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वर्ष: 2, अंक 29,  जनवरी(द्वितीय), 2018



सिगरेट के टूकडे़


नरेश गुर्जर


"तुमसे कितनी बार कहा है सिगरेट मत पिया करो' कम से कम घर पर नही" दीपाली झुंझलाहट में कहती है।

"तुमको मेरी सिगरेट से क्या दुश्मनी हैै" राजेश चिड़ते हुए कहता है..जब देखो पिछे पड़ी रहती हो।

"तुम्हें कोई फर्क नही..मगर विजय का तो सोचो वो अभी बच्चा अगर वो देखेगा तो उस पर बुरा असर पड़ेगा।" दीपाली कहती है।

"कुछ नही होगा, सिगरेट पीना तो मर्दों शान है" राजेश बात टालते हुए कहता है।

राजेश और दीपाली मे अक्सर एेसे ही लड़ाई होती है मगर राजेश सिर्फ अपनी मनमानी करता है।

राजेश अब हर रोज शाम को दोस्तों के साथ महफिल जमाकर बैठ जाता है। महफिल भी एेसी वैसी नही मानो नबाबों वाले ठाठ हो, ताश के पतें, सिगरेट की डिब्बिया, माचिस की तिलियाँ इधर-उधर बिखरी हुई कभी कभी तो साहब लाईटर भी ले लेते है और जैसे जैसे शौख बढ़ते जाते है काम करना बंद होता जा रहा है। राजेश के दिन अब बस तीन पती ताश और सिगरेट के सहारे ही गुजरते है।

दीपाली घर के हालात से परेशान हो जाती है। घर में खाने को अन्न का दाना तक नही होता। अब बाहर काम करके जो भी मिलता ले आती। राजेश साहब तो महफिल मे ही मसरूफ रहते है और हो भी क्यों ना मौहल्ले के सारे नाकारा लोगों ने उसे अपना मुखिया जो बना लिया है।

विजय भी महंगाई के साथ साथ बढता जा रहा है अब पूरे तेरह साल का हो गया है। पैसो की तंगी के चलते उसका स्कूल भी छूट चुका है। बस सात जमात तक ही पढ सका। अब तो मौहल्ले के बच्चो के साथ घूमता रहता है। हालात और भी खराब होते जा रहे थे। दीपाली बहुत परेशान हो चुकी थी घर को सम्भाले या पति को, अपनी सेहत को देखे या विजय को देखे।

मौहल्ले का सबसे बिगड़ेल लड़का था राजू, होगा यही कोई सोलह-सतरह बरस का, हर किसी को अपने जैसा बनाना चाहता था। अब विजय की भी राजू के साथ खूब जम रही थी। विजय अपने लफंगे दोस्तों के साथ बैठा है तभी राजू आता है और कहता है- आज मै तुम लोगो के लिए एेसी चीज लाया हूँ जो तुमने कभी नही पी होगी।

"एेसी क्या चीज है दिखाओ जरा" विजय कहता है।

राजू अपनी जेब से आधी जली सिगरेट निकालता है और सुलगा कर एक जोरदार कश लगाता है और कहता है "ये रही वो चीज"

"मगर ये तो सिगरेट है और माँ कहती है बहुत बुरी चीज है" विजय कहता है।

बुरी वुरी कुछ नही होती कहते हुए राजू जबरन विजय के मुँह मे सिगरेट डाल देता है और साथ मे कहता है कि आज तो वो ले आया पर रोज रोज नही ला पाएेगा। विजय कहता है तुम इसकी चिंता मत करो उसके बाबा के पास बहुत है वो किसी न किसी तरह ले आएेगा।

रोज की तरह राजेश अपने दोस्तों के साथ महफिल जमाकर बैठा था और उधर विजय इस ताक मे था कि कब उसे मौका मिले और वो अपना काम करे। जल्दी ही महफिल खत्म हो गई। विजय सिगरेट के आधे जले टुकड़े उठा लेता है। अब हर रोज उसका यही काम होता है वो पूरी तरह नशे के जाल मे फस चुका था। दीपाली को पता चला तो उसने विजय को खून डाटा और मौहल्ले के बच्चो के साथ खेलना बंद कर दिया। माँ की डाट फटकार से विजय घर से बाहर जाना तो छोड़ देता है मगर नशा करना नही छोड़ता। दीपाली के बाहर जाते ही विजय सिगरेट के टूकडे़ जला लेता। अब अक्सर विजय अपने पिता से चोरी छुपे बिना जली सिगरेट चुरा लेता और अब तो उसे किसी के साथ बाँटनी भी नही पड़ती। इस तरह उसकी ये आदत हद से ज्यादा बढ़ जाती है। एक दिन जब दीपाली काम करके घर लौटती है तो उसके होश उड. जाते हैं। काँपती हुई आवाज से राजेश को बुलाती है। राजेश दौड़कर आता है और देखता है कि विजय जमीन पर पड़ा था उसके अास पास सिगरेट के टुकड़ों का ढेर लगा था। राजेश जल्दी से डाक्टर को बुलाता है। डाक्टर विजय को चैक करता है और कहता है विजय अब नही रहा। थोड़ी ही देर मे रोने चिल्लाने की आवाज पूरे मौहल्ले मे फैल जाती है। आखिरकार सिगरेट के टुकड़ों ने एक पूरे परिवार को जला दिया


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