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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



गीत -
पंख फैलाओ अगर पास आसमान रहे


मंजूषा मन

						पंख फैलाओ अगर पास आसमान रहे।
						ऊँचा पहुँचोगे तुम साथ गर उड़ान रहे।

							मखौल मेरा बनाओ तो बना लो लेकिन,
							तीर मुझपर चलाओ तो चला लो लेकिन।
							कुछ तो ऐसा करो पास में ईमान रहे।।

						हर एक पल उसे बस बात इक सताती है,
						चैन की नींद भी तो एक पल न आती है।
						घर में जब उसके बेटी कोई जवान रहे।।

							अब जो गुजरे तो फिर न लौट पायेंगे हम,
							हमे यकीं है उस वक़्त याद आएंगे हम।
							उम्र के दौर में जब आपके ढलान रहे।।

						एक औरत सँवार देती है दुनिया सारी,
						ज़िन्दगी लगने लगे जैसे बगिया प्यारी।
						घर वो हो जाये जो पास इक मकान रहे।।

							पंख फैलाओ अगर पास आसमान रहे।
							ऊँचा पहुँचोगे तुम साथ गर उड़ान रहे।।
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