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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



स्वार्थ नहीं छोड़ पाता

ब्रिजेन्द्र अग्निहोत्री

जीवन के प्रत्येक क्षण 
हम सीखते हैं 
इस नश्वर शरीर को 
स्वार्थ-रुपी जल से सींचते हैं 
जैसे-जैसे जीवन-वृक्ष में वृद्धि होती है 
स्वार्थपरक लालसाओं में अभिवृद्धि होती है 

जब जीवन में,
परमार्थ के महत्व का ज्ञान होता है 
मानव-मन व्यथित हो, छटपटाता है 
स्वार्थ के बन्धनों से छूटने के लिए 
लेकिन, 
ये बंधन तो उसके शरीर की
रक्त-धमनियों में समाहित होते हैं.
फलतः
मानव, छटपटाते हुए संसार छोड़ देता है 
लेकिन स्वार्थ नहीं छोड़ पाता
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