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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



प्रश्न करुं मैं किससे ?

सरिता सुराना

मेरे जन्म के साथ ही 
जन्म हुआ एक अबूझ पहेली का 
जिसे सुलझाने की मेरी हरेक चेष्टा को 
दबा दिया गया , दफना दिया गया 
तर्क दिया गया - तुम लङकी हो , पराई हो 
लङकियों की तरह रहना सीखो 
अपमान - तिरस्कार सहना सीखो 
तुम्हें दूसरे घर जाना है 
अपना वजूद मिटाना है ।
तब प्रश्न करता है मेरा मन 
मैं अपने ही घर में पराई कैसे हो गई ?
एक ही मां की दो संतान 
अलग - अलग कैसे हो गई ? 
यही अनुत्तरित प्रश्न लेकर 
विदा हुई इस घर से 
सबने यही सीख दी 
वहाँ प्रश्न मत करना 
चुपचाप बङों की 
आज्ञा का पालन करना 
भले घर की बहुएं ,
प्रश्न नहीं करती 
औऱ कभी भी ऊंची आवाज में 
बात नहीं करती ।
पीढ़ी दर पीढ़ी 
चला आ रहा यही क्रम 
सुख - दु:ख , न्याय - अन्याय 
मौन सहते रहना हरदम 
प्रश्न करने का अधिकार तो 
सिर्फ पुरुष को है ।
तब रो पङती है मेरी अंतरात्मा 
क्या मेरा अपना कोई वजूद नहीं ? 
आत्मसम्मान औऱ भावना नहीं ?
क्या मैं एक बुद्धिहीन 
चेतनाशून्य प्राणी हूं ?
आखिर प्रश्न करुं मैं किससे ?
अपने आप से या 
सृष्टि के रचनाकार से ?
अब तक सुलझा न पाई 
इस दर्दभरी उलझन को 
पग - पग पर जकङी है 
बन्धनों की बेङियां  
पता नहीं कब 
मुक्ति मिलेगी इनसे ? 
प्रश्न करुं मैं किससे ?
प्रश्न करुं मैं किससे ?
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