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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



सूफी संत

डॉ. रानू मुखर्जी


सूफी संतो और मुस्लिम सहित्यकारों ने भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म से संपर्क स्थापित करते हुए इस्लाम की उदार छवी प्रस्तुत की जिससे की भारतीयो के मन में इस्लाम के प्रति आदर और श्रद्धा के भाव उपजे। भारत में हिन्दु-मुस्लिम एकता और साम्प्रदायिक भावों को बनाए रखने में सूफी संतो का महत्वपूर्ण योगदान है।

यह सूफी संतो के भारतीय अध्यात्म, वेदान्त और पुर्नजन्म के सिद्धांतो से जुडाव का ही प्रभाव था कि कई हिन्दुओं ने सूफी संतो को अपना गुरु और आराध्य भी बनाया। कट्टरपंथी बादशाह औरंगजेब के घर जैबुन्निसा जैसी बेटी और ताज बीबी जैसी भतीजी का जन्म लेना इस्लाम के भारतीय करण का प्रत्यक्ष उदाहरण है।

शहजादी ताज बीबी ने गोस्वामी विट्ठलनाथजी से वैष्णव मत की दिक्षा लेकर मुगलिया सल्तनत में कयामत ला दी। ताज बीबी भाव विभोर होकर कृष्ण-भक्ति में डूबाकर कहतीं हैं –

नन्दजू का प्यारा, निज कंस को पछारा
वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है ।
सुनो दिलजानी मेरे दिल की कहानी,
तुम दस्त की बिकानी, बदनामी भी सहुंगी मैं ।
नंद के कुमार, कुरबान तेरी सूरत पे,
है मै मुगलानी, हिन्दुआनी रहुंगी मैं।
(ताजबीबी)

पंजाबी के रहस्यवादी भक्ति कविताओं की जो परंपरा बाबा फरीद ने रची वह सदियों तक पंजाबी संत कवियों की कवितओं का आदर्श बना रहा। सूफी और निर्गुणवादी दोनों काव्यधाराओं को जोडनेवाली कडी स्वरुप बाबा फरीद सूफी मार्ग के चिश्ती समुदाय के शिरमोर दरवेशो में एक और भारतीय संत परंपरा के अग्रणी संत है।

ई.स. ११७३ में मुलहान के खोटवाल गांव में जन्म और ई.स. १२६५ में अजोधन – पाक पट्टन में निधन हुआ था। उनका असली नाम “मसऊद” था। दीक्षा लेते समय मुर्शिद कुतुब साहब की ओर से करीदुद्दीन पदवी मिली। शांत और मधुर जीवन के कारण समाज में बाबा फरीद “शंकरगंज” नाम से जाने जाते थे। “शंकरगंज” अर्थात शंकर का भंडार।

जन साधारण में श्रेष्ठ मानवगुणों से भावना को जगानेवाली वाणी को बाबा उस समय की लोकबोली में कहा है।“सलोक” नाम से जानेवाली इन फरीदवाणी को उनके निधन के ढाईसों वर्ष के पश्चात गुरु नानक साहब ने (ई.स. १४६९-१५३९) तत्कालीन उत्तराधिकारी शेख इब्राहिम से प्राप्त करके आनेवाली पीढियों के लिए संरक्षित किया। शीखों के पंचम गुरु अर्जुनदेवजी ने “आदि गुरुग्रंथ साहब” (१५०४) के संपादन करते समय उनको बडे भक्तिभाव के साथ सामिल किया । आदि ग्रंथ में ११२ श्लोक के साथ सम्पुर्ण शबद सामिल हैं । इसके व्यतीत गुरुग्रन्थेतर फरीदवाणी भी पंजाबी समाज में लोगों के कंठ में से सुनने को मिलती है।

भाषा की सुन्दरता, भाषा की मिठास, कथनी में लयात्मकता के साथ रची उनकी रचनाएं दर्शन और कला का एक सुन्दर तालुमेल प्रस्तुत करती हैं। उनकी रचनाएं लोंगों के दुःख से दुखी दरवेश की संवेदना है, जिसमें स्तुति, निंदा या विरोधाभास का नामोनिशान नहीं है। केवल निश्छल प्रेम छलाकता है। आत्ममंथन स्वरुप मानव के अवगुणो पर प्रहार करते है। भाषा, जाति, मत, सम्प्रदाय तमाम चीजो को छोडकर फरीदवाणी में जीवन जीने के असली कला तथा वरमाला के साथ जुडने का सही रास्ता दिखाया गया है।

एनी लोइणी देखदियां, केती चली गई।
फरीदा, लोकां आपो आपणी, मैं आपणी पई॥
(इन नैनो से मैने देखा, गए कितने जन
अपने गत सौ सौ पडे, मैं निज गत मगन ॥)
फरीदा साहिब दी करी चाकरी दिल को लाही भरांदि ।
दरवेशां नूं लोरीए रुखां दी जीरांदी॥
( कर साहब के चाकरी, धोकर दिल का मैल
दरवेशों को चाहिए, वृक्ष सहोरता बल ॥)


बाबा फरीद की प्रार्थना बडे सम्मनन और श्रद्धा के साथ आज भी गुन्गुनाई जाती है।

कागा सब मन खाईयो, मेरा चुन चुन मांस।
दो नैना मत खाईयो मोही दिया मिलन की आस॥



मथुरा में रसखानजी की समाधी आजभी हमें उनमें कृष्ण भक्ति गीतो की याद दिलाती है। कृष्ण के दिवाने रसखान लिखते हैं – मानुस हों तो वही रसखान, वसौ गोकुल, गांव के ग्वारन जो पशु हो तो कहा बस मोरी, चरौ नित नंद की धेनु भम्मारन।

कई सूफी संतो ने सनातन धर्म के देवी देवताओं को आजार बनाकर महाकाव्यों का सृजन किया। मौलवी मोहम्मद “जायसी” ने “पद्मावत” में राजा रत्नसेन को जीवत्मा तथा राजकुमारी पद्मावती को परमात्मा का प्रतिक मानकर प्रेमाख्यान काव्य परंपरा का निर्वाह किया है। सूफी काव्य परंपरा के अन्य प्रमुख कवि हैं – मुल्ला दाउद, कुतुबान, मंम्ल्न नयामत खां, शेख नबी, नजक अली, ख्वाजा अहमद आदि है।

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