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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



ग़म की गलियों से गुज़रने के लिए


गुलाब जैन


 

ग़म की गलियों से गुज़रने के लिए,
जो लम्हे थे खुशनुमां,सब ले लिए ।

हर सू तीरगी छाई तेरे जाने के बाद,
रौशनी देते बस तेरी यादों के दीये ।

काश ज़ीस्त सजी होती बस ख़ारों से,
हयाते-गुल तो मिली बिखरने के लिए ।

इतना आसां कहाँ सुर्ख़रू होना भला,
हिना भी पिसती है निखरने के लिए  ।

लाख इम्तहां होंगे जुनूने-इश्क़ में,
निगाहों से दिल में उतरने के लिए ।
                                 

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