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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



गज़ल -
वे पराजित हो कर घर गये


राजेन्द्र वर्मा

वे पराजित होके अपने घर गये,
किन्तु हमको हिन्दु-मुस्लिम कर गये।
 
श्वास तो सौ वर्ष तक चलता रहा,
ढाई आखर प्रेम के ही मर गये।
 
पत्थरों का वह मिला सान्निध्य है,
कल मनुज थे, आज हो पत्थर गये।
 
कर्म-वैतरणी उफ़नती रह गयी,
नाविकों को साधकर वे तर गये।
 
शत्रुओं की भीरुता इतनी बढ़ी,
काल से बचने को वे अन्दर गये।
 
छोडि़ए भी अस्मिता की बात को,
क्या बताएँ, किस तरह बच कर गये!
 
आज फिर विश्वास अपनों पर किया,
यों, छले अपनों से हम अक्सर गये।
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