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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



मिलेगा खून पीने को सबीलों पे


गंगाधर शर्मा 'हिन्दुस्तान'


 

मिलेगा खून पीने को सबीलों पे ।
फिर जुनूं तारी हुआ कबीलों पे ।।

राजदारों से मिला धोखा जिसे ।
दूर से मिलता रहा वकीलों से ।।

कचरा शहर का आ मिला बहता हुआ ।
यूँ बरपा है कहर इन झीलों पे ।।

सन्नाटा पसरा है ऐसा मौत का ।
गिद्ध तक दिखते नहीं करीलों पे ।।

दिन वादा वफ़ा का आकर गुजर गया ।
किसको तरस आया हमीर हठीलों पे ।।

'हिन्दुस्तान' मसअला कमेटी में गया ।
फिर गया पानी सभी दलीलों पे ।।

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