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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



भविष्य, वर्तमान व भूत

सुदर्शन कुमार सोनी


   ये तीन पुरूष थे । एक ही वय के थे , वे तीन स्त्रिया थीं , अलग अलग वय की थी । वे कर्म के लिये जा रहीं थी , ये इनके जाने के रास्ते पर स्थित चाय की दुकान पर खडे़ बतिया रहे थे । एक एक को देखकर कहता हैं कि इसकी उम्र अभी कच्ची हैं लेकिन देखो अभी से कितनी संभावना है ! आगे चलकर कहर ढायेगी ।

  दूसरा दूसरी को देख कर कहता है कि देखो क्या चाल हैं , क्या माल है , कहर बरपा रही हैं लेकिन वह तो अपने मे ही मस्त है यहां न जाने कितने अस्त हो गये हैं !

  तीसरा कहता है तीसरी को देखकर कि इस खंडहर को देखकर लगता है कि इमारत कभी बुलंद रही होगी । अपने समय मे न जाने कितनो को घायल किया होगा ! कमेंट कर तीनों बडी़ तन्मयता से मुस्करा रहे थे ।

  बस यही आकलन हैं क्या एक स्त्री का चाहे वह बेटी की उम्र की हो , बहन की उम्र की हो या मां की उम्र की हो ? नजरिया एक सा वही दकियानूसी है ।

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