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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



बीत रहा जीवन


अमरेश सिंह भदोरिया


 


अधरों पर मुस्कान है और आँखों में उलझन।
संकल्पों और विकल्पों में बीत रहा जीवन ।
1.
समझौते में हरदम रहती जीने की मज़बूरी । कभी-2 सपनो में कुछ क्षण बनते है कर्पूरी । आगत और विगत की चिन्ता में चलती धड़कन। संकल्पों और विकल्पों में बीत रहा जीवन ।
2.
आड़ी तिरछी रेखाओं से मिल कर बनता चेहरा। बेबसी का हर रंग होता है खुब गहरा । वसनहीन तन में शोभा बनती है उतरन । संकल्पों और विकल्पों में बीत रहा जीवन ।
3.
सांसो के संग आती-जाती आशा और निरासा। धूप सुनहरी देती सबको संयम की परिभाषा। पत्थर में घिसने पर भी चंदन रहता चंदन। संकल्पों और विकल्पों में बीत रहा जीवन ।
4.
कसौटियों में कसने पर होती पूरी पहचान। परिस्थितयों की दासता सहता हर इंसान। अँगारों में जलकर "अमरेश"जाती कब ऐंठन। संकल्पों और विकल्पों में बीत रहा जीवन ।

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