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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



डाकिया बाबू

प्रिया देवांगन

भरी दुपहरी डाकिया बाबू ,
चिठ्ठी लेकर आया ।
अपनी चिठ्ठी ले लो बाबू ,
दरवाजे पर चिल्लाया ।

कभी सुख तो कभी दुख का
चिठ्ठी ले कर आता,।
गर्मी सर्दी बरसातों में 
अपना फर्ज निभाता ।

दूर दूर की चिठ्ठी को वह,
अलग अलग है करता ।
सील मुहर लगा लगाकर,
थैले में वह भरता ।

जब तक बांट न ले वह चिठ्ठी ,
कभी आराम न करता।
इस गली से उस गली तक,
दिन भर घूमते रहता।
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