्रकाशित इस महत रचना से परिचय प्राप्त होगा.यह रचना नारी के सतीत्व की चिरंजीव प्रासंगिकता की प्रतिष्ठा करती है.कष्टसाध्य इस कार्य के साथ संपादिका डॉ.सुनीता जी ने इस कथा प्रसंग से जुडी अन्य कृतियों का भी परिचय देकर साधुकर्म का निर्वाह किया है.

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सन्दर्भ ग्रन्थ:-
१.दक्खिनी हिंदी के कवि गवासी कृत मैनासतवन्ती संपादक-डॉ.सुनीता शर्मा.
२.दक्खिनी हिंदी का साहित्य - श्री राम शर्मा.
३.हिंदी साहित्य का बृहद इतिहास –परशुराम चतुर्वेदी.
४.हिंदी और पंजाबी प्रेमाख्यान-ओम प्रकाश.
५.हिंदी के मध्यकालीन खंडकाव्य –सियाराम तिवारी.
६.सूफी काव्य की भूमिका-रामपूजन तिवारी.
७.मधुमालती वार्ता-माताप्रसाद गुप्त.
८.मध्ययुगीन प्रेमाख्यान .श्याम मनोहर पाण्डेय.
९.हिंदी सूफी काव्य का समग्र अनुशीलन- शिवसहाय पाठक.
१०..प्रेमाख्यानों की काव्य परंपरा और मुल्यांकन –अशोककुमार मिश्र.

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