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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



ग़ज़ल -
ख्वाहिशें अपनी भी थी


डॉ०अनिल चड्डा

ख्वाहिशें अपनी भी थी बहुत सारी,
जद्दोजहद में सभी की सभी हारीं।

धुंधला न जायें यादों की तस्वीरें,
रोज रो-रो कर हैं दिल ने सँवारी। 

खो गए तुम जिन राहों पे चलते-चलते,
वही राहें हो गईं हमें तो प्यारी ।

‘अनिल’ को जहाँ भी मिलता चैन कोई,
वहीँ पर उसने है जिन्दगी गुजारी।
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