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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



विगत को तू बिसरा दे

डॉ०अनिल चड्डा

विगत को तू बिसरा दे,
वर्तमान अपना ले,
जाने कौन घड़ी तेरा
जीवन तुझको ठुकरा दे ।

यादें तो तब तक ही हैं,
जब तक साँस चले तेरी,
साँसों के चलते-चलते,
यादें नई बना ले।

कौन मरे तेरी खातिर,
कौन जिये तेरी खातिर,
ये पल ही है तेरा अपना,
क्यों न इसे भुला ले।

दर्द सभी को मिलता है,
कोई गिरता, कोई चलता है,
आगे वही निकलता है,
जो दर्द से नाता तुड़ा ले।
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