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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



"सरस्वती वन्दना"

केशव मिश्रा

हे   सरस्वती   माँ    शारदे,
इस जग से मुझको तार दे।
अपना  तू   मुझे   दुलार दे,
विद्या  बुद्धि   का   हार   दे।।
                            तू  हंस  वाहनी  माँ,
                             तू वीणा वादनी माँ।
                             तू आदि भवानी है,
                            तू जग कल्याणी है।
मैं    मूरख   अज्ञानी,
एक छोटा सा प्राणी।  
                           तेरे शरण में आया हूँ,
                           मैं फरियादें लाया हूँ।
मेरी फरियादों को  सुनकर,
मुझे मोती सा चुन-चुन कर।
मुझे    इंसान    बना   देना,
दिल  में  ईमान  जगा देना।
                          बुराईयों से रहित मेरा,
                         एक संसार बसा देना।
मैं   सेवक   ही   तेरा हूँ,
मुझे सेवा में लगा लेना।
                   मैं खुशकिस्मत हो जाऊँगा,
                  मैं  खुद  को  धन्य  मानूँगा।
यदि चरणों की धूल भी मैया,
लगाये     पार    मेरी    नैया।
                        मैं भव से पार हो जाऊं,
                        यही  मैं  मंत्र  दोहराऊं।
मुझे  माँ अपने चरणों का,
एक   श्रृंगार   बना   देना।
कभी माँ अपने वीणा का,
मुझे  झंकार  सुना  देना।।
            मेरी कुटिया में आ जा माँ,
            अपना  डेरा जमा जा माँ।
मेरा   अज्ञान   दूर   कर  दे,
विद्या-बुद्धि  से मुझे  भर दे।
                             मैं  बालक  अज्ञानी,
                            तू माँ आदि भवानी। तू"केशव"को अपना प्यार दे,
विद्या  बुद्धि   का   हार   दे।।
                   हे   सरस्वती   माँ    शारदे,
                  इस जग से मुझको तार दे।।
                             (इति)।।
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