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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



व्यक्ति आम नही है तू


पुनीत कुमार


   

माना शहर का बड़ा नाम नही है तू,
पर इस दुनिया मे गुमनाम नही है तू।
 
चाहे मशहूर ना हो तेरे शराफ़त के किस्से,
पर चोरी-सीनाजोरी के लिए बदनाम नही है तू।

समझाकर खुद को तू चढ़ता हुआ सूरज,
कि आंखो से ओझल ढलती शाम नही है तू।

तेरी एकान्त की पीड़ा भी बहुत है रसीली,
कि महफिल मे छलकता जाम नही है तू।

लोकतान्त्रिक समाज मे एक तू ही तो खास,
मान या ना मान पर व्यक्ति आम नही है तू।

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