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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



वसंत के इस मतवाले समीरण में

डॉ. रानू मुखर्जी


प्रकृति को हमने माँ कहा, आकाश को हमने पिता, पृथ्वी को माँ कहने में कोई काव्य नही है, एक दॄष्टि है, जिसमें हम प्रकृति को एक समग्रीभूत परिवार मानतें है। इसलिए हम अपना सुख, आनन्द सब कुछ प्रकृति में ही ढुंढतें है। क्योंकि हम प्रकृति के ही तो अंश है।

अपनी रचनाओं में विविधता और श्रेष्ठता के कारण विश्व कवि रविन्द्रनाथ को सहज ही भारत का ही नहीं विश्व का और सभी समय का एक श्रेष्ठ कलाकार कहा जाता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति मूलरुप में रहती है। प्रकृति का मानवीकरण करने की कला में सिद्धहस्त है। वसंत को उन्होने ऋतुओं का राजा कहा है – “ऋतुराज वसंत” भावना की स्वरबद्धता और सत्यता की कल्पना की विविधता और संगितमयता के कारण वसंत से संबधित उनकी रचनाएं अप्रतिम मिठास से भरी है-

हे वसंत, हे सुन्दर धरणीर ध्यान-भरा धन,
वत्सरेर शेषे
शुधु एकबार मर्ते तुमि धरो भूवनमोहन
नव वर वेश ।
तारी लागी तपस्विनी की तपस्या करे अनुक्षण –
आपनारे तप्त करे, धौत करे, छाडे आभरण
त्यागेर र्स्वस्व दिए फल – अर्घ्य करे आहरण
तोमार उद्देश्ये” (“वसंत” शांतिनिकेतन में)



वसंत का मानवीकरण है. उनसे बिनती करते है कि एकबार भूवनमोहन नववररुप धारण करके पृथ्वि पर अवतरण करो कि यह (पृथ्वि) स्वंय को तपाती है, धोती है, आवरण बदलती है। सब कुछ त्याग करके फलों का अर्घ्य देती है केवल तुम्हारे ही उद्देश्य में.

‘आजी वसंत जाग्रत द्वारे
तब अवगुन्ठीत कुन्ठीत जीवने ।
कोरो ना बिडिम्बीत तारे ।
आजी खुलिओ हöदयदल खुलिओ,
आजी भूलिओ आपन पर भूलिआ,
एई – मुखरित गगने
तब गंध तंरगित तुलिओ’ (गीतांजली से)


वसंत का मानवजीवन में महत्व को दिखाते हुए कवि कहतें है – द्वार पर वसंत आया है। दिल खोलकर उसका स्वागत करें। आपसी भेदभाव को भूलकर संगित मुखरित गगन में इसको अपनी अवगुंठित् कुंठित जीवन में, हöदय में स्थान देने की बात करतें हैं।

धरा में विभिन्न ऋतुओं का आगमन केवल और केवल वसंत के लिए है. इसे बडे सुन्दर रुप से कविन्द्र ने समजाया है। सभी ऋतुओं को अपने जीवन में समहित कर अपने तरिके से रंग भरकर मानव उसे अपने अनुसार ढाल लेता है। वसंत जब आता है तब जीवन को इतना तरंगित करता है, इतनी ताजगी से भर देता है कि जीवन आनन्दमय हो उठता है। कवि रविन्द्रनाथ ने यहाँ वसंत को दुल्हे के रुप में प्रस्तुत किया है।

वसंत का रंगीन उल्लास मानव के लिए जीवनदायिनी शक्ति है। कविवर रविन्द्रनाथ के लिए प्रकृति और मानव का संबंध अभिन्न है जो कवि के सारे जीवन में, कवितओं में यत्र – तत्र, बिखरा पडा है परंतु इसे (वसंत को) अपने साथ बांधकर रखने की क्षमता इस धरा में नहीं है। अर्थात सुख – आनन्द का क्षण स्थायी अवस्था को कवि समजाते है। आगे कहतें है –

हे वसंत हे सुन्दर, हाय हाय, तोमार करुणा
क्षणकाल – तरे।
मिलाईबे ए उत्सव, एई हांसी, एई देखा सुना
शुन्य निलाम्बरे!
तोमर करिबे बंदी नित्यकाल मöक्तिकाशृंखले
शक्ति आछे कार ?



अतः जीवन के आनन्दमय क्षण में भरपूर शक्ति का संचय कर लेने की सलाह कवि देतें हे क्योंकि यह उत्सव, यह खुशी, यह हंसी धरा के रंगीन, सजावट सब विलिन हो जाने वाले हैं। इसलिए वसंत को जीवनदायीनी कहा जाता है। कवि की रचना यही संदेश देती हैं।

जीवन में ऋतुराज वसंत की महत्व को दर्शाते हुए कवि ने इस ऋतु को उत्सव में बदल दिया है। उन्होंने इस ऋतु में शांतिनिकेतन विश्व विद्यालय परिसर में “वसंतोउत्सव” मनाने की प्रथा का आरंभ किया. लगातार कई दिनो तक विध्यार्थी विद्यालय परिसर में नृत्यगीत में रत हो जातें है। वसंत के साथ स्वागत में नृत्यगीत आरंभ हो जाता है।

नए नए परिधान फूल-मालाओं से सज्जीत होकर नाच गान करतें हैं। आपसी भेदभाव को भूलाकर, छोटे बडे का भेदभाव को मीटाकर, विधार्थी, शिक्षक सब एक होकर इस उत्सव में एकसाथ झूमतें हैं। ढोल,मृदंग,करताल के साथ छंद बद्ध रुप से सब एक हो जातें हैं। और यह परंपरा लगातार होली तक चलती है।

शांतिनिकेतन में होली के त्यौहार को मनाने की भी एक विशिष्ट परंपरा है। यहां अबीर गुलाल और फुलों से होली खेली जाती है। झूंड में नृत्यगीत के साथ बाजे-गाजे के साथ झूमते हुए होली खेलने निकलतें है। यहाँ भी ऋतुराज वसंत सिरमौर होतें हैं। जिसने एकबार कविवर रविन्द्रनाथ द्वारा प्रचलित वसंतोत्सव में हिस्सा लिया हो वह बार बार इस मौसम में शांतिनिकेतन जाना चाहेगा। सच्चे अर्थ में अगर ऋतु में महत्व को समजना है, इसके गुण को परखना है तो अवश्य वसंतोत्सव में भाग लेना चाहिए। प्रेम और भाईचारे का मूर्तरुप देखने को मिलता है।

जीवन का अधार प्रेम है। प्रेम एक शक्ति है, एक आकर्षण है। जिससे जग को आधार मिलता है, अभिव्यक्ति मिलती है। वसंत उत्सव प्रेम का उत्सव है, प्रकृति पुजा का उत्सव है, प्रकृति के रंगो का आभास मानव में प्रतिफलित होता है और आपस में इर्ष्या द्वेष, मलिनता, घृणा के भाव को भूलकर प्रेममय होकर एकदूसरे से हिलमिल कर बन्धुत्व, एकात्मा, नए जोश के उर्जा का संचार मानव मन में होना ही वसंत का मूल संदेश होता है।

आज ज्योत्सना राते सबाई गेछे बोने
वसंतेर एई माहाल समीरणे”
जाबो ना गो जाबो ना रे
रोईनू बोसे घरेर माझे एई निरालाय
एई निरालाय रबो आपन कोने”



वसंत के मतवाले समीरण से बच पाना संभव नहीं। अगर न भी सहयोग करना हो तो ज्योत्सना से भरी रात इतनी मतवाली है कि स्वयं को अपना सब कुछ विसर्जन कर प्रकृति के संग घुल-मिल जाना ही पड्ता है।

कवि के अनुसार वसंत प्रकृति पूजा क उत्सव है। सदैव सुन्दर दिखनेवाली प्रकृति वसंतऋतु में सोलह शृंगार से दिप्त हो उठती है। यौवन हमारे जीवन का मधुमास वसंत है तो वसंत इस सृष्टि का यौवन है। जीवन के सौन्दर्य के लिए प्रकृति के अनुपम सानिध्य में जाना चाहिए।निसर्ग का जादू मानव को वेदना रहित बना देता है। इसमें अहंकार नहीं होता है अतः ईश्वरिय भाव से समृद्ध होता है। अतः निसर्ग का सानिध्य हमें ईश्वर के सानिध्य में ले जाता है। कुछ हद तक कविवर का यह महोत्सव अध्यात्मा भावना भी संचार करता है।

“वसंत आ गया है” लेख में हजारी प्रसाद द्विवेदीजी ने लिखा है – “मुझे ऐसा लगता है कि वसंत भगता भागता चलता है। देश में नही काल में। किसी का वसंत पन्द्रह दिन का है तो किसी का नौ महिने का। मौजी है अमरुद बारह महिने इसका वसंत ही वसंत है”।

दिवेदीजी ने भी अपने लेख में वसंत का वही रुप दिखाना चाहा है जो विश्व कवि रविन्द्रनाथ ने दिखाया है। अर्थात प्रकृति और मन क समन्वय। प्रेम और मानव। मानव प्रेम और सदभावना। सभी भाव मन से जुडे है। और अगर मन चाहे तो बारह महिने वसंत ऋतु छाया रह सकता है, जैसे अमरुद का। सृष्टि की सुन्दरता और यौवन की रसिकता का जहा सुमेल हो वहां निराशा निस्क्रöयता का कोई स्थान नही. निसर्ग की सुंदरता व मानव की रसिक्तामें अगर प्रभु का स्वर ना हो तो वह विनाश का मार्ग बन जाता है। इसलिए वसंत के संगित में गीता के स्वर का आभास दिखता है। हिन्दी साहित्य, वसंत की सुमधुर रचनाओं से समृद्ध है ऋतुराज वसंत सचमुच प्रेम मुगट धारण करके मानव – प्रकृति के सिरमौर बन बैठें हैं।

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