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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



कुछ और चराग जलाओ

डॉ०अनिल चड्डा

कुछ और चराग जलाओ कि अभी अँधेरा है,
न सोचो आने वाला नया सवेरा है।
 

नजर उठाओ कि कुछ रस्ते अभी भी बाकी हैं,
राहों में काँटों का घना बसेरा है।

जो फूल खिल गये, प्रभु के दर पर जा पहुंचे,
मुरझाने वालों का कोई न चितेरा है।

हमने तो अब कुछ भी कहना छोड़ दिया,
जहाँ भी देखो, बसा हुआ लुटेरा है। 
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