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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



सोच

शबनम शर्मा

प्रार्थना का मैदान,
बच्चे और हम सब, 
प्रथम चरण प्रार्थना 
की समाप्ति पर 
प्रधानाचार्य ने 
अपने विचार साँझे किए,
‘‘भारतीय हैं हम, 
‘‘ये वैलनटाइन डे’’
हमारा मातृ-पिता दिवस 
भी तो हो सकता है, 
कौन कर सकता, 
धरती पर वो कुरबानियाँ,
जो माँ करती अपने हाथ जलाकर, 
गीले बिस्तर में सो कर 
और रतजगे कर। 
हमारी जरूरतों की पूर्ति हेतू
भूल जाता पिता अपना पुराना 
जूता बदलना, बदलवा लेता 
दर्जी से फटा कमीज का काॅलर, 
करता घंटों ‘ओवरटाइम’
थके माँदे शरीर में भरता मुस्कान 
व लौटता हाथ में लिफाफे लिये 
बच्चों की खुशियों खातिर।’’
फिर कहा, ‘‘सब बच्चे करबद्ध 
प्रार्थना करें अपने माता-पिता के लिये,
अराधना करें और कहें हम आपको 
सर्वाधिक प्यार करते हैं।’’
बच्चे खड़े हुए, आँखें खुलते ही 
माहौल कुछ और था 
अश्रुधारा बह रही थी,
कुछ अश्रु रोक रहे थे।
आश्चर्य, जो लाये थे कुछ 
अरमानों के फूल देने हेतू,
सोच बदल, वो माँ-बाप 
के लिये रख रहे थे।
हम सब भावुक थे 
नतमस्तक थे इस सोच 
के समक्ष।
कितने शक्तिशाली हैं यह 
शब्द जो नई सोच से 
बदल देते हैं हमारा जीवन।
चाहिये हमें, चाहिये हमें
इक ऐसा इन्सान, जो 
नकारात्मक को इतने 
प्यार से सकारात्मक
कर दे।
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