Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



शायद वह चाहती रही होगी

अमरेन्द्र सुमन

उच्छेदित खंडहरों सी बेजान मुस्कान लिये 
एक औरत ने सौंप दिये अपने हिस्से में प्राप्त  मांसल शरीर
लकड़बग्घे की नजरों से जिसने देखा उसे जवान होते

एक शरीर के अन्दर के शरीर को 
पुरानी विवषता में समेटे
ढीली पड़ती जा रही थी वह रफता -रफता 

 चारों पहर खुष रहकर भी 
रौंदे जाने की चीज बन सकती थी वह
बन सकती थी कुम्हार के चाक की चिकनी मिट्टी
एकरारनामें की फाजिल़ हरकतों से विलग
दे सकती थी पूरी की पूरी जिन्दगी की एक मुश्त खुशी-
कई एक कोशिशों के बाद भी लगातार 
जूझती रही पराये देह की बोझिलता लिये
जीवित रहने के अंतिम क्षणों तक
गाती रही वह अधमरे कल्पनाओं का निर्गुण 

एक़़तरफ़ा धा़रणा हो सकती है ,नहीं भी 
शायद वह चाहती रही होगी 
सांकेतिक पूर्वासाखी से अवगत कराना 
बहुत दिनों से अपने पसंद के युवक को 
जो रोज ही जीने के उपक्रम में घटता रहा होगा 
तिल-तिल
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें