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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



गीत -
रातों को दिल के करघे पर


मंजूषा मन

					रातों को दिल के करघे पर 
					सपने बुनती हूँ,
					सुबह टूट जाते सारे मैं
					किरचें चुनती हूँ।

						इक मुद्दत से कहता सुख
						अब आऊँ मैं तब आऊँ ,
						जाने कब गूंजेगी आहट
						गीत ख़ुशी के कब गाऊँ।
						कुण्डी खड़केगी मेरी मैं
						आहट सुनती हूँ।

					क्या कहते कितनी पीड़ा
					चुप रहकर हम झेल गए,
					दिल की बातें किसे सुनाते
					सबसे ही तो मेल गए।
					दीमक वाली लकड़ी हूँ मैं
					पल पल घुनती हूँ।

						रातों को दिल के करघे पर 
						सपने बुनती हूँ,
						सुबह टुट जाते सारे मैं
						किरचें चुनती हूँ।
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