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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



प्रकृति का उल्लास पर्व है वसन्त "

कृष्ण कुमार यादव


मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत,
मैं अग-जग का प्यारा वसंत।
मेरी पगध्वनि सुन जग जागा,
कण-कण ने छवि मधुरस माँगा।।
नव जीवन का संगीत बहा,
पुलकों से भरा दिंगत।
मेरी स्वप्नों की निधि अनंत,
मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत।
(महादेवी वर्मा)

  वसंत का उत्सव प्रकृति और श्रृंगार का उत्सव है। इसके आगमन के साथ ही फिजा में चारों तरफ मादकता और उल्लास का अहसास छा जाता है। कभी पढ़ा करते कि 6 ऋतुएं होती हैं- जाड़ा, गर्मी, बरसात, शिशिर, हेमत, वसंत। पर ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव ने इन्हें इतना समेट दिया कि पता ही नहीं चलता कब कौन सी ऋतु निकल गई। पूरे वर्ष को जिन छः ऋतुओं में बांँटा गया है, उनमें वसंत सबसे मनभावन मौसम है, न अधिक गर्मी है न अधिक ठंड। यह तो शुक्र है कि अपने देश भारत में कृषि एवम् मौसम के साथ त्यौहारों का अटूट सम्बन्ध है। रबी और खरीफ फसलों की कटाई के साथ ही साल के दो सबसे सुखद मौसमों वसंत और शरद में तो मानो उत्सवों की बहार आ जाती है। वसंत में वसंतोत्सव, सरस्वती पूजा, महाशिवरात्रि, रंग पंचमी, होली और शीतला सप्तमी के अलावा चैत्र नवरात्रि में नव संवत्सर आरंभ, गुड़ी पड़वा, घटस्थापना, रामनवमी, चैती दशहरा, महावीर जयंती इत्यादि त्यौहार मनाये जाते हैं। वास्तव में ये पर्व सिर्फ एक अनुष्ठान भर नहीं हैं, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता और नृत्य-संगीत का अद्भुत दृश्य भी जुड़ा हुआ है। वसंत ऋतु में चैती, होरी, धमार जैसे लोक संगीत तो माहौल को और मादक बना देते हैं। तभी तो कविवर सोहन लाल द्विवेदी लिखते हैं-

आया वंसत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।
सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नए फूल
पल में पतझड़ का
हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

  माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी से ऋतुओं के राजा वसंत का आरंभ हो जाता है। इसमें न तो ग्रीष्म की रूमानी दग्धता है और न पावस की पच-पच पनियल हरी-हरी मादकता। वसंत के सौंदर्य में जो उल्लास मिलता है वह जैविक नहीं है। यह एक सगुण अनुभूति है। इसी समय से प्रकृति के सौंदर्य में निखार दिखने लगता है। वसंत में उर्वरा शक्ति अर्थात उत्पादन क्षमता अन्य ऋतु की अपेक्षा बढ़ जाती है। वन में टेसू के फूल आग के अंगारे की तरह लहक उठते हैं, खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल वसंत ऋतु की पीली साड़ी-सदृश दिखते हैं। ऐसे में वसंती हवा की इठलाहट को कविवर केदार नाथ अग्रवाल कुछ यूंँ अभिव्यक्त करते हैं-

हँसी जोर से मैं,
हँसी सब दिशायें
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे
हँसीचमचमाती
भरी धूप प्यारी
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी
हवा हूँ हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

  किसी कवि ने कहा है कि वसंत तो अब गांँवों में ही दिखता है, शहरों में नहीं। यह सच भी है क्योंकि क्योंकि वसंत में सरसों पर आने वाले पीले फूलों से समूची धरती पीली नजर आती है। इसी कारण इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने का चलन है। इन दिनों बोगनवेलिया, टेसू (पलाश), गुलाब, कचनार, कनेर आदि फूलने लगते हैं। आमों में बौर आ जाते हैं, गुलाब और मालती आदि के फूल खिलने लगते हैं। आम-मंजरी और फूलों पर भौंरे मँडराने लगते हैं और कोयल की कुहू-कुहू की आवाज प्राणों को उद्वेलित करने लगती है। तभी तो कविवर नागार्जुन कह उठते हैं-

रंग-बिरंगी
खिली-अधखिली
किसिम-किसिम की
गंधो-स्वादों वाली ये
मंजरियां
तरूण आम की डाल-डाल
टहनी-टहनी पर
झूम रही हैं।

  इस मौसम में वृक्षों के पुराने पत्ते झड़ने के बाद उनमें नए-नए गुलाबी रंग के पल्लव मन को मुग्ध करते हैं। सतत सुंदर लगने वाली प्रकृति वसंत ऋतु में सोलह कलाओं से खिल उठती है। जौ-गेहूँ में बालियाँ आने लगती हैं और वन वृक्षों की हरीतिमा मन को अपनी ओर आकर्षित करती है। पक्षियों के कलरव, पुष्पों पर भौरों का गुंजन तथा कोयल की कुहू-कुहू मिलकर एक मादकता से युक्त वातावरण निर्मित करते हैं। ऐसे में भला ’निराला’ का कवि-मन क्यों न बौराये-

लता मुकुल हार गंध भार भर,
बही पवन बंद मंद मंदतर
जागी नयनों में वन यौवन की माया,
सखि वसंत आया।

  यौवन हमारे जीवन का वसंत है तो वसंत इस सृष्टि का यौवन है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में वसंत का अति सुंदर व मनोहारी चित्रण किया है। भगवान कृष्ण ने गीता में ’ऋतूनां कुसुमाकरः’ कहकर ऋतुराज वसंत को अपनी विभूति माना है। कविवर जयदेव तो वसंत का वर्णन करते थकते ही नहीं। वसंत ऋतु में मन में उल्लास और मस्ती छा जाती है और उमंग भर देने वाले कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं। इससे शरद ऋतु की विदाई के साथ ही पेड़-पौधों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होता है। प्रकृति नख से शिख तक सजी नजर आती है और तितलियां तथा भंवरे फूलों पर मंडराकर मस्ती का गुंजन गान करते दिखाई देते हैं। हर ओर मादकता का आलम रहता है। सुमित्रानंदन पंत इसे महसूस करते हुए लिखते हैं-

दीप्त दिशाओं के
वातायन,
प्रीति सांस-सा मलय
समीरण,
चंचल नील, नवल भूयोवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन।

  वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक जगह लिखा है, ’’वसंत का मादक काल उस रहस्यमय दिन की स्मृति लेकर आता है, जब महाकाल के अदृश्य इंगित पर सूर्य और धरती-एक ही महापिंड के दो रूप-उसी प्रकार वियुक्त हुए थे जिस प्रकार किसी दिन शिव और शक्ति अलग हो गए थे। तब से यह लीला चल रही है।’’   हमारे यहाँ त्यौहारों को केवल फसल एवं ऋतुओं से ही नहीं वरन् दैवी घटनाओं से जोड़कर धार्मिक व पवित्र भी बनाया गया है। यही कारण है कि भारतीय पर्व और त्यौहारों में धार्मिक देवी-देवताओं, सामाजिक घटनाओं व विश्वासों का अद्भुत संयोग प्रदर्शित होता है। वसंत पंचमी को त्योहार के रूप में मनाए जाने के पीछे भी कई ऐसे दृष्टांत हैं। पीत वस्त्र धारण कर, पीत भोजन सेवन कर वसंत का स्वागत आज भी इसी दिन से होता है। ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ही देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसीलिए इस दिन विद्या तथा संगीत की देवी की पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार एक मान्यता यह भी है कि वसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार सरस्वती की पूजा की थी और तब से वसंत पंचमी के दिन सरस्वती की पूजा करने का विधान हो गया। छोटे बच्चों को अक्षरारंभ कराने के लिए भी यह अत्यंत शुभ दिन माना जाता है।   वसंत को ऋतुराज कहा गया है यानी सभी ऋतुओं का राजा। आयुर्वेद में वसंत को स्वास्थ्य के लिए हितकर माना गया है। वसंत में मादकता और कामुकता संबंधी कई तरह के शारीरिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं जिसका आयुर्वेद में व्यापक वर्णन है। चरक संहिता में कहा गया है कि इस दिन कामिनी और कानन में अपने आप यौवन फूट पड़ता है। ज्योतिषियों की नजर में वसंत के मौसम में सबसे ज्यादा शुक्र का प्रभाव रहता है। शुक्र काम और सौंदर्य के कारक हैं। इसलिए यह अवधि रति-काम महोत्सव मानी जाती है। इस मौसम में कामदेव अपनी पत्नी रति के साथ पृथ्वी का भ्रमण करते हैं। वसंत कामदेव मदन के प्रिय मित्र हैं और कामदेव धरती पर काम भावना लोगों में जाग्रत करते हैं। यही कारण है कि वसंत पंचमी का उत्सव मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है और तदनुसार वसंत के सहचर कामदेव तथा रति की भी पूजा होती है। नासिर काज़मी ने इसे कुछ यूँ अभिव्यक्त किया है-

कुंज-कुंज नग्माज़न वसंत आ गई
अब सजेगी अंजुमन वसंत आ गई
उड़ रहे हैं शहर में पतंग रंग-रंग
जगमगा उठा गगन वसंत आ गई
मोहने लुभाने वाले प्यारे-प्यारे लोग
देखना चमन-चमन वसंत आ गई
सब्ज खेतियों पे फिर निखार आ गया
ले के ज़र्द पैरहन वसंत आ गई
पिछले साल के मलाल दिल से मिट गए
ले के फिर नई चुभन वसंत आ गई ।

  इस अवसर पर ब्रजभूमि में भगवान श्रीकृष्ण और राधा के आनंद-विनोद का उत्सव मुख्य रूप से मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता हैं। वसंत पंचमी के दिन से ही होली आरंभ हो जाती है और उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाई जाती है। इस दिन से होली और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। लोग वासंती वस्त्र धारण कर गायन, वाद्य एवं नृत्य में विभोर हो जाते हैं। ब्रज में तो इसे बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन किसान नए अन्न में घी और गुड़ मिलाकर अग्नि तथा पितृ तर्पण भी करते हैं। रामचरित मानस के अयोध्याकांड में भी ऋतुराज वसंत की महिमा गाई गई है -

रितु वसंत हबह त्रिबिध बयारी।
सब कहं सुलभ पदारथ चारी।।
स्त्रक चंदन बनितादिक भोग।
देखि हरष बिसमय बस लोग।।

  अर्थात् वसंत ऋतु है। शीतल, मंद, सुगंध तीन प्रकार की हवा बह रही है। सभी को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चंदन, स्त्री आदि भोगों को देखकर सब लोग हर्ष और विस्मय के वश हो रहे हैं।   गुलाबी धूप के साथ प्रकृति के पोर-पोर में बासन्ती छटा का अनुपम रंग नये अनुबंधों की अलख जगाता है। प्रकृति में सनी फूलों की मादक गंध, घर आँगन, खेत, सिवान में विस्तार लेती हुई नये सृजन का अहसास कराती है तो यही अनुहार-मनुहार की परम्परा को भी बासन्ती चोले से ढककर सर्जना के नये आयाम से जोड़ती है। वास्तव में वसन्त प्रकृति का उल्लास पर्व है। वसंत में मौसम खुशनुमा और ऊर्जावान होता है, न ज्यादा ठंडा होता है और न गर्म। यही कारण है कि इस दौरान रचनात्मक व कलात्मक कार्य अधिक होते हैं। इस दौरान प्रकृति लोगों की कार्यक्षमता में भी वृद्धि करती है, तभी तो लोगों की सृजन क्षमता बढ़ जाती है। ऐसे में भला कैसे सम्भव है कि वसंत पर कोई भी सृजनधर्मी कलम न चलाये। तभी तो ‘अज्ञेय‘ ऋतुराज के स्वागत में कहते हैं-
मलयज का झोंका
बुला गया
खेलते से स्पर्श से
रोम रोम को कंपा
गया
जागो जागो
जागो सखि वसंत
आ गया जागो।
-अज्ञेय

  ऐसा मानते हैं कि वसंत का उत्सव अमर आशावाद का प्रतीक है। वसंत का सच्चा पुजारी जीवन में कभी निराश नहीं होता। पतझड़ में जिस प्रकार वृक्ष के पत्ते गिर जाते हैं, उसी प्रकार वह अपने जीवन में से निराशा और असफलताओं को झटक देता है। निराशा से घिरे हुए जीवन में वसंत आशा का संदेश लेकर आता है। निराशा के वातावरण में आशा की अनोखी किरण फूट पड़ती है। जयशंकर प्रसाद ने इसे कुछ यूँ अभिव्यक्त किया है-

चिर-वसंत का यह उद्गम है,
पतझर होता एक ओर है,
अमृत हलाहल यहाँ मिले हैं,
सुख-दुख बंधते,
एक डोर हैं ।

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