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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



परिस्थियाँ अगर विपरीत हों

डॉ०अनिल चड्डा

परिस्थियाँ अगर विपरीत हों,
मन थोड़ा भयभीत हो,
सब मार्ग सुलभ हो जायेंगे,
ग़र मन अपना विनीत हो ।

चलते-चलते ग़र थक जायें,
पग तेरे ग़र रुक जायें,
मुश्किलें खुद ही झुक जायें,
मंशा जो तेरी पुनीत हो ।

नफ़रतें हों फैली चारो ओर,
अलगाव का मच रहा हो शोर,
सफल न होंगी ये ताकतें,
ग़र मन में तेरे प्रीत हो ।

पथ तू अगर भटक जाये,
सफलता कहीं अटक जाये,
ग़र मन को तू न हारे तो,
हरदम तेरी ही जीत हो ।

धूप हो चाहे छाँव हो,
शहर हो चाहे गाँव हो,
कदम से कदम मिल जायेंगे,
मिल कर गाते ग़र गीत हों ।
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