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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



कुछ न करेंगी खामोशियाँ


डॉ० अनिल चड्डा


 
कुछ न करेंगी खामोशियाँ
बढ़ती रहेंगी बस दूरियाँ

दिल ने कही और दिल ने सुनी
शिकवों-गिलों की इक दास्ताँ
बस न सुनी और न कहीं
लोगों ने खुद में जो हैं कमियाँ

किनारे कभी मिलते हैं नहीं
इसमें नहीं कुछ बात नई
बन के लहर बहता तू चल 
पहुँच दूजा किनारा जहाँ

राहों के पत्थर को ठोकर लगा
काँटों पे सोने की आदत बना
बुलायेगी मंजिल तुझे पास खुद
वो होगी वहीं तू रहेगा जहाँ		 
 

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