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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



मायका

शबनम शर्मा

घर से कोसों दूर 
ब्याह दी गई थी, 
बूढ़ी हो गई थी अब,
पर कभी-कबार हवा के 
झोंके की तरह, 
डसे याद आती थी पीहर 
के हर इंसान की 
वो छप्पर के पास वाला 
स्कूल का मैदान 
और हाँ सबसे ज्यादा शाम 
को उस मैदान में सखियों 
संग खेलना।
खो जाती, ख्यालों में, फिर
डसका ध्यान जाता अपने 
झूरियों वाले चेहरे,
और कंपकंपाते हाथों पर।
छलक ही जाते हर बार 
2 बूंद आँसू, उसकी आँखों से,
आज सिर पर ओड़नी लिये 
क्यूँ संवार रही वो घर,
ढूंढ रही अपने पुराने 
बक्सों की चाबियाँ।
बनवा रही दाल, देसी घी 
का हलवा।
कभी मुस्काती, कभी पोंछ रही 
अपने चेहरे से आँसू।
कि बहू पूछ ही बैठी,
‘‘अम्मा आज कुछ अलग 
सी क्यूँ लग रही?’’
हिलते बदन को समेटती,
चेहरे पर मुस्कुराहट लाये 
बोली, ‘‘बहू, आज 40 बरस
बाद मेरा मायका आ रहा है?
नंदू आया था बताने,
भाई का छुटकवा निकलेगा 
मेरे गाँव से, कह रहा था 
बुआ को देखना है?’’
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