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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



गज़ल -
सत्य-निष्ठा के सतत् अभ्यास में


राजेन्द्र वर्मा

सत्य-निष्ठा के सतत् अभ्यास में,
एक जीवन कट गया संत्रास में।
 
वे तो जैसे ‘ग्रीन हाउस’ हो गये,
मैं मरुस्थल ही रहा चैमास में।
 
न्याय तो करना पड़ेगा आपको,
पीढि़यों से हूँ खड़ा इजलास में।
 
आदमी जाने कहाँ गुम हो गया?
नाम चिपका रह गया आवास में।
 
आप जिन मूल्यों की करते बात हैं,
वे मिलेंगे आपका नक्ख़ास में।
 
मैं भले मरु को समर्पित अघ्र्य हूँ,
किन्तु जीता हूँ सदा उल्लास में।
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