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वर्ष: 2, अंक 29,  जनवरी(द्वितीय), 2018



वृद्धाश्रम


डॉ० श्रीलता सुरेश


चंद्रकांत ने, अपनी पत्नी के मृत्यु के बाद, अपना सारा कारोबार अपने पुत्र अश्वंत को सौंपकर घर पर ही रहने का निर्णय लिया। एम्.बी.ए. करने के बाद अश्वंत, अपने पिता के साथ कारोबार में ही जुड़ गया| चंद्रकांत को पूरा यक़ीन था कि उसका पुत्र इस कारोबार को और आगे ले जाएगा।

चंद्रकांत सुबह का समय पूजा-पाठ में बिताता था। 4 बजे दोनों पोतियों के साथ चाय और बिस्कुट खाते उनसे बातें करने में लग जाते। दोनों बच्चे अपनी स्कूल में हुई बातों को दादा जी को सुनाते थे। बेटा और बहू शाम को दफ्तर से लौट आते| इतवार के दिनों में बेटे, बहू और पोतियों के साथ कहीं घूमने जाते और रात का भोजन कही होटल में करके लौट आते|

चंद्रकांत को अपनी पत्नी की याद तो आती थी। इसलिए अक्सर वे घर में ही व्यस्त रहने लगे| नौकर घर का सारा काम कर लेता था|

कई दिनों से चंद्रकांत को देखा गया कि अक्सर वे खांसते रहते थे| इससे कभी तो बातचीत करते वक्त तखलीफ़ होती थी| पहले तो घर के नुस्कों से काम चला लेते थे| लेकिन उससे कुछ फायदा नहीं हुआ तो डॉक्टर के पास गए| फिर भी कम नहीं हो पाई| ऐसे करते-करते कई डॉक्टरों को दिखलाया | सब टेस्ट करवाने के बाद पता चला कि उनको ‘टी.बी.’ है|

यह ख़बर बहू को पता चलते ही उसने अपने दोनों बच्चों को दादा के कमरे में जाने से मना कर दिया। अश्वंत को भी उनके कमरे में जाने के लिए रोक देती। परंतु अश्वंत दो-तीन दिन में एक बार कुछ क्षणों के लिए जाता | हाल-चाल पूछकर वापस आ जाता|

चंद्रकांत सुबह का समय पूजा पाठ करते। शाम को बाहर टहलने जाते| इससे उनके कई दोस्त भी बन गाए। बाकी समय एकांत में ही बिताते| नौकर समय-समय पर उनके लिए चाय, नाश्ता और खाना ले आता था। बहू और दोनों पोतियाँ कभी उनके कमरें के दरवाज़े के पास खड़े होकर हालचाल पूछकर चले जाते। घर के सभी सदस्य को पता था की टी.बी., कोई दूसरों को फैलनेवाली बिमारी नहीं है और ठीक प्रकार के इलाज से सही हो सकता है| लेकिन बहू ने सबसे उनके कमरे में जाने से मना कर दिया| चंद्रकांत नियमित रूप से दवाई लेते थे और पंद्रह दिन में एक बार हॉस्पिटल जाकर चेक-अप करा लेते थे, जिससे उनके इलाज में परिवर्तन आने लगा।

एक दिन चंद्रकांत टहलने के लिए जा रहे थे, जैसे ही गेट के पास आए तो उनकी कानों में बहू की आवाज़ सुनाई दी। वैसे तो चंद्रकांत अपनी बहू और बेटे की आपस की बात नहीं सुनते लेकिन इस बार उनके कान में कूछ “पिता जी” इस तरह की आवाज़ सुनाई दी, तो वे रुक गए । बहू कह रही थी, ‘मैं जानती हूँ कि पिता जी को कोई छूत की बीमारी नहीं है और इसका इलाज अच्छे हॉस्पिटल में ही करवा रहें हैं । अगर उनको कोई अच्छे वृद्धाश्रम में भेज दें तो अच्छा है। वहाँ उनको अच्छी देखभाल भी हो जाएगी| पैसे की कमी न होने के कारण किसी अच्छे शानदार और उनके लिए सुविधाएँ हो जिससे पिता जी को कोई तकलीफ़ न होने पाए | आप पिताजी से इस बारे में क्यों नहीं बोलते ? '

इसके जवाब में अश्वंत बोला, ‘मैं कैसे कह सकता हूँ, कई सालों से वे हमारे साथ है।"

चंद्रकांत आगे नहीं सुनना चाहते थे, इसलिए गेट के बाहर टहलने के लिए चले गए|

अगले दिन नाश्ते के बाद अश्वंत अपने पिता जी के कमरे में गया| पिता ने देखते ही पुत्र से कहा, “अरे बेटा, आओ "

अश्वंत ने कहा, “पापा, कैसे हो? मुझे आपसे कुछ कहना है|”

चंद्रकांत ने कहा, “बेटा, ठीक हूँ| डॉक्टर कह रहें थे कि बहुत जल्द ठीक हो जाऊँगा और पहले जैसे रह सकता हूँ|| मुझे भी तुमसे कुछ कहना है| बैठो|”

कुर्सी सरककर बैठते हुए अश्वंत बोला,“अच्छा, क्या बात है पापा, नौकर चाय, नाश्ता और खाना तो ठीक से देता है न|”

पिता जी : “हाँ बेटा| वह समय पर दे देता है|”

अश्वंत : “कुछ तकलीफ़ हो तो बताइए|”

पिता जी : “नहीं बेटा, मुझे कोई तकलीफ़ नहीं है| मैं सोच रहा था अब मेरी उम्र भी ढल रहीं है| हम उम्र के लोगों के साथ अपना समय बिताना चाहता हूँ| इसलिए वृद्धाश्रम ...

पिता जी ने अपना वाक्य पूरा भी नहीं किया मगर अश्वंत को ऐसे लगा कि उन्होंने अपनी मन की बात कह दी| यहीं कहने के लिए तो वह आया था| फिर भी वह अपने चहरे में कोई हाव-भाव न दिखाते हुए कहा, “पिता जी आप क्यों यहाँ से जा रहे है?”

इस पर पिता जी ने कहा, “ मैं कही नहीं जा रहा हूँ| मैं अपने 4-5 दोस्तों के साथ इस घर को वृद्धाश्रम बनवाने वाला हूँ| नौकर तो है ही, जो हम लोगों की देखभाल के लिए| इसलिए तुम अपना इंतज़ाम और कहीं कर लो जहाँ तुम्हारी दोनों बेटियों को स्कूल से आने-जाने में आसान रहें| अच्छा, यह बताओ, तुम्हें क्या कहना है?”

पिता जी की बात सुनकर अश्वंत मौन रह गया| अपनी बात कहे बिना वहाँ से चला गया|


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