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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



फिर भी वसंत आता है

डॉ. रानु मुखर्जी

कोहरा भरा आसमां हो, चाँद भी परेशान हो
तारे मुंह छिपा रहे हो, धरती बदहवास हो – फिर भी वसंत आता है.

पतझड का मौसम हो, हरियाली का नाम न हो, फूलों का अकाल हो,
और भौरे अकुला रहे हो – फिर भी वसंत आता है.

चुल्हे पर हंडिया न हो, पानी में चावल न हो,
अंतडिया कुलबुला रही हो, आंखो तले अंधेरा हो – फिर भी वसंत आता है.

तलवारे एक दूजे पर तनी हो, आपस में सबकी ठनी हो
नदियाँ खून की बहती हो, जुल्म की चादर फैली हो - फिर भी वसंत आता है.

रंगराग से भरी खुशनुमा शाम हो, हर चेहरे पर गुलाल हो,
आपको बस केवल एक मुस्कुराहट कि चाह हो,
पर वह कहीं भी किसी से न मिले फिर भी वसंत आता है फिर भी वसंत आता है.
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