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वर्ष: 1, अंक 9, मार्च, 2017



गुजराती कहानी का हिंदी अनुवाद -
"रक्तानुबंध"

लेखक: स्वर्गीय ईश्वर पेटलीकर
अनुवादक: डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


लोग मंगु को पागलों के अस्पताल में रखने की अमरतकाकी को सिख देते थे तब उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे। उन सब को उनका एक ही जवाब रहता था कि:`` मैं माँ होकर उसकी सेवा नहीँ कर सकूँ तो अस्पतालवालों में वह भाव कहाँ से होगा? यह तो अपाहिज पशु को पिंजरापोल में छोड़ आने जैसा कहलायेगा।’’

अमरतकाकी की यह ग्रंथि(मान्यता) स्पष्ट हो जाने के बाद कोई उनसे ऐसी बात करता नहीं था।
जन्मजात पागल और मूक बिटिया का वे जिस तरह पालन-पोषण करती थी, सेवा करती थी और प्यार-दुलार करती थीं, इसे प्रत्यक्ष देखकर लोग उनके बखान भी करते थे कि,ऐसी पागल बिटिया का लालन-पालन तो अमरतकाकी ही कर सकती हैं। किसी और के घर में होती तो कब की भूखी-प्यासी मर गई होती और यदि जिन्दा होती तो ऐसी हृष्टपुष्ट शरीर तो कभी नही होती।

मंगु के उपरांत अमरतकाकी के तीन संतानें थीं। दो लडके और एक लड़की। बेटे पढ़-लिखकर शहर में अपना कामकाज देख रहे थे। बिटिया शादी करके ससुराल को सम्हाल रही थी। अमरतकाकी उन तीनों संतानों को विस्मृत कर गई हो ऐसे उनकी समग्र ममता मंगु को अभिषिक्त करती थी। छुट्टियों में उनके बेटों के कभी-कभार घर आने पर उनका घर पोते-पोतियों की मुक्त हंसी से गूंजता रहता था।फिरभी दादी के रूप में अमरतकाकी कभी अतिउत्साहित होती नहीं थी। शायद ही वह बच्चों को गोद में लेतीं या खेलती और प्यार करतीं।

माँ के इस व्यवहार को बेटे मन ऊपर नहीं लेते थे पर बहुएँ मन ही मन जल उठती थीं। दोनों बहुओं की पति के समक्ष एक ही फरियाद रहती थी कि बेटों के बच्चे उन्हें जरा भी सुहाते नहीं हैं और पागल हीरे को अंक से जुदा नहीं कर पा रहीं !

मातृत्व की भावुकता में बहकर बहुएँ अमरतकाकी के साथ अन्याय कर बैठती थीं। उतना ही बिटिया के बच्चों(नाते-नातियों) के प्रति भी उनका व्यवहार ऐसा ही था। इसलिए बहुएँ कभी कभार पति के समक्ष बडबड़ाकर चुप रह जाती तब बेटी ही माँ को सुना देती थी कि:``मंगु को अनावश्यक लाड़ लड़ा लडाकर तुमने ही पागल कर रखा है। यदि आदत डाली जाये तो पशु की भी समझ में जाये कि कहाँ पाखाना-पिशाब आदि करना है,तो क्या बारह वर्ष की लड़की चाहे कितनी ही पागल क्यों न हो पर यदि उसमें आदत डाली जाये हो तो क्या इतना भी उसकी समझ में न आये? वह मूक है पर बहरी तो नही है कि वह हमारी बात को कान पर न ले। यदि भूल करे तो दो चांटे भी लगा दिए जाये तो दुसरी बार होश में रहे।’’

बेटी कुछ आगे कहे उससे पहले अमरतकाकी की आँखें बरसने लगती हैं। बेटी भी भावार्द्र हो उठती लेकिन मन को मारकर वह अपने मन की व्यग्रता को निकाल देती थी:`` तुम तो जानती-समझती हो ना कि बेटी को लाड-प्यार देकर सुखी कर रही हूँ पर याद रखना कि तुम ही उसकी असली बैरन हो। तुम सदाकाल नहीं बैठी रहोगी। जब वह भाभियों के हवाले हो जाएगी तब रोज उसका पाखाना धोने जितनी दरकार भी नहीं करेंगी और वह दु:खी हो जाएगी।’’ तनिक रुककर वह धीरे से कहती कि यह कहावत गलत नहीं है कि परायी माँ ही कान बींधती है। अस्पताल में रखने से यदि वह स्वस्थ नहीं होगी तो कोई बात नहीं पर पाखाना और कपड़ों का तो होश आये तो भी पर्याप्त होगा। भाइयों के घर तो भरे-पुरे हैं और भाभियाँ वक्त पर खाना न खिलाएं ऐसी नीच भी नहीं हैं।’’

अमरतकाकी लोगों के समक्ष दवाखाने की जो उपमा देती थीं तब पराये लोग भी जो नहीं कह पाते थे,वह बात बेटी कह देती थी:``दवाखाना पिंजरापोल जैसा होगा और यदि मंगु मर गई तो उसका और परिवार का भी छुटकारा होगा!’’

मंगु की यदि कुदरती मौत हो तो उसे अमरतकाकी भी मुक्ति समझती थी लेकिन बेपरवाही जताकर उसे जानबूझकर मौत की दिशा में ढकेलने का विचार भी असह्य लगता था। स्वार्थवश तो सभी सगे होते हैं पर नि:स्वार्थ भाव से जो रिश्ता निर्वाह करे,वही सच्चा सम्बन्धी। बेटे कमाते धमाते हों,बेटी ससुराल में झूले पर झूलती हो तब मैं माँ मिट जाऊं यह अर्थहीन होगा। मैं मंगु की सच्ची माँ बनी रहूँ तभी मेरा सच्चा रक्तानुबंध। अत:चाहे बेटा कहें या बेटी कहे तब भी मंगु को दवाखाने द्वारा मौत की ओर ढकेलने के लिए अमरतकाकी तत्पर नहीं थी।

बेटे मन के इस भाव को समझ गए थे। अत: वे कभी भी ऐसी बात करते नहीं थे। उपरांत उचाट करने का भी समय नहीं था क्योंकि तीन गोरे डॉक्टरों ने एकमत होकर यह निदान दिया था कि यह असाध्य है। मात्र बेटों के मन में एक बात का रंज था कि किसी प्रशिक्षित नर्स या डॉक्टर की देखभाल के तहत उसे रखा हो तो आदतन शायद उसे पाखाना और कपड़ों की समझ आ जाये परन्तु ऐसी सुविधा घर के पास की जा सके ऐसा नहीं था। अत: वे मौन रहे थे।

फिर भी अमरतकाकी ने अपनी श्रद्धानुसार उपचार जारी रखे थे। अनेक अनामंत्रित दवाई करनेवाले घर पहुंच जाते थे। शिलाजित बेचनेवाले या हिंग बेचनेवालों को मंगु के पागल होने का अहसास होते ही वे इस बीमारी की दवाई जानते हैं ऐसा दावा करते थे। अमरतकाकी मानती थी कि एकहजार उपचार करें तो एक टेकनी लग जाती है। अत: अन्य के लिए पागलपंती की बातें वे गंभीरतापूर्वक सुनतीं और श्रद्धापूर्वक उनका अमल भी करती थीं। ओझा-गुणी और ज्योतिषी भी कभी कभार सहाय के लिए तत्पर रहते थे। एक ज्योतिषी ने भविष्यकथन किया था कि आगामी अगहन में उसकी दशा में बदलाव आ रहा है। अत: सब ठीक हो जायेगा। तब से अगहन महिना अमरतकाकी के लिए आराध्य देव हो गया था।

अगहन महीने में संयोग से मंगु चौदह वर्ष पूरे कर रही थी। अत: कोई सयाना व्यक्ति जिस तरंग से प्रभावित न हो जाये ऐसी तरंगों के हवाले अमरतकाकी हो जाती थीं। चौदहवां साल उतरते ही कमू के हाथ पीले कर दिए गए थे। मंगु यदि सयानी होती तो आज उसके विवाह की भी बात चल जाती। यदि वह अगहन में स्वस्थ हो जाये तो....उस कमनसीब का रूप ही ऐसा है कि कोई भी लड़का उसे देखते ही स्वीकृति दे दे!

और मानों वह ठीक हो गई हो ऐसे वह विवाह की योजना के बारे में सोचने लगतीं थी। कमू के वक्त घर के हालात आज के जैसे अच्छे नहीं थे। अब तक दोनों भाई शहर में बहुत कमाए हैं। पानी की तरह पैसा खर्च करते हैं तो फिर मैं मंगु की शादी में क्यों कोई कसर छोडूँ !

एकबार मंगु सामान्य व्यक्ति की तरह मोरी में पिशाब करने के लिए बैठी। इससे हर्षित अमरतकाकी कई दिनों तक सबके आगे यही पारायण चलाती रहीं।’’जोषी की बात सच होगी। मंगु पहले कभी नहीं और आज पहलीबार खुद जाकर मोरीदार चौके में पिशाब करने के लिए बैठी!’’

सुननेवाले के हलक से नीचे यह बात उतरना मुश्किल था क्योंकि यह सुनते वक्त मंगु पिशाब से गीली हुई मिटटी में अपनी ऊँगली से कुरेदती नजर आती थी! अमरत काकी की नजर उस और जाते ही वह अपनी सयानी बेटी को सीख दे रही हो ऐसे धीमी आवाज में कहती थीं कि ``मंगु ऐसे गन्दा नहीं करते बेटा !’’मंगु को कोई धुन चडते ही खड़ी हो जाती थी और उनको एक नयी बात मिल जाती थी। मैंने उसे कहा और वह सयानी लड़की की भांति खड़ी हो गई!’’

इस तरह अमरतकाकी का उम्मिदोंवाला अगहन आया फिरभी मंगु ठीक तो नहीं हुई पर शहर के एक कन्या विद्यालय में पढ़ रही गाँव की लड़की कुसुम पागल हो गई। मंगु की भांति उसे भी पाखाने अदि का होश नहीं रहा था। अमरतकाकी को इस बात से दु:ख भी हुआ पर साथ ही साथ इस बात का संतोष भी हुआ कि समझदार लड़की यदि पगलाकर ऐसा होश गँवा दे तो आजन्म पागल मंगु को ऐसा होश न रहे तो इसमें किस बात का अचरज?

कुसुम को दवाखाने में रखने का फैसला हुआ। यह बात जानकर अमरतकाकी को इस बात का दु:ख हुआ कि यदि उसकी माँ जिन्दा होती तो वह उसे दवाखाने में रखने नही देती। माँ बिना सारा संसार सुना है –यह कहावत गलत नहीं है। साथ ही साथ अपनी आँख बंद हो जाने के बाद मंगु को भी उसके भाई दवाखाने रख आते हो,ऐसा दृश्य उन्हें कम्पित कर गया।

पहले महीने के अंत में कुसुम को वहां के इलाज से काफी लाभ हुआ है,ऐसी खबर आई। उसे बांधे रखना पड़ता था,वह अब मुक्त घूम रही है और उपद्रव नहीं करती। पाखाने की पूरी समझ आ गई है। पागलपन थोडा बहुत रहा हो तो वह दिनभर मात्र गाती रहती है, उतना ही। वह भी अगले महीने ठीक हो जायेगा।-ऐसा अभिप्राय डॉक्टरों ने दिया था।

दूसरे महीने कुसुम ठीक हो गई। तथापि यदि एकाध महिना रहा ले तो बेहतर। डॉक्टर की ऐसी सलाह से उसे तीसरे महीने भी दवाखाने में रखा गया। जब वह घर लौटी तब सारा गाँव उसे देखने के लिए उमड़ पड़ा था। सबसे आगे अमरतकाकी थीं।

कुसुम को पूर्णतया स्वस्थ हुई देखकर अमरतकाकी को सब यह सलाह देने लगे कि:``काकी! आप मंगु को एकबार दवाखाने में रखकर देखिए। वह अवश्य ठीकठाक हो जाएगी।’’

अमरतकाकी ने जिंदगी में पहलीबार दवाखाने का विरोध किया नहीं। मूकभाव से वे सबकी सलाह सुनती रहीं। दूसरे दिन उन्होंने कुसुम को अपने घर बुलाया। उसे अपने पास बिठाकर दवाखाने से जुडी सारी हकीकत पूछने लगीं। माँ दयाभाव रखकर सेवा न कर सके तो डॉक्टर या नर्स भी नहीं कर सकते। ऐसी ग्रंथि अमरतकाकी के मन में बैठ गई थी, वह कुसुम से हुई बातचीत से सुलझ गई। नर्स या डॉक्टर को यदि कोई पागल चांटा मार भी जाये तो भी वे उन लोगों से गुस्सा नहीं करते या उसे मारते-पिटते नहीं हैं। यह जानकर दवाखाने के प्रति उनके मन में श्रद्धा जगी। नयी आशा का जन्म हुआ कि मंगु के भाग्य में दवाखाने में जाने से ठीक होना लिखा होगा – इस बात की किसे खबर? इतने उपचार करके देख लिया है तो एक उपचार और सही। यदि वह नहीं भी ठीक हुई तो उसे वापस भी तो लाया जा सकता है?

आख़िरकार अमरतकाकी ने मंगु को दवाखाने में भर्ती कराने का निर्णय किया। इस आशय से उन्होंने बड़े बेटे को घर आने के लिए पत्र भी लिखवाया लेकिन जब से यह निर्णय लिया गया तब से उनकी नींद उचट गई थी। मानों वह हारकर यह काम करने लगी हैं,ऐसा तनाव उनके मन पर सवार हुआ हो ऐसा लगता था। दवाखाने पर श्रद्धा जगना तो एक निमित्त मात्र था। अन्यथा एक और कारण भी गहरे में झांक रहा उन्हें दिखाई दे रहा था।
मंगु बड़ी होती जा रही थी। अपना बुढ़ापा भी बढ़ रहा था,उसे समझ में आ गया था कि बहुएँ उसकी सेवा-चाकरी नहीं करेंगी क्योंकि अबतक एक भी बहू ने अभी तक साथ रहने के लिए अमरतकाकी को आने के लिए आमंत्रित नहीं किया था। आजकल के बेटे भी बहु से दबे हुए हर घर में देखती थीं।अत: उन्हें अपने बेटों में भी कोई ज्यादा उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। इस दशा में मंगु का भगवान हो और वह ठीक हो जाये या नही भी ठीक हो तब भी उसका दवाखाने में मन लग जाये तो मरते वक्त एक प्रकार का आश्वासन बना रहे कि दुनिया में उसकी सेवा करनेवाला कोई गैर भी है।

इस विचार प्रवाह के साथ अमरतकाकी की आँखों से इतना ज्यादा पानी बह जाता था कि बिछौना भी भीग उठता था। दिल चीख उठता था। चाहे कोई भी बहाना बना लो लेकिन मूल बात ती यही कि आप भी बेटी से ऊबी हुई हैं। अमरतकाकी नींद से चौंक उठती थीं। बोल भी लेती थीं कि क्या मैं थक गई हूँ? दिल दुहरी ताकत से चिल्ला उठता था-एक बार नहीं, हजार बार!

अमरतकाकी के मन में विचार आया कि मैंने बेटे को पत्र लिखकर गलत किया। ऐसी भी क्या जल्दी थी कि जाड़े के मौसम में उसे दवाखाने ढकेल देना पड़े? रात में मैं कई बार उसे ओढाती हूँ, दवाखाने में इस प्रकार कौन बार बार ओढायेगा? गर्मियों में रखने का फैसला किया होता तो अच्छा रहता।

पत्र मिलते ही बड़का बेटा पहुँच गया। दवाखाने में भर्ती करने के लिए मेजिस्ट्रेट का हुक्म भी ले लिया। एक हफ्ते में ही मंगु को पहुंचा देने का समय आ गया। अमरतकाकी को यह इत्मिनान हो गया कि बेटा पागल बहन को दवाखाने में रखवाकर अपना काम ख़त्म करना चाहता है। यदि ऐसा नही होता तो पत्र मिलते ही वह क्यों आ धमकता? अपनी पहुँच का उपयोग करके फ़ौरन मेजिस्ट्रेट और डॉक्टर के प्रमाण-पत्र क्यों निकलवाता? उसके मन में यह विचार चल रहा था कि अभी दवाखाने रखवाना मुलतवी करते हैं और गर्मियों में रख आयेंगे लेकिन बेटे को ऐसा कहने के लिये जबान खुल नहीं रही थी। वह मुश्किल से छुट्टी लेकर आया है,प्रमाण-पात्र भी बनवा लिए हैं,अब मैं ना कर दूँ तो वह सोचेगा कि माँ को और कोई काम है नहीं!

मंगु को रखने जाना था, उस रात अमरतकाकी को जरा भी नींद नहीं आयी थी। सबेरे एक विचार यह भी आया कि वह साथ न जाए तो अच्छा। दवाखानेवाले बेटी को अपने से अलग करेंगे तो वह नहीं सहा जायेगा लेकिन दवाखाने में कैसी सुविधाएँ हैं–यह वह स्वयं न देखे तबतक चैन नहीं आना था।अत: विवशतावश जाने के लिए तैयार तो हुई पर मंगु को लेकर घर से बहार निकलना हुआ तब उन पर समस्त ब्रह्माण्ड का भार छा गया। आँख से सावन-भादों बरसना शुरू हुआ। मंगु पर जमी हुई नजर तनिक भी हटती नहीं थी। मंगु उसे पहनाये गए नए कपड़ों के रंग को टकटकी बांधे देख रही थी। मौज में आ गई हो,ऐसे अमरतकाकी के सामने देखकर हँस पड़ती थी। कि अमरतकाकी का दिल चिर गया। पशु भी एक खूंटे से छूटकर दूसरे मालिक के घर जाने से आनाकानी करता है। मंगु को तो इतना भी होश नहीं था-इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव करके अमरतकाकी घर की दहलीज पर ही पछाड़ खाकर गिर पड़ीं। दिल रोने लगा-अबोध बिटिया का क्या इस दुनिया में कोई नहीं है? सगी माँ भी उसकी नहीं हुई।

बेटा भी भावार्द्र हो गया। माँ के सामने एक नजर देख सके ऐसी स्वस्थता भी उसमें नहीं थी। जितना विलम्ब हो रहा था उतना गाड़ी पकड़ने का वक्त कम होता जा रहा था। मोहल्ले के बाहर बैल गाड़ी से जुते बैल बढने के लिए उतावले हो रहे थे। बेटे ने माँ की और देखे बिना लड़खड़ाकर पैर बढ़ाते हुए कहा:``देर हो रही है। अब चलना चाहिए।’’और गली से बाहर निकलते वक्त उसने धोती के कोर से आँखें पोछ ली।

पड़ोसन ने मंगु का हाथ पकड़कर आगे बढाया और अन्य स्त्रियों ने अमरतकाकी को सहारा दिया। आख़िरकार कडुआ घूंट पीकर घुटने पर हाथ रखकर वे खडी हुईं। दो लोगों ने पकड़कर चढ़ाया तब कहीं वह बैलगाड़ी पर चढ़ सकीं।

मंगु पागल है,ऐसा जानने पर गाड़ी में मुसाफिरों को मजेदार खुराक मिल गई।

‘‘ऐसी खाए-पिए लड़की को दवाखाने में रखेंगे तो महीने भर में वह सूखकर कांटा हो जाएगी। वहां तो पशु को खिलाते हैं इसी प्रकार खिला दिया और कर्तव्य की इतिश्री हुई!’’

‘‘हमारे गाँव से एक बुढिया को उसके बेटे पांच वर्ष से रख आये हैं पर कोई सुधार नजर नहीं आया। गाँव का यदि कोई मिलने के लिए जाता है तो वह रोने लगती है। पांव में गिरकर कहती है कि-मुझे यहाँ से ले जाओ। पर आजकल के बेटे वापस लाते ही नहीं है !’’

‘‘ऐसे बेटों को क्या देखने मात्र के लिए ही रखना है?’’

‘‘वैसे तो बेटे अच्छे हैं, पर आजकल की बहुएँ जानते हो ना, पहन-ओढ़कर ठाट से यहाँ-वहां टहलते रहना होता है। इसलिए अतिरिक्त व्यक्ति घर में ना-गवारा हो जाता है।’’

‘‘क्या इस लड़की की माँ नहीं है?’’
अमरतकाकी के लिए यह घाव असह्य हो गया। आँखों में आँसू उमड़ आये। गला अवरुद्ध हो गया। मारे शर्म के गरदन झुक गई। माथा झुकते ही माँ के रूप में उनका अधिकार स्वत: व्यक्त हो गया।

‘‘बाप रे! आप माँ होकर उसे भेज रही हैं? तो दवाखानेवाले का क्या दोष?’’
अमरतकाकी यदि अकेली होतीं या बेटे को बुरा लगने का डर न होता तो पलट गाड़ी में वे मंगु को लेकर घर वापस लौटी होतीं परन्तु और कोई चारा नहीं था।अत: भारी मन से भारी कदमों से दवाखाने में प्रवेश किया।

मुलाकात का वक्त था। इसलिए बीचवाले कमरे में मरीज और उनके रिश्तेदार अलग अलग बैठे हुए थे। कई स्वजन घर से लाया हुआ खाना खा रहे थे। कोई तो फल भी खा रहा था। एक पागल पति के साथ पत्नी घर और बच्चों के बारे में बतिया रही थी। एक पगली पत्नी जब उसका पति उससे मिलने आया तब उससे लिपट गई थी। अरे,बगल में खड़ी वोर्ड की परिचारिकाओं की ओर देखकर वह फरियाद कर रही थी कि –ये भूतनियां मुझे अच्छे कपडे पहनने के लिए नहीं दे रही हैं,अच्छा खाना-पीना नहीं दे रही हैं,माथे में डालने के लिए तेल भी नहीं दे रही।

अमरतकाकी उस वक्त परिचारिकाओं की ओर देख रही थीं। उस औरत की जो परिचारिका थी उसने हंसते हुए कहा:‘‘अब मैं तुम्हें सबकुछ दूंगी।तुम्हारे पति तुम्हारे लिए अच्छा खाना लाये हैं,एक बार खा लो।’’

उस पगली ने गुस्से में भरकर कहा-‘‘मैंने अभी दातुन नहीं किया है, मैंने मुंह नहीं धोया है।’’

अमरतकाकी ने देखा कि उसका मुख तो धोया हुआ था फिरभी तनिक भी रुष्ट हुए बिना परिचारिका ने पानी से भरा लोटा लाकर मुंह धुलवाया और नेपकिन से मुंह पोंछ दिया। अमरतकाकी को इस बात का आश्वासन हुआ कि काम करनेवाले ये लोग स्नेहिल हैं।

डॉक्टर और स्त्री वोर्ड की मेट्रन आये। अमरतकाकी के बेटे ने मेजिस्ट्रेट का हुकुमनामा दिया। माँ को संतोष हो इस लिए वह सुने ऐसे अच्छी शुश्रूषा करने के लिए आग्रह किया। मेट्रन ने जवाब देते हुए कहा कि ``इस विषय में आप तनिक भी चिंता न करें।।।।
’’
बीच में ही अमरतकाकी ने कहा: ‘‘ बहन! चिंता इस लिए करनी है कि वह निहायत पागल है। कोई जब तक पास बैठकर खिलाये नहीं तब तक खाती नहीं है...’’इतना कहते कहते तो उसका कंठ भर आया और वाक्य अधुरा रह गया।

दूर खड़ी परिचारिकाएँ पास दौड़ी चली आयीं। एक ने कहा, ‘‘बा, आप! तनिक भी चिंता नहीं करें। हम उसके मुंह में कौर डालकर खिलाएँगी।’’

आर्द्र स्वरों में अमरत काकी ने कहा: ‘‘मुझे यही कहना है। उसे पिशाब-पाखाने का होश भी नहीं है। अत: यदि वह कपडे ख़राब कर दे तो देखना। अन्यथा वह गिले में सोयी रहेगी तो उसे बादी हो जाएगी।’’

दूसरी परिचारिका ने कहा,``रात में चार-पांच बार जाँच की जाती है।’’

अमरतकाकी:``उसे रात में बत्ती के उजाले में नींद नहीं आती।’’

``जिसे नींद नहीं आती उसे नींद की दवाई देते हैं।’’

``उसे अन्य उपद्रवी मारेपीटे नहीं,यह भी देखना।’’

``उपद्रवियों को अलग रखा जाता है। रात में सबको अलग अलग कमरों में सुलाया जाता है।’’

मिलने के लिए आये मुलाकातियों के बिदा होने पर मरीज को अन्दर ले जाने तक के लिए थोडा सा दरवाजा खुलता था। अत: मौका पाकर अमरतकाकी दो-एक बार भीतर देख लेती थी। उन्होंने तीन चार स्त्रियाँ उलझे हुए बालों के साथ अस्तव्यस्त कपड़ों में अन्दर घुमते हुए देखा। एक ने उनकी ओर देखकर छाती पीट ली और गुस्से में ऐसा देखा कि वे डर गई। इससे उन्होंने अन्दर की रहने की व्यवस्था को देखना चाहा और कहा कि मंगु जिस कमरे में रहेगी उस कमरे को मुझे देखने दीजिये।’’

``मेट्रन ने कहा कि अन्दर किसी को देखने के लिए जाने देने की आज्ञा नहीं है।’’

आकुल-व्याकुल आँखों से इस नयी दुनिया को देख रही मंगु अमरतकाकी के पास छिप गई;माथे पर हाथ रखकर,अमरतकाकी नित्यप्रति का प्यारा सा शब्द ‘बेटा’ बोलने ही वाली थी कि उनकी आवाज फट गई...अतितीव्र रुदन सी लम्बी चीख निकल गई। समग्र चिकित्सालय आक्रंद में डूब गया। बेटे की आँखों से अस्खलित आँसू बहने लगे। ऐसे रुदन से अभ्यस्त डॉक्टर,मेट्रन और परिचारिकाएँ भी भावार्द्र हो गई। दीवारें भी कांप उठी कि किसी पागल का ऐसा भावनाशील स्वजन आज से पहले कभी आया हो,ऐसा हमने जाना नहीं है!

एक परिचारिका ने हाथ में रहे रुमाल को लहराकर मंगु का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हुए कह: ``लो, क्या यह तुम्हें चाहिए?’’

उस रूमाल को पकड़ने के लिए माँ से हटकर मंगु तुरंत खड़ी हो गई। रुमाल को थोडा सा पकड़ने देकर उसके हाथ को सहलाकर मीठे शब्दों में कहा: ``बहना! तुम मेरे साथ रहोगी ना। मैं तुम्हें अच्छा खाना दूंगी,नए नए कपडे पहनाऊँगी’’मंगु उसकी और तक रही थी। अत: उस क्षण का उपयोग करते हुए ‘’आ,दे दूँ। कहकर उसका हाथ पकड़कर उसे आगे किया। वह दरवाजा अधखुला सा होकर मंगु को निगल गया।

``मंगु। मंगु। कलेजा फट जाये ऐसे अमरतकाकी ने पुन: चीखा।’’

डॉक्टर ने आश्वस्त करते हुए :``बा !’’ और बगल में खड़े बेटे की ओर अंगुली निर्देश करते हुए कहा:``आपके इस बेटे की तरह मुझे भी अपना बेटा समझना। बिटिया को दवाखाने में नहीं पर बेटे के घर छोड़े जा रही हैं ऐसा समझें।’’

अधेड़ अवस्था की बाल्यावस्था में विधवा होने के कारण इस क्षेत्र को समर्पित मेट्रन ने आश्वस्त करते हुए कहा कि:``आज तक आप अकेली ही उसकी माँ थीं अब आज से मैं उसकी माँ हुई हूँ।’’

अमरतकाकी ने सिसकते हुए कहा:``उसे तो मूक जानवर सा भी होश नहीं है। मैंने आज तक उसे अपने से अलग किया नहीं है। आपके दवाखाने में कुसुम ठीक हो गई, इसलिए मैंने हिम्मत करके।।।।’’और उनका कंठ अवरुद्ध हो गया।

मेट्रन:``वह भी कुसुमकी भांति कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाएगी।’’

अमरतकाकी की सिसकियाँ समाप्त हुई फिरभी उनकी नजर तो उस बंद दरवाजे को चीरकर मंगु पर ही जमी हुई थी। मानों मंगु ने उन्हें कुछ याद दिलाया हो ऐसे उन्होंने कहा:``वह रुखी रोटी(टिक्कड़) नहीं खाती है।शाम के खाने में उसे दूध या दाल में में टिक्कड़(रोटी) घोलकर देना।’’

अमरतकाकी की करुणार्द्र आँखों की ओर देखने की मेट्रन की मानो शक्ति ही लुप्त हो गई हो ऐसे नजरें झुकाए कहा :``ठीक है।’’

अमरत:``उसे दही बहुत प्रिय है। रोज देना तो संभव नहीं होगा पर दूसरे-तीसरे दिन देना। इसके लिए जो भी अतिरिक्त खर्च होगा, वह हम देंगे।जो उसकी सेवा में रहेगा उसे भी हम खुश करेंगे।’’

अमरतकाकी और उनका बेटा जब मंगु को रखकर दवाखाने से बाहर निकले तब दोनों के मुख पर शोक के बादल मंडराये हुए थे। दोनों मूक भाव से बाहर खड़ी घोड़ागाड़ी पर बैठकर बिदा हुए। गाड़ी के डिब्बे में पैर धरते ही अमरतकाकी को स्मरण हो आया कि- दवाखाने में सोने के लिए चारपाई देते भी होंगे या नहीं? मंगु कभी नीचे सोयी नहीं है। अत: यदि उसे चारपाई नहीं मिली तो उसे रास नहीं आएगा। मन में तो विचार आया कि यदि उसे अन्दर जाने दिया होता तो इसकी सिफारिश करना छूट नहीं जाता। कमरे में चारपाई नजर न आते ही उसे तुरंत याद हो आता।

दवाखाने में काम करनेवाले लोग भी स्नेहिल प्रकृति के हैं,भले हैं,ऐसी प्रतीति अमरतकाकी को हुई थी परन्तु उन्हें अंदर जाने नहीं दिया गया था। इसलिए अफ़सोस रह गया था कि हमें पसंद नहीं आये ऐसा होगा तभी तो अंदर नहीं जाने देने का कानून बनाया होगा ना? उसे समर्थन दे रहा था वह अधखुला दरवाजा। भूतनी की तरह व्यर्थ भटकती गन्दी,अस्तव्यस्त और भूख से मरी जा रही हो ऐसी डरावनी पागल स्त्रियाँ,उसके साथ मंगु खुद को नही देखने से रोती हो ऐसी आवाज अमरतकाकी को सुनाई दी। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। बगल में बैठी हुई किसी स्त्री ने पूछा-``बा! क्यों रो रही हो? किसी की मौत हुई है क्या?

रात्रि के पौने ग्यारह बजे घर लौटे तब उनका इंतजार कर रही पड़ोसन,जो रिश्ते में चचेरी थी,वह जग रही थी। उसने उनके लिए खाना बना रखा था लेकिन दोनों ने खाना खाने से इनकार किया। स्वजन की मृत्यु का जखम ताजा हो तब जिस प्रकार आग्रह करनेवाले की जबान नहीं खुले ऐसे पड़ोसन भी अत्याग्रह नहीं कर सकी।

अमरतकाकी के अंतरतम में एक ही तम्बूरा बज रहा था।-मंगू अभी क्या कर रही होगी? हरपल यही विचार उनके दिल को बेध रहा था। कितनी सर्दी है? किसीने उसे ओढाया भी होगा या नहीं? पिशाब करने से भीगा उसका घाघरा और बिछौना किसी ने बदला भी होगा या नहीं?

मानों मंगु उनकी बात सुननेवाली हो ऐसे बडबडायीं:``बेटा! पिशाब नहीं करना। ओढा हुआ हटा नहीं देना।’’ये शब्द सोते वक्त वे हमेशा बोलती रहती थीं फिरभी मंगु उन शब्दों का अमल करती नहीं थी। रात में यदि उसने पिशाब किया हो तो उसका घाघरा और बिछौना दोनों बदल देती थीं। मंगु के बड़ी हो जाने पर भी वे उसे अपने साथ सुलाती थीं,जिससे कि वह पिशाब करे तब उन्हें पता चले,जग जाये और उसे भीगे बिछौने में सोना नहीं पड़े।

अमरतकाकी खुद को भी उसके बिना बिछौना सुना सुना लगता था। मन में विचार आया-मेरे साथ सोने के लिए आदी उसे नींद आई भी होगी? उसके साथ ही आँखें व्याकुल हुई और खुद को खोज रही हो ऐसा उन्होंने देखा। उन्होंने ईस से अपना माथा टकराया।-मैं माँ होकर भी उसे दवाखाने में छोड़कर आ गई?उन्होंने एक सिसकी भर ली।

बाहर कमरे में सोये बेटे को भी नींद नहीं आ रही थी। उसे माँ की मंगु के प्रति माँ की ममता का सौवाँ हिस्सा भी ममता नहीं थी तथापि उसकी छाती पर वेदना से भरी निष्ठुर शिला मानों लद गई थी। माँ की सिसकियों के साथ उसकी आँख से भी आँसू बहने लगे। जब खुद को इतनी वेदना हो रही है तो माँ का क्या हाल होगा? वेदना मातृहृदय को कितना बेरहमी के साथ चूथ रही थी ,उसका साक्षात्कार जीवन में पहलीबार बेटे को हुआ। उसका हृदय आक्रंद कर उठा। माँ का दु:ख तो येन केन प्रकारेण टालना ही होगा। बेटा होकर यदि मैं इतना भी न कर सकूँ तो मेरा जीना व्यर्थ है। उसी के साथ उसके दिल ने प्रतिज्ञा की कि-मैं जब तक जिन्दा रहूँगा,मंगु का अच्छी तरह से पालन-पोषण करूँगा। यदि बहु उसके मल-मूत्र धोने के लिए तैयार नहीं होगी तो मैं स्वयं धोऊंगा! उसीके साथ वेदना का वह निष्ठुर पत्थर उसकी छाती पर से हट गया।

अमरतकाकी ने दूसरी सिसकी ली होती तो बेटे ने तत्काल अपनी प्रतिज्ञा सुनाकर शांत किया होता लेकिन वे अब शांत हो गई हों ऐसा लगा। अत: अब मैं कल सुबह बात करूँगा। ऐसा सोचकर बेटे ने सोने के लिए आँख मुंदी और कुछ ही देर में वह गहरी नींद सो गया।

मुंह अँधेरे,चक्की और मथनी की मधुर आवाज गांव में जब गूंज रही थी, तब सारे गाँव को चीर डाले ऐसे अमरतकाकी ने चीखा-``दौड़ो दौड़ो मेरी मंगु को मार डाला रे।’’

बेटा चारपाई से उछल पड़ा। पडोसी भी दौड़े चले आये। चक्कियां और मथनियाँ काम करते रुक गईं। जिसने भी सुना दौड़ पड़ा और आते ही चौंक गए। अमरतकाकी ने मंगु के हाल को (पागलपन) को अपना लिया था।

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