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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



एक औरत की तरह प्रागैतिहासिक उपस्थिति

अमरेन्द्र सुमन

एक औरत की देह की गंध से 
वह करता रहा अमानवीय संभोग 
तलाक शुदा होने की मजबूरी बयाँ कर
बार-बार

चाहता रहा रोज-व-रोज नये सिरे से 
औषधीय ताजगी 

आँखों से देखी जाने वाली दूरी तक की 
ढूँढता रहा अंतिम सीमाएं

अन्य लोग भी ऐसे रहे होंगे
जिनके एकान्त की जरुरत बन सकती थी वह
शामिल रह सकती थी
रोजमर्रे की जिन्दगी में एक पत्नी की तरह  

ऐसा नहीं कि चुप्पी ओढ़ लेने की मजबूरी में 
घिसी जा रही थी रफता-रफता 
रोज ही आती, लाती कई-कई वसंत अपने साथ
नहीं चाहती जमींदोज करना किसी रहस्य को

खयालों की दुनिया में एक
सम्पूर्ण औरत की तरह 
उसकी प्रागैतिहासिक उपस्थिति 
दिला जाता स्मरण 
पूर्ववर्ती जीवन की 
वास्तविकताओं से अवगत कराते --------------------------------
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